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Showing posts from June, 2021

कानूनी मामलों में चिकित्सा साक्ष्य की क्या भूमिका होती है?What role does medical evidence play in legal cases?

बाल देखभाल संरक्षण अधिनियम 2000 के पारित होने के कारण एवं मुख्य उद्देश्य (silent features child care Protection Act 2000

बाल देखभाल संरक्षण अधिनियम 2000 की मुख्य विशेषताएं: - ( 1): - किशोर न्याय सामान्य विधि (common law on juvenile justice): - किशोर न्याय अधिनियम 2000 से पहले किशोर न्याय अधिनियम 1986 लागू था यह विधान अपने उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्रभाव में नहीं ला पा रहा था बाल अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के लिए कोई विधि नहीं थी इसी उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए इस अधिनियम को प्रभाव में लाया गया है. ( 2) अधिनियम का उद्देश्य (objects of the act): - अधिनियम की प्रस्तावना में अधिनियम का उद्देश्य बताया गया है अधिनियम का उद्देश्य देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों की उचित देखभाल की व्यवस्था करना उनके संरक्षण और उनकी विकास संबंधी आवश्यकताओं के पोषण द्वारा उपचार और न्याय निर्णयन तथा मामलों के निपटारे में बाल मैत्री अवधारणा को अंगीकार करते हुए बालकों के सर्वोत्तम हित में किस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित विभिन्न संस्थानों के माध्यम से उनके अंतिम पुनर्वास हेतु विधि विरोधी किशोरों से संबंधित विधि को संशोधित तथा समेकित करना है. ( 3) परिभाषाएं (definition): - अधिनियम की धारा 2 में विभिन्न शब्

अजमानती अपराध की दशा में जमानत bail taken in case of non bailable offence

( 1): - जब कोई व्यक्ति जिस पर  अजमानतीय अपराध में अभियोग है अथवा जिस पर संदेह है कि उसने अजमानतीय अपराध किया है पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार किया जाता है या उच्च न्यायालय के द्वारा या सेशन न्यायालय से भिन्न न्यायालय के सम्मुख हाजिर होता है या लाया जाता है तो वह जमानत पर छोड़ा जा सकता है किंतु (a) यदि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार प्रतीत होता है कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अन्य अपराध का दोषी है तो वह इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा. (b) अगर ऐसा अपराध कोई संज्ञेय (coynizable) अ पराध  है एवं ऐसा व्यक्ति मृत्यु आजीवन कारावास अथवा 7 साल या इससे अधिक से कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए पहले दोष सिद्ध किया गया है अथवा वह दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम 2005 (2005 का 25) की धारा 37 द्वारा किसी अजमानतीय  और संज्ञेय  अपराध के लिए (23 - 06 - 2006) से प्रतिस्थापित (3 साल या इससे अधिक के लिए किंतु 7 साल से अधिक की अवधि के कारणों से दंड से किसी संज्ञेय  अपराध के लिए तो या इससे अधिक अवसरों पर पहले दो सिद्ध किया गया है तो वह इस प्रकार नही

भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत गर्भपात तथा नवजात शिशु के संबंध में अपराधों को रोकने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं? (what provisions are made under Indian penal code for the prevention of miscarriage and offence relating to newly born child?)

भारतीय दंड संहिता में बालकों और महिलाओं से संबंधित विभिन्न अपराधों के बारे में निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं - 1: - गर्भपात संबंधी ( धारा 312 से 314) 2: - नवजात शिशु संबंधी अपराध ( धारा 315 से 318) ( 1): - गर्भपात का अर्थ (meaning of miscarriage) - गर्भपात से तात्पर्य “गर्भाधान की अवधि पूर्ण होने से पूर्व ही किसी भी समय आ विकसित बच्चे को या माता के गर्भ से भ्रूण को बाहर निकाल देना या अलग कर देना.       स्पंदनगर्भा से तात्पर्य स्त्री की उस अनुभूति से है जो उसे गर्भावस्था के चौथे या पांचवें महीने में प्रतीत होती है।              भारतीय दंड संहिता1860 की धारा312,313 और314 मे गर्भपात के बारे में प्रावधान किया गया है।   गर्भपात कारित करना( causing miscarriage): - भारतीय दंड संहिता की धारा 312 के अनुसार जो कोई गर्भवती स्त्री का स्वेच्छा से गर्भपात कार्य करेगा यदि ऐसा गर्भपात उस स्त्री का जीवन बचाने के प्रयोजन से सद्भाव पूर्वक कार्य न किया जाए तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 3 वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा और यदि वह इस्त्री स्पंदनगर्भा स

संम्मन के स्थान पर अथवा संम्मन के अलावा वारंट जारी करने की न्यायालय की शक्ति का वर्णन कीजिए? हाजिरी के लिए बंधपत्र लेने की शक्ति को भी समझाइए. Describe the powers of the court to issue warrant in lieu of or in addition to summons.Also explain the powers to take Bond for appearance

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 87 न्यायालय को संम्मन के स्थान पर या उसके अतिरिक्त वारंट जारी करने की शक्ति प्रदान करती है इस धारा के अनुसार न्यायालय किसी भी ऐसे मामले में जिसमें यह किसी व्यक्ति की हाजरी के लिए सम्मन जारी करने के लिए इस संहिता द्वारा सशक्त किया गया है अपने कारणों को अंकित करने के पश्चात उसकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर सकता है - (a) अगर या तो ऐसा सम्मन जारी किए जाने के पहले या बाद में किंतु उसकी हाजिरी के लिए नियम समय के पूर्व न्यायालय को यह विश्वास करने का कारण दिखाई पड़ता है कि वह फरार हो गया है या संम्मन का पालन नहीं करेगा अथवा (b) अगर वह ऐसे समय पर हाजिर होने में असफल रहता है और यह साबित कर दिया जाता है कि उस पर समन की तामील सम्यक  से ऐसे समय में कर दी गई थी जिसके अनुसार हाजिर होने के लिए अवसर था ऐसी असफलता के लिए कोई उचित प्रतिहेतु नहीं दिया जाता है परंतु इस शक्ति का प्रयोग वही न्यायालय कर सकता है जिसे इस संहिता द्वारा किसी व्यक्ति की हाजरी के लिए सशक्त किया जाता है ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए न्यायालय का कर्तव्य है कि वह वारंट जारी करने के

भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अश्लीलता एवं नंगेपन संबंधी कौन से प्रावधान हैं? What are the provisions of law relating to obscenity and Nudity under Indian Penal Code ? explain.

संहिता में अश्लील शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है. अतः हमें इसके सामान्य अर्थ  को ही ग्रहण करना चाहिए. सामान्य रूप से विधि के अंतर्गत वे सभी अभिव्यक्ति या (expression) चाहे वो लिखित हो या मौखिक अथवा चाहे वह संकेत आदि के प्रदर्शन हो जो सामान्य मस्तिष्क वाले व्यक्तियों के नैतिक स्तर को निम्न करती है,' अश्लील' (Obscene) मानी जाती है.                  अभिव्यक्तियों का रूप और गुण इस प्रकार का होना चाहिए कि सामान्य कोटि का मस्तिष्क रखने वाले व्यक्ति उससे   कुप्रभावित हो सके। कोई लेख वचन संकेत अथवा वस्तु अश्लील है या नहीं यह मामले के तथ्यों एवं उनकी परिस्थितियों पर निर्भर करता है क्योंकि नैतिक मूल्यों का कोई सार्वभौम एवं सामान्य मापदंड नहीं है इसलिए अश्लीलता का स्वभाव गुण और क्षेत्र देश और काल के अनुसार परिवर्तनीय  है कोई वस्तु एक स्थान पर अश्लील मानी जा सकती है किंतु वह दूसरे स्थान पर अश्लील नहीं मानी जा सकती है। अश्लील पुस्तकों आदि का विक्रय आदि: - धारा 292 (1) के अनुसार उप धारा (2) के प्रयोजन के लिए किसी पुस्तक पुस्तिका कागज रेखा चित्र रंग चित्र रूपण आकृति या कोई अन्य

अपील न्यायालय के प्रमुख शक्तियां क्या है ? क्या अपील न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य ले सकता है) what are the main power of appellate court.?

अपील न्यायालय की शक्तियां (powers of appellate court)      अपीलीय न्यायालय की शक्तियों का वर्णन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 385 में किया गया है दोषी युक्ति के आदेश के खिलाफ अपील किए जाने पर अपील न्यायालय - (a) अपराधी को दोषी पा सकेगा एवं उसे विधि के अनुसार दंड आदेश दे सकेगा. (b) अतिरिक्त जांच (investigation) दे सकेगा (c) विचारण  के लिए सुपुर्दगी का आदेश दे सकेगा (d) साक्ष्य  का पुनर्मूल्यांकन कर सकेगा यथा मुकेरिया बनाम स्टेट A.I.R 2013 SC 321) दोष सिद्धि के आदेश के खिलाफ अपील किए जाने पर अपील न्यायालय (a) निष्कर्ष के उलट सकेगा एवं अपराधी को दोषमुक्त या उन्मोचित कर सकेगा (b) उसका पुनर्विचारण किए जाने अथवा विचारण के लिए सुपुर्द किए जाने के लिए आदेश दे सकेगा या (c)दंडादेश को बनाए रखते हुए निष्कर्ष में परिवर्तन कर सकेगा किंतु इस प्रकार नहीं की उससे दंड में वृद्धि की जाए (d) निष्कर्ष में दंड की प्राकृतिक एवं परिमाण में परिवर्तन कर सकेगा परंतु इस प्रकार नहीं की उससे दंड में वृद्धि की जाए दंडादेश मे बढ़ोतरी के खिलाफ अपील किए जाने पर अपीलीय न्यायालय (a) निष्कर्ष को उलट सकेगा एवं

तलाशी का वारंट किन परिस्थितियों में दंड न्यायालय द्वारा जारी किया जा सकता है? वारंट जारी किए जाने की पूर्ववर्ती शर्तों को समझाइए. Under what situation the search warrant can be issued by a criminal court

तलाशी वारंट का तात्पर्य एक लिखित प्राधिकार है जो किसी सक्षम मजिस्ट्रेट अथवा न्यायालय द्वारा किसी पुलिस अधिकारी अथवा व्यक्ति को निर्दिष्ट करता है. इस प्राधिकार के बल पर ऐसा पुलिस अधिकारी अथवा व्यक्ति सामान्य रूप से किसी स्थान को अथवा विनिर्दिष्ट किसी दस्तावेज या वस्तु की या सदोष परिरुध्द व्यक्ति की तलाश करता है। किसी स्थान व्यक्ति दस्तावेज अथवा वस्तु की तलाशी एक बल प्रवृत्ति गोपनीयता अथवा पवित्रता का अतिक्रमण अंता वर्णित होता है. न्यायालय द्वारा इस निमित्त यह सम प्रतीक्षित किया गया है की तलाशी वारंट जारी करने की शक्ति का प्रयोग संपूर्ण सतर्कता और चौकशी के साथ किया जाना चाहिए. तलाशी वारंट कब जारी किया जा सकता है (when search warrant may be issued): - भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 93 के अनुसार निम्नलिखित परिस्थितियों में तलाशी वारंट जारी किया जा सकता है - ( 1) धारा 93 (1) (A) के अनुसार तलाशी वारंट तब जारी किया जा सकता है जब न्यायालय के पास यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि वह व्यक्ति जिसको धारा 91 के अधीन सम्मन आदेश या धारा 92 की उप धारा (1) के अधीन अपेक्षा संबोधि

संक्षिप्त विचारण के बारे में संहिता में विहित प्रक्रिया का उल्लेख विस्तार से कीजिए. (describe in detail proceedure of summary trial under Criminal Procedure Code)

हमारी न्याय प्रक्रिया की सबसे बड़ी कमी इस की जटिलता एवं लंबाई होती है. जितना ही न्याय में विलंब होगा उतना ही अधिक में न्याय को विफल कर देगा आता स्वास्थ्य एवं सफल न्याय प्रशासन के लिए न्यायिक प्रक्रिया का सीक्रेट एवं संक्षिप्त होना आवश्यक है फिर छोटे एवं सामान्य प्रकृति के मामलों के लिए तो यह एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है. भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 21 की धारा 230 से लेकर 265 तक में संक्षिप्त विचारण के बारे में प्रावधान किया गया है संक्षिप्त विचारण से संबंधित प्रक्रिया निम्न प्रकार से है - ( 1) संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति (power to try summary) - धारा 260 के अनुसार (1) इस संहिता में किसी बात के होते हुए भी यदि (a) कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (b) कोई महानगर मजिस्ट्रेट (c) कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जो उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विशेषता या सशक्त किया गया हो.            ठीक समझता है जो वह निम्नलिखित अपराधों का या उनमें से किसी का सापेक्षता कारावास से दंडनीय  नहीं है. ( 2) भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (1860 का 45) की धारा 379 धारा 380 धारा 381 के अधीन चोरी जहां