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Showing posts from January, 2021

कानूनी मामलों में चिकित्सा साक्ष्य की क्या भूमिका होती है?What role does medical evidence play in legal cases?

औद्योगिक विवाद कब व्यक्तिगत विवाद बन जाता है और व्यक्तिगत विवाद कब औद्योगिक विवाद बन जाता है: Industrial dispute and an individual dispute becomes an industrial dispute

Industrial disputes: औद्योगिक विवाद                 औद्योगिक विवाद से तात्पर्य ओजुको और नियोजक ओं के बीच कर्मचारियों और कर्मचारियों के बीच आयोजकों और कर्मचारियों के बीच ऐसे विवाद या मध्य से है जो किसी व्यक्ति के नियोजन या नियोजन या नियोजन की शर्तों या श्रम की शर्तों से संबंधित है.                     औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ठ) के अनुसार औद्योगिक विवाद से तात्पर्य ऐसे विवाद से है जो - ( 1) नियोजक और कर्मचारियों के मध्य ( 2) नियोजक और नियोजक के बीच में ( 3) कर्मचारियों और कर्मचारियों के बीच में हो तथा ऐसे विवाद का संबंध )) सेवा और नियोजन )) बेकारी )) नियोजन की शर्तें )) श्रम की शर्तें Standard coal Company Limited versus SP Verma and others: के मामले में औद्योगिक विवाद के बारे में यह निर्धारित किया गया कि आवश्यक नहीं है कि औद्योगिक विवाद का आरंभ किसी समस्या को दूर करने की मांग को मालिक द्वारा ठुकराए जाने से है. कल्याणी प्रेस बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश के बाद में यह कहा गया कि विवाद किसी व्यक्तिगत श्रमिक तथा अव्यवस्थाओं के बीच आरंभ हो सकता है परंतु जब इस विवाद के निपटारे के लिए

महिलाओं के साथ छेड़छाड़ एक दंडनीय अपराध है (the Indian penal code for the provision of the outraging of modesty)

  स्त्री की लज्जा bhang करने के आशय से उस पर हमला आपराधिक बल का प्रयोग (assault of criminal force to women with intent to outrage her modesty) धारा 354 के अनुसार, जो कोई किसी स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से क्या यह संभव जानते हुए कि वह उस द्वारा उसकी लज्जा भंग करेगा उसे स्त्री पर हमला करेगा या अपराधिक बल को प्रयोग करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 3 वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा. शीलभंग या लज्जा भंग की आवश्यक शर्तें (essential of outrage of modesty) धारा 354 के अंतर्गत शीलभंग के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक है ( 1) किसी स्त्री की लज्जा भंग करने का आशय होना चाहिए ( 2 ) ऐसी लज्जा भंग करने के लिए स्त्री पर हमला करना ( 3) ऐसी स्त्री पर आपराधिक बल का प्रयोग करना लज्जा या शीलभंग: लज्जा नारी का एक स्वभाव है. स्त्री चाहे वह किसी भी आयु के क्यों ना हो उसमें लज्जा होती है भारतीय दंड संहिता की धारा 10 के अनुसार स्त्री शब्द किसी भी आयु की मानव नारी की पहचान बताने के लिए होता है ( 1) स्टेट ऑफ पंजाब बनाम मेजर सिंह A.I.R 1967 S.C.63 में यह कहा

महिला और बालकों के कल्याण के लिए संवैधानिक प्रावधान (constitutional provision relating to Welfare of the women and children)

  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में  विधि के समक्ष समानता और अनुच्छेद 15 में धर्म मूल वंश जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर  भेदभाव करने का मना किया गया है. अनुच्छेद 14 का कहना है कि (1) राज्य किसी नागरिक के खिलाफ धर्म मूल वंश जाति लिंग जन्म स्थान में से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा . (2) कोई नागरिक केवल धर्म मूल वंश जाति लिंग जन्म स्थान में किसी के आधार पर सार्वजनिक भोजनालय दुकानों होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान में प्रवेश पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से राज्य निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए छोड़े गए कुओं तालाबों स्नान घाटों सड़कों और सार्वजनिक व्यवहार के स्थानों के उपयोग के संबंध में किसी भी योग्यता दायित्व रुकावट या कोई भी शर्त  के अधीन नहीं होगा.           इस प्रकार  अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 (1) ,  (2) से यह स्पष्ट होता है कि केवल लिंग के आधार पर उपरोक्त प्रकार का भेदभाव नहीं भरता जाएगा. विधि के समक्ष पुरुष एवं महिलाएं समान होंगी तथा उन्हें विधियों का समान संरक्षण प्राप्त होगा. (  1). काठी रनिंग बनाम सौराष्ट्र राज्य A.I.R1952 s.c. 123 इसमें भेदभाव का अर

हिंदू नारी संपदा (nature and features of Hindu women Estate)

  हिंदू नारी संपदा (hindu women's  state) हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में  यह पारित होने से प्राचीन हिंदू विधि के अंतर्गत हिंदू स्त्री द्वारा अर्जित संपत्ति दो प्रकार की होती थी. 1. स्त्रीधन जो उसकी पूर्ण संपत्ति होती थी. 2. नारी संपदा जिसमें उसको सीमित अधिकार था.    अता नारी संपदा व संपत्ति है जो कोई नारी किसी पुरुष या नारी से दाय विभाजन में प्राप्त करती है. नारी संपदा को विधवा संपदा या सीमित संपदा के नाम से भी पुकारा जाता था. कोई हिंदू नारी नारी संपदा को अपने जीवन पर उपभोग कर सकती थी वह केवल निम्नलिखित तीन परिस्थितियों को छोड़कर किसी अन्य परिस्थिति में संपत्ति का अन्य संक्रमण (ally Nation) नहीं कर सकती थी. 1. कानूनी आवश्यकत 2. संपदा के लाभ के लिए 3. उत्तर भोगियों की सहमति             हिंदू स्त्री अपने जीवन काल में यदि चाहे तो उत्तर भोगियों के पक्ष में समर्पण कर सकती थी उसकी मृत्यु के पश्चात संपत्ति उसके दाए दो को ना प्राप्त होकर संपत्ति है विगत पूर्ण स्वामी के दाए दो को प्राप्त होती थी स्त्री धन के ऊपर नारी का स्वामित्व होता था. परंतु अब  हिंदू उ

दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार भरण पोषण की मांग के आधार (claim of maintenance under the provision of Criminal Procedure Code)

 प्रत्येक समर्थ व्यक्ति का यह कर्तव्य होता है कि वह अपनी पत्नी संतान और माता पिता का भरण पोषण करें. यदि वह ऐसा जानबूझकर या लापरवाही से या किसी अन्य उद्देश्य नहीं करता है तो न्यायालय जहां उचित समझे उसको इन भरण पोषण करने का आदेश दे सकता है.. भरण पोषण की मांग कौन कर सकता है? (who can claim maintenance) पत्नी संतान और माता पिता भरण पोषण की मांग कर सकते हैं. धारा 125 से 128  तब इस संबंध में की गई व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार कोई व्यक्ति जिसके पास पर्याप्त साधन हो.... 1. पत्नी का जो भरण पोषण करने में असमर्थ है 2. अपनी वैध या अवैध संतान का जो नाबालिक हो चाहे विवाहित हो या नहीं हो जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है. 3. अपनी वैद्य या अवैध संतान (जो एक विवाहित पुत्री नहीं है) बालगी प्राप्त कर ली है जहां ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक क्षमता या क्षति के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है. 4. अपने माता-पिता का जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं भरण पोषण करने में लापरवाही या भरण पोषण करने से इनकार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ऐसी लापरवाही का इनकार के साबित हो जाने पर ऐस

भारतीय दंड संहिता 1860 "दहेज उत्पीड़न हत्या"(indian Penal Code 1860 regarding the appointment of suicide and dowry death of women)

  भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 304 ( ) के अनुसार (1) जहां विवाह के 7 वर्ष के भीतर स्त्री की मृत्यु जल जाने से या शारीरिक क्षति से या समान परिस्थितियों से भिन्न परिस्थितियों  में हो जाती है और यह दिखाया जाता है कि मृत्यु से ठीक पहले उसे उसके पति द्वारा या पति के रिश्तेदारों द्वारा दहेज के लिए मांग को लेकर परेशान किया गया था या उसके साथ निर्दयता पूर्वक व्यवहार किया गया था तो इसे दहेज मृत्यु कहा जाएगा और उसकी मृत्यु का कारण उसके पति या रिश्तेदार को माना जाएगा. स्पष्टीकरण (explanation): इस धारा के प्रयोजन के लिए “दहेज” से  तात्पर्य वही है जो दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की  धारा 3 में परिभाषित है.         (2) जो कोई दहेज मृत्यु कार्य करेगा वह उतनी अवधि तक के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जो 7 वर्ष से कम नहीं होगी लेकिन जो आजीवन कारावास तक हो सकती है. दहेज मृत्यु की बढ़ती हुई घटनाओं को देखते हुए 1986 में धारा 304 ( ) भारतीय दंड संहिता में जोड़ी गई है. यह धारा एक नए अपराध का निर्माण करती है. ( 1) श्रीमती शांति बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा एआईआर 1991 मैं यह  कहा गया कि अभियुक्त गण का मृतक के पिता

वेश्यावृत्ति की समस्या और महिलाओं के साथ उत्पीड़न (problem of prostitution and harassment of of womens in public place and offices)

 वे श्यावृत्ति वेश्यावृत्ति की उत्पत्ति और विकास का वर्णन करते हुए TRAFT  कहा है कि जब विवाह की प्रथा कमजोर हुई वेश्यावृत्ति भी पतन की ओर उन्मुख होती गई. अतः एक प्रकार से वेश्यावृत्ति नैतिकता का आवरण है पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव तथा भारतीय नैतिक दृष्टिकोण में तेजी से ह्रास के कारण भारत में आज वेश्यावृत्ति को एक आप पर्याय आवश्यकता तथा लोगों के समान नैतिक आचरण को रक्षा के साधन के रूप में स्वीकार कर लिया गया है.        इतिहास बताता है कि भारत में वेश्यावृत्ति की प्रथा प्राचीन काल में चली आ रही है. हिंदू राजाओं के काल में किन्नरी देवदासी आदि होती थी. इस युग में नगर वधू की सत्ता वेश्याओं के लिए प्रयुक्त होती थी. मुस्लिम शासक ऐश्वर्या वान और कामुक होते थे. अतः उनके काल में भी वेश्यावृत्ति रोकने हेतु बड़े कठोर कानून बनाए गए थे वर्तमान कानून भी इस वेश्यावृत्ति को रोकने के असफल रहे हैं. यह एक गंभीर समस्या है जिसका समाधान धैर्य साहस और सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन के द्वारा किया जाना चाहिए वेश्यावृत्ति को अपनाने वाले लोगों के बीच नैतिक मूल्यों के प्रति श्रद्धा और आत्म नियंत्रण की भावना का विक

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की प्राकृतिक एवं विशेषताओं (the nature and characteristic of violence against the women)

  पारिवारिक हिंसा (domestic violence):  पारिवारिक समस्याओं में घरेलू या पारिवारिक हिंसा भी आधुनिक युग में एक प्रमुख समस्या है यद्यपि घरेलू हिंसा परिवार में किसी भी सदस्य के प्रति हो सकती है किंतु पारिवारिक हिंसा का संबंध मुक्ता महिलाओं के प्रति हिंसा के रूप में है इसका कारण यह है कि महिलाएं ही अन्य परिवारों से पत्नी के रूप में यहां आती है कभी-कभी नवीन पारिवारिक परिस्थितियों में उनका सामान जैसे कठिन हो जाता है कभी-कभी दहेज भी उनके प्रति हिंसा का एक प्रमुख कारण बन जाता है पारिवारिक हिंसा के अंतर्गत अन्य सदस्यों के प्रति भी हिंसा कोई आज की घटना नहीं है वरन प्राचीन भारत में भी इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं महाभारत काल में युधिष्ठिर ने अपनी पत्नी द्रौपदी को जुए में दांव पर लगा दिया था तथा दुर्योधन ने भरी सभा में चीरहरण कर उसे अपमानित किया था दहेज को लेकर नारी को जला देना या हत्या कर देना आज के युग की सबसे बड़ी त्रासदी है सतीत्व के नाम पर इसी देश में महिलाओं को जिंदा जलाया जाता रहा है इस प्रकार से महिलाओं का उत्पीड़न व शोषण उनके साथ मारपीट गाली-गलौज करना व जला देना तथा हत्या कर देना पारिवारिक ह