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Showing posts from August, 2021

हिंदू विधि की शाखाएं: The various schools of Hindu law

हिंदू विधि की शाखाएं: - मूल रूप से हिंदू विधि की दो शाखाएं हैं प्रथम मिताक्षरा तथा दूसरी दायभाग । मिताक्षरा विज्ञानेश्वर द्वारा लिखित भाष्य है जो 11वीं शताब्दी में की गई याज्ञवल्क्य स्मृति की व्याख्या दायभाग किसी संहिता विशेष पर आधारित नहीं है वरन सभी सहिताओं का निबंध होने का दावा करता है दायभाग जीमूतवाहन की कृति है दायभाग के सिद्धांत बंगाल में प्रचलित है तथा मिताक्षरा के सिद्धां त भारत के अन्य भागों में समस्त भारत में  सबसे अधिक मान्य ग्रंथ है दायभाग बंगाल में सर्वोपरि माना जाता है मिताक्षरा शाखा का इतना सर्वोपरि प्रभाव है कि बंगाल और आसाम में जहां दायभाग कुछ विषयों पर कौन है वह मिताक्षरा शाखा ही मान्य है मिताक्षरा सभी स्मृतियों का सार प्रस्तुत करती है और दायभाग मूल रूप से विभाजन और उत्तरदायित्व पर एक निबंध है।           डॉ.यू.सी.सरकार ने अपनी पुस्तक हिंदू ला में लिखा है कि मिताक्षरा ना केवल एक भाष्य है वरन् वह स्मृतियों का एक प्रकार का निबंध है जो 11वीं शताब्दी के अंत में या 12 वीं शताब्दी के प्रारंभ में लिखा गया है यह जीमूतवाहन से लगभग 300 व र्ष पूर्व की रचना ह

हिंदू विधि के अंतर्गत वैद्य प्रश्नों के लिए आवश्यक तत्व क्या है? What are the essential of valid customs under Hindu law?

प्रथाओं की परिभाषा: - रूढी और प्रथा पदों से अभिप्रेत है ऐसा कोई भी नियम जिसने दीर्घकाल से एक लगातार और एकरूपता से अनुपालित होने के कारण किसी स्थानीय क्षेत्र जनजाति समुदाय समूह कुटुंब में हिंदुओं के बीच विधि का बल प्राप्त कर लिया है.             अतः प्रथा वह नियम है जिसने किसी विशेष जाति अथवा वर्ग अथवा किसी विशेष जिले अथवा परिवार में दीर्घकाल से प्रथा के रूप में अपनाए जाने के फलस्वरूप कानून की शक्ति प्राप्त कर ली है.            पृवी काउंसिल की जुडिशियल कमेटी ने प्रथाओं के विषयों में यह कहा था कि प्रथाएं किसी स्थान विशेष जाति अथवा परिवार विशेष के चिरकालीन प्रयोग के कारण विधि से मान्यता प्राप्त नियम है ये प्राचीन हो निश्चित हो तथा विवेकपूर्ण हो और यदि विधि के सामान्य नियमों के विरोध में हो तो उसका आशय बहुत ही सावधानी से निकालना चाहिए.            उच्चतम न्यायालय ने आई शिरोमणि बनाम आई हेम  कुमार के वाद में यह निर्धारित किया कि किसी भी प्रथा को मान्यता प्रदान करने के लिए तथा न्यायालय द्वारा अपनाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रथा प्राचीन हो निश्चित हो तथा युक्ति युक्त हो.         दे

हिंदू विधि के प्रमुख स्रोत: What are the various sources of Hindu law

  हिंदू विधि के  स्रोत (sources of Hindu law): - प्राचीन मत के अनुसार विधि एवं धर्म में एक अभिन्न संबंध था तथा विधि धर्म का ही एक अंग मानी जाती थी धर्म के स्रोत ही विधि के स्रोत माने जाते थे मनु के अनुसार वेद, स्मृति, सदाचार एवं जो अपने को तुष्टिकरण लगे यह 4 धर्म के स्पष्ट लक्षण माने गए थे.         याज्ञवल्क्य ने भी धर्म के चार आधार स्तंभ इस प्रकार बतलाए हैं .श्रुति, स्मृति .सदाचार जो अपने को प्रिय लगे तथा सम्यक् संकल्पों से उत्पन्न इच्छाये़। याज्ञवल्क्य ने पुनः विधि के ज्ञान के 14 स्रोत बताएं हैं वेद (4) ,वेदांग (6)धर्मशास्त्र , न्याय  पुराण एवं मीमांसा । Sources of Hindu law: - According to the ancient opinion, there was an integral relationship between law and religion and law was considered a part of religion.  Virtue, virtue and what seems to be appeasement were considered to be the clear signs of 4 religions.   Yajnavalkya has also explained the four pillars of religion in this way. Shruti, Smriti, virtue which is dear to oneself and desires arising from proper resolutions.

उच्चतम न्यायालय के सिविल तथा डांडिक मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार का विस्तृत उल्लेख: Describe the appellate jurisdiction of Civil and criminal matter of Supreme Court of India

सिविल मामलों में अपीलीय अधिकारिता अनुच्छेद 133 सिविल मामलों में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय डिक्री अंतिम आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की व्यवस्था करता है. अनिवार्य शर्तें: - इसके लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा होना आवश्यक है - ( 1) विनिश्चय जिसके विरूद्ध अपील की जानी है भारत राज्य क्षेत्र के किसी उच्च न्यायालय का निर्णय डिक्री या अंतिम आदेश होना चाहिए.      “आदेश की अंतिमत्ता” से अभिप्राय ऐसे आदेश से है जिसमें विनिशचय के लिए पीछे कुछ भी ना बचा हो अर्थात समस्त विवादास्पद बिंदुओं को भी वी निश्चित कर दिया गया हो. ( 2) ऐसा निर्णय डिक्री या अंतिम आदेश किसी सिविल कार्रवाई में दिया गया हो.           “सिविल कार्यवाही के अंतर्गत ऐसे मामले आते हैं जिनमें सिविल अधिकारों से संबंधित कोई प्रश्न अंतर ग्रस्त हो धन की वसूली क्षतिपूर्ति प्रतिकार हैसियत की घोषणा आदि सिविल प्रकृति की कार्रवाई या है.                उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रीट पेश करना सिविल प्रक्रिया एवं कारवाही है. ( 3) इसमें विधि का सार्वजनिक महत्व का कोई सारवान प्रश्न अंतर ग्रस्त होना चा

भारत में उच्चतम न्यायालय की शक्तियां एवं कार्यों का वर्णन: Discuss the power and function of the Supreme Court of India

उच्चतम न्यायालय की शक्तियां एवं कार्य  (power and function of Supreme Court) सुप्रीम कोर्ट की निम्नलिखित शक्तियां एवं कार्य है - ( 1) न्यायालय के पदाधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति की शक्ति है - अनुच्छेद 146 के अंतर्गत - (A) उच्चतम  न्यायालय के पदाधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके निर्देश पर कोई अन्य न्यायाधीश  करेगा किंतु राष्ट्रपति नियम बनाकर यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसे नियम में निर्दिष्ट मामलों में ऐसा कोई व्यक्ति जो पहले से न्यायालय में कार्यरत ना हो न्यायालय से संबंधित किसी भी पद पर बिना संघ लोक सेवा आयोग के परामर्श के नियुक्त नहीं किया जाएगा. (B) संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन रहते हुए उच्चतम न्यायालय के पदाधिकारियों और सेवकों की सेवा शर्ते भारत के मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य न्यायाधीश के द्वारा बनाए गए नियमों में विहित किए गए अनुसार होंगी किंतु जहां तक यह नियम वेतन भत्तों छुट्टि यां पेंशन से संबंधित है उन्हें राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित होना चाहिए. (C) उच्चतम न्यायालय के प्रशासनिक व्यय जिसमें न्यायालय के पदा