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Striving for Equality: The Case for a Uniform Civil Code

मालगुजारी के बंदोबस्त से क्या तात्पर्य है ? बंदोबस्त की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए । ( What do you mean by settlement of land Revenue ? Describe the procedure of land revenue . )

मालगुजारी का बंदोबस्त  ( Settlement of Land Revenue )  किसी भूमि के संबंध में सरकार को देय मालगुजारी के समय - समय पर निश्चित  किए जाने को मालगुजारी का बंदोबस्त कहते हैं । जब किसी क्षेत्र में बन्दोबस्त की कार्यवाही की जाती है तो उसके प्रत्येक जोतदार द्वारा देय मालगुजारी की धनराशि निश्चित अवधि के लिए तय की जाती है ।        बन्दोबस्त अवधि - उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियएम के प्रारम्भ से बीस वर्ष के बाद किसी समय राज्य सरकार किसी जिले या उसके भाग की मालगुजारी का बन्दोबस्त करने का निर्देश दे सकती है । इस पहले वाले बन्दोबस्त को मूल बन्दोबस्त कहा जायेगा । इस बन्दोबस्त की अवधि 20 साल की होगी । राज्य सरकार मूल बन्दोबस्त से बीस साल की अवधि के बाद किसी समय किसी जिले या उसके भाग की मालगुजारी के नये बन्दोबस्त का निर्देश कर सकती है । इस दूसरे बन्दोबस्त को " पुनरीक्षण बन्दोबस्त " की संज्ञा दी जायेगी । परन्तु यदि इस पुनरीक्षण बन्दोबस्त में किसी कारण देर हो गई हो या राज्य सरकार के मत में इस बन्दोबस्त की कार्यवाही अनावश्यक होगी , तो राज्य सरकार चालू बन्दोबस्त को ऐसे समय क

धारा 131 ख क्या होती है ?इसके अन्तर्गत भूमिधर बने अनुसूचित जाति के सदस्यों द्वारा भूमि बिक्री पर प्रतिबंध क्या होता है?What is Section 131B? Under this, what is the ban on sale of land by members of Scheduled Castes who have become landowners?

धारा 131 - ख के अधीन भूमिधर बने अनुसूचित जाति के सदस्यों द्वारा भूमि के अंतरण पर प्रतिबंध              यह धारा उत्तर प्रदेश भूमि विधि ( Revised ) अधिनियम ( 1997 ) द्वारा जोड़ी गई है । “ धारा 157 क में किसी बात के होते हुए तथा धारा 153 से 157 में दिए हुए प्रतिबन्ध पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को जो धारा 131 ख के आधीन भूमिधर हुआ है किसी SC से भिन्न किसी व्यक्ति को विक्रय , दान बंधन या पट्टे पर भूमि अंतरित करने का अधिकार नहीं होगा तथा ऐसे अंतरण , यदि कोई  ही निम्न अधिनियम क्रम में होगा  ( i ) भूमिहीन खेतिहर मजदूर ,  ( ii ) सीमान्त किस्म , (3) लघु कृषक ,  ( 4 ) खण्ड ( क ) , ( ख ) तथा ( ग ) में निर्दिष्ट व्यक्ति से निम्न कोई व्यक्ति ।  Prohibition on transfer of land by members of Scheduled Castes who have become landholders under section 131-B  This section has been added by Uttar Pradesh Land Law (Revised) Act (1997).   “Notwithstanding anything contained in section 157A and without prejudice to the restrictions contained in sections 153 to 157, a person belo

भूराजस्व वसूल करने का दायित्व किसका होता है ? ( Which is Responsible for the collection of land revenue ? )

 अधिनियम के अन्तर्गत , तहसीलदार द्वारा प्रमाणित हिसाब का लेखा , इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए मालगुजारी के बाकी होने का , उसकी मात्रा का और ऐसे व्यक्ति का जो बाकीदार है , निश्चायक प्रमाण होगा । कमीशन 5 से 10 प्रतिशत तक हो सकता है । परिथितियों को ध्यान में रखकर कमीशन का निर्धारण किया जाता है । किन्तु किसी ऐसे गाँव में , जिनके सम्बन्ध में धारा 276 के अधीन आज्ञा दी गयी हो , ऐसा लेखा किसी विशेष बाकीदार के सम्बन्ध में भूमि प्रबन्धक समिति द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है । ( धारा 278 ) चूँकि भूमियों तथा उसकी मालगुजारी के सभी आवश्यक कागजात , खसरा खतौनी , जमाबन्दी तहसील पर ही रहती है इसलिए रिकार्ड को देखकर इसे आसानी से पता लगाया जा सकता है कि कौन - कौन बकायेदार हैं और कौन लोग मालगुजारी अदा कर चुके हैं ।  बकाया भूराजस्व की प्रक्रिया ( Processes for Realisation of Arrears )  अधिनियम की धारा 279 के अन्तर्गत बकाया भू - राजस्व निम्नलिखित रीतियों में से एक था , अधिकार प्रकार से वसूल किया जा सकेगा ।  ( i ) किसी बाकीदार ( चूककर्ता ) पर माँग - पत्र या उपस्थिति पत्र तामील करके ,  ( ii ) उस व्

भूमि बन्दोबस्त अधिकारी के कर्तव्य एवं अधिकार क्या होतें हैं?(what is the power and function of settlement office )

भूमि बंदोबस्त  अधिकारी के कर्तव्यों एवं अधिकार ( Power and Functions of Settlement Officer )  अधिनियम की धारा -225 के अन्तर्गत राज्य सरकार किसी जिले या उसके भाग के बंदोबस्त  का भार ग्रहण करने के लिए एक बन्दोबस्त अधिकारी तथा उतने  सहायक बंदोबस्त  अधिकारी , जितने कि वह उचित समझे , नियुक्त कर सकती है और जब तक उक्त जिला या उसका भाग बन्दोबस्त कार्रवाई के अधीन रहेगा तब तक ऐसा अधिकारी उन अधिकारों का प्रयोग करेंगे जो उन्हें इस अधिनियम के द्वारा दिये गये हैं । नियुक्ति का क्या ढंग होगा , इसके बारे में सरकार ही  निर्णय करने में सक्षम तथा उपर्युक्त अथोरिटी है । नियुक्ति प्रोमोशन से अथवा सीधे - सीधे की जा सकती है । कितनी संख्या में अधिकारी वांछित हैं , उसे भी राज्य सरकार ही निर्णीत करेगी ।       सभी अधीनस्थ अधिकारी तथा कर्मचारी बन्दोबस्त अधिकारी के नियन्त्रण तथा निर्देश में कार्य करेंगे । सामान्यता कलेक्टर को ही बन्दोबस्त अधिकारी बना दिया जाता है , यही व्यावहारिक भी प्रतीत होता है ।     अधिनियम की धारा -256 के अन्तर्गत , कोई जिला या उसका भाग बन्दोबस्त कार्रवाई के अधीन हो जाने पर राज्य

सीमा चिन्ह (Boundary marks) क्या होते हैं ?इनका निर्माण किस प्रकार किया जाता है?

  सीमा चिह्न ( Boundary Marks )  भूमि रिकार्ड्स मैनुअल के पैरा 587 के अनुसार सीमा चिह्न के अन्तर्गत प्रत्येक ऐसा स्थायी चिह्न शामिल है जो किसी गाँव या खेत की सीमा का द्योतक है जो चाहे ऐसा चिह्न सर्वे के दौरान बनाया गया हो या विवादिता सीमा को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया हो । इस प्रकार किसी गाँव या खेत की सीमा को दर्शित या सुनिश्चित करने वाला प्रत्येक चिह्न सीमा चिह्न कहलाता है ।       भूमि से सम्बन्धित अभिलेख को तैयार करने तथा रख - रखाव के लिए सीमा चिह्नों का होना जरूरी होता है कोई क्षेत्र जब अभिलेख प्रवर्तन में होता है तो अभिलेख अधिकारी घोषणा के द्वारा सभी ग्राम सभाओं में तथा भूमि मालिकों को निर्देश देते हैं कि पन्द्रह दिनों के अंतर्गत सीमा चिह्नों को बना लें । अगर वे निर्देश का पालन करने में चूकते हैं तो अभिलेख ऑफीसर सीमा चिह्नों का निर्माण तथा स्थापना कर देगा तथा कलेक्टर उन खर्चों को धारा 50 के अनुसार तत्सम्बन्धित ग्राम पंचायतों अथवा जोतदारों से वसूल करेगा ।      प्रत्येक जोतदार का यह अपना कर्त्तव्य होता है कि वह अपनी जोतों पर वैध रूप से निर्मित स्थाई सीमा चिह्न की दे

दीवानी न्यायालयों का क्षेत्राधिकार प्रतिबंधित करने के लिये उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 के अन्तर्गत कौन कौन से मामलें हो सकते हैं?What are the cases under the Uttar Pradesh Zamindari Abolition and Land Reforms Act 1950 to restrict the jurisdiction of civil courts?

राजस्व न्यायालयों का एकमात्र क्षेत्राधिकार ( the exclusive  jurisdiction of revenue board ) हमारे देश के प्रत्येक राज्य में लगान मालगुजारी और भूमि संबंधी मामलों में राजस्व न्यायालयों  को एकमात्र क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है । वह शायद इस कारण कि राजस्व न्यायालयों के अधिकारी इन मामलों में अधिक जानकारी रखते हैं और यह कि दीवानी न्यायालय द्वारा निर्णय होने में काफी विलंब होता है और प्रक्रिया भी काफी पेचीदी है । ऐसा आमतौर पर महसूस किया गया कि राजस्व न्यायालय सस्ता और शीघ्र मिल जाने वाला अनुतोष ( relief ) प्रदान कर सकेगा ।  इस प्रकार उ . प्र . जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम की धारा 331 ( 1 ) यह प्रावधानित करती है कि- " उन अपवादों को छोड़कर जो अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रावधानित हैं , दीवानी प्रक्रिया संहिता ( सी . पी . सी . ) की धारा 158 में किसी बात के रहते हुए भी इस अधिनियम की ' द्वितीय अनुसूची ' के खाना 4 में उल्लिखित न्यायालय के अतिरिक्त कोई अन्य न्यायालय उक्त अनुसूची के खाना 3 में वर्णित किसी वाद , प्रार्थना - पत्र या कार्यवाही पर या ऐसे वाद हेतु पर आधारित व