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Showing posts from January, 2022

कानूनी मामलों में चिकित्सा साक्ष्य की क्या भूमिका होती है?What role does medical evidence play in legal cases?

कंपनी के संगम ज्ञापन से क्या आशय है? What is memorandum of association? What are the contents of the memorandum of association? When memorandum can be modified. Explain fully.

संगम ज्ञापन से आशय  meaning of memorandum of association  संगम ज्ञापन को सीमा नियम भी कहा जाता है यह कंपनी का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। हम कंपनी के नींव  का पत्थर भी कह सकते हैं। यही वह दस्तावेज है जिस पर संपूर्ण कंपनी का ढांचा टिका रहता है। यह कह दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह कंपनी की संपूर्ण जानकारी देने वाला एक दर्पण है।           संगम  ज्ञापन में कंपनी का नाम, उसका रजिस्ट्री कृत कार्यालय, उसके उद्देश्य, उनमें  विनियोजित पूंजी, कम्पनी  की शक्तियाँ  आदि का उल्लेख समाविष्ट रहता है।         पामर ने ज्ञापन को ही कंपनी का संगम ज्ञापन कहा है। उसके अनुसार संगम ज्ञापन प्रस्तावित कंपनी के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण अभिलेख है। काटमेन बनाम बाथम,1918 ए.सी.514  लार्डपार्कर  के मामले में लार्डपार्कर द्वारा यह कहा गया है कि "संगम ज्ञापन का मुख्य उद्देश्य अंश धारियों, ऋणदाताओं तथा कंपनी से संव्यवहार करने वाले अन्य व्यक्तियों को कंपनी के उद्देश्य और इसके कार्य क्षेत्र की परिधि के संबंध में अवगत कराना है।"           कुछ विधिवेक्ताओं की दृष्टि में कंपनी का संगम ज्ञापन उसका

निदेशकों की वैधानिक स्थिति( legal position of directors)

निदेशकों की वैधानिक स्थिति ( legal position of directors) कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2(34) में यह  उपबंधित है कि निदेशक वह व्यक्ति होता है जिसे कंपनी के निदेशक मंडल में निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया हो। अतः स्पष्ट है कि निदेशक वे व्यक्ति होते हैं जो कंपनी के कारोबार का संचालन एवं प्रबंध करने के लिए अंश धारियों द्वारा चुने गए हो। कोई व्यक्ति कंपनी का निदेशक है अथवा नहीं जानने के लिए उसके पदनाम को विशेष महत्व ना देकर यह देखना होता है कि क्या वह कंपनी के निदेशक मंडल में निदेशक पद पर कार्य करने हेतु नियुक्त किया गया है। लार्ड बोवेन के मतानुसार निदेशकों को कभी अभिकर्ता कहा जाता है कभी न्यासी कभी प्रबंधक साझेदार। परंतु इसमें से कोई भी प्रास्थिति उनकी शक्तियों और दायित्वों को पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं करती है।         उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश सुब्बाराव( जो बाद में मुख्य न्यायाधीश भी रहे) ने कंपनी के निदेशकों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए रामचंद्र एंड संस बनाम कन्हैयालाल के वाद में कहा है कि इनकी प्रास्थिति को समझना उतना आसान नहीं है। ये ऐसे व्यवसायिक व्यक्ति हैं जिन्हें

असामान्य साधारण अधिवेशन किसे कहते हैं? इसे ऐसा क्यों कहते हैं? अधिवेशन बुलाने का तरीका बताइए। what is an extra ordinary General Meeting? Why is it so called? Describe the procedure of holding meeting.

असामान्य साधारण अधिवेशन( extra ordinary General Meeting) वार्षिक अधिवेशन के अतिरिक्त सभी अधिवेशन असामान्य अधिवेशन कहे जाएंगे। निदेशक बोर्ड जब भी चाहे ऐसे अधिवेशन बुला सकते हैं और बुलाने के लिए विवश होते हैं जब धारा के अंतर्गत अंश धारक ऐसे अधिवेशन की मांग करें। ऐसे मांग पत्र पर कंपनी की समादत्त पूंजी का 10 भाग रखने वाले अंश धारको को हस्ताक्षर होने चाहिए और उन्हें मांग पत्र के विषय पर मताधिकार भी होना चाहिए। अगर कंपनी अंश पूंजी के बगैर है तो कम से कम इतने अंश धारको के हस्ताक्षर होने चाहिए जिनके पास मत शक्ति का दसवां भाग हो। धारा(100(2))       मांग पत्र में उस विषय का ब्यावरा होना चाहिए जिस पर विचार करने के लिए अधिवेशन बुलाया जा रहा है। केवल उसी विषय पर विचार हो सकता है जिस पर मांग पत्र के हस्ताक्षर करता मताधिकार रखते हैं। कुछ अंश धार को ने तीन नये निदेशक  नियुक्त करने के लिए  अधिवेशन की मांग की बाद में अधीक्षक एजेंडा मे  यह भी जोड़ना चाहा कि एक निदेशक को हटाया भी जाएगा मीटिंग को इस विषय पर विचार करने से रोक दिया गया।          मांग पत्र प्राप्त होने के बाद निदेशकों को चाहिए की 21 दिन के अ

कंपनी की वार्षिक साधारण सभा से क्या तात्पर्य है? उसकी प्रक्रिया समझाइए.( what is meant by Annual General Meeting of company. Explain its proceedure.

कंपनी की बैठकों से आशय( meaning of meeting of company) अन्य संगठनों की तरह कंपनी को भी अपना कारोबार वास्तविक ढंग से चलाने के लिए विभिन्न प्रकार की बैठकों का आयोजन करना पड़ता है। क्योंकि कंपनी में अनेकों अंत धारी एवं सदस्य होते हैं जो भिन्न-भिन्न स्थानों पर रहते हैं तथा वे अपनी कंपनी के कार्यों में सक्रिय योगदान नहीं कर पाते हैं इसलिए कंपनी के कारोबार संबंधी मामलों पर विचार विनिमय करने एवं प्रबंधन  व्यवस्था के लिए कंपनी की बैठकों का आयोजन किया जाता है जिन्हें अंश धारियों या  सदस्यों की बैठक कहा जाता है। इसी प्रकार निदेशक मंडल भी अपनी विभिन्न प्रकार की बैठकों का आयोजन करता है। कंपनी की विभिन्न प्रकार की बैठकें (meaning of various type of meeting) एक कंपनी को अपने कार्यकाल में विभिन्न प्रकार की सभाओं का आयोजन करना पड़ता है। इन सभाओं को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है (1) अंश धारियों या सदस्यों की सभाएं: इन सभाओं को कंपनी की साधारण सभा भी कहा जाता है। इन सभाओं का आयोजन वार्षिक साधारण सभा असामान्य साधारण सभा तथा वर्ग सभाओं के रूप में किया जाता है। इन बैठकों में कंपनी के अंश धार

अंकेक्षक के प्रमुख अधिकार( main right of an auditor)

अंकेक्षक के प्रमुख अधिकार( main right of an auditor) अंकेक्षक  प्रमुख अधिकार निम्न प्रकार है: (1) यह देखना कि कंपनी के व्यक्तिगत खर्च को राजस्व खर्च में दर्शाया गया है या नहीं। (2) कंपनी के अंकेक्षक को कंपनी की सभाओं  में उपस्थित होने का अधिकार है जिसमें वह कंपनी के सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर भी देता है। (3) कंपनी के अंकेक्षक को उन सभी सूचनाओं को प्राप्त करने का अधिकार है जिन्हें प्राप्त करने का अधिकार कंपनी के सदस्यों को होता है। (4) कंपनी के अंकेक्षक को कंपनी की सभाओं से संबंधित सभी सूचनाओं को प्राप्त करने का अधिकार है। यदि कंपनी उसे उन सूचनाओं को उपलब्ध नहीं कराती है तो वह कंपनी के विरुद्ध कंपनी अधिकरण में कार्य नहीं कर सकता है। (5) कंपनी के अंकेक्षक का कर्तव्य के साथ ही साथ यह अधिकार भी है कि वह यह प्रमाणित करें की कंपनी का वित्तीय विवरण तुलन पत्र तथा लाभ हानि खाता मानकों के अनुसार ही तैयार किए गए हैं। (6) जांच करना कि कंपनी की लेखा पुस्तिकाओं में की गई लेनदेन संबंधी प्रविष्टियां के लिए अहितकर तो नहीं है। (7) यह देखना कि कंपनी द्वारा दिए गए निर्णय अग्रिम र

अंकेक्षक के विविध दायित्वों का उल्लेख कीजिए तथा अंकेक्षक प्रहरी है ,प्रहारी नही इसका विवेचन कीजिए। describe the different liabilities of an auditor and discuss on auditor is a watchdog but not a bloodhound.

अंकेक्षक के दायित्व( liabilities of an auditor) अंकेक्षक के निम्नलिखित प्रमुख दायित्व हैं ( a) लापरवाही के लिए दायित्व( liability for negligence): लापरवाही के लिए दायित्वों को सिविल दायित्वों की श्रेणी में रखा जाता है एवं इनके अंतर्गत क्षतिपूर्ति करना होता है। यदि लेखा परीक्षक ने अपना कार्य बुद्धिमानी, उचित सावधानी, ईमानदारी तथा परवाह  के साथ नहीं किया है अर्थात लापरवाही से किया है तथा इस कारण अंश धारियों को हानि उठानी पड़ी है, तो कंपनी द्वारा इस लापरवाही के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किए जाने पर अंकेक्षक को उत्तरदाई होना पड़ेगा परंतु यदि लेखा अंकेक्षक ने लापरवाही तो की है लेकिन इस कारण किसी अंश धारी को कोई हानि ना हुई हो तो अंकेक्षक उत्तरदाई नहीं होगा और अगर बिना लापरवाही के भी अंश धारियों को हानि हो जाए तो भी अंकेक्षक उत्तरदाई नहीं होगा। अंकेक्षक के निम्नलिखित कार्यों को दायित्व में लापरवाही वाले कार्य कहा जाएगा (a) खुदरा रोकड़ बही के बाकी का सत्यापन ना करना लापरवाही है (b) अंतर नियमों को ना देखना तथा पूंजी में से लाभ बांटने पर विरोध न करना भारी लापरवाही है। (c)अप्राप्य ऋण व उसके संचय की प

अकेक्षक की प्रतिनियुक्ति( reappointment of an auditor)अकेक्षक की अयोग्यताएं( disqualification of auditor)

  अकेक्षक की प्रतिनियुक्ति( reappointment of an auditor) कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 139 के अंतर्गत अकेक्षक के पद पर पुनः नियुक्ति की जा सकती है। इस अधिनियम की धारा 141 में भी उप बंधित किया गया है कि प्रत्येक कंपनी अपने सेवानिवृत्ति होने वाले लेखा परीक्षक को ही आगामी 5 वर्ष की अवधि के लिए पुनः  लेखा परीक्षक के पद पर नियुक्त कर सकती है परन्तु  लिखित परिस्थितियों में उसे उसके पद पर पुनः  नियुक्त नहीं किया जा सकता है (a) यदि सेवानिवृत्ति होने वाला व्यक्ति किन्ही कारणों से उस पद नियुक्ति के लिए अपात्र हो गया हो (b) यदि वह स्वेच्छा से अपनी पुनः नियुक्ति नहीं चाहता हो (c) यदि कंपनी की साधारण सभा में सेवानिवृत्ति होने वाले लेखा परीक्षक को पुनः नियुक्त न किए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया हो (d) यदि कंपनी की साधारण सभा में कार्यरत लेखा परीक्षक की मृत्यु अथवा अक्षमता का नोटिस दिया गया हो               वर्तमान अधिनियम 2013 की धारा 141 के अंतर्गत राज्यों से अर्हता  प्राप्त  लेखा परीक्षकों को किसी कंपनी के लेखा परीक्षक के पद पर नियुक्ति के लिए अर्ह नहीं माना गया है। इसी प्रकार किसी फर्