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Striving for Equality: The Case for a Uniform Civil Code

चार्जशीट क्या होती है? यह कब और कहां दाखिल की जाती है ?

Crpc की धारा 173 में चार्जशीट की के बारे में उल्लेख किया गया है। जिसमें बताया गया है कि पुलिस द्वारा किसी केस की जांच की अंतिम रिपोर्ट Crpc की धारा 173(2) के अन्तर्गत चार्जशीट कहलाती है। चार्जशीट को किसी आरोपी के खिलाफ 60 से 90 दिनों के अंदर जांच अधिकारी द्वारा  कोर्ट के समक्ष पेश किया जाता है। अगर पुलिस द्वारा चार्जशीट कोर्ट में नही पेश की जाती है तो गिरफ्तारी को अवैध माना जाता है और आरोपी जमानत पाने का हकदार बन जाता है।  के .वीरास्वामी बनाम भारत सरकार और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि CrPC की धारा 173(2) के तहत चार्जशीट अतिम रिपोर्ट है।  Section 173 of CrPC mentions about charge sheet.  In which it is said that the final report of investigation of a case by the police is called charge sheet under section 173(2) of CrPC.  The charge sheet against an accused is presented before the court by the investigating officer within 60 to 90 days.  If the charge sheet is not presented in the court by the police then the arrest is considered illegal and the accused becomes entitled

section 498A IPC सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला २०२३।

धारा 498A IPC का अनुच्छेद विवाहित पुरुषों के खिलाफ दहेज के अत्यधिक शिकायत करने की प्रक्रिया को विवरणित करता है। यह धारा विवाहित महिलाओं को दहेज और उनका उनके प्रति की गई मानसिक, शारीरिक या किसी प्रकार के क्रूर व्यवहार के खिलाफ रक्षा प्रदान करती है।  या  सरल शब्दों में हम कहे की धारा 498A आई.पी.सी का वह सेक्शन है जिसमें किसी शादीशुदा महिला पर उसके पति या उसके पति के घरवाले या उसके  रिश्तेदार जो उसके खिलाफ किसी प्रकार की क्रूरता करने के लिये कहते हैं। ऐसे लोग धारा 498A के तहत अपराध के दायरे में आते हैं। क्रूरता, शारीरिक और मानसिक दोनो ही प्रकार की हो सकती है। शारीरिक  क्रूरता में महिला के साथ मारपीट जबकि मानसिक क्रूरता  के अन्तर्गत गाली-गलौज, ताने मारना या बात-बात पर किसी भी तरह मानसिक रूप से प्रताडित करना शामिल है ।  Section 498A of the IPC details the procedure for filing complaints of excessive dowry against married men.  This section protects married women against dowry and any kind of mental, physical or cruel treatment done to them.   Or  In simple words, we say that Section 498A of

आई.पी.सी. की धारा 383 क्या है? विस्तार से बताइए।IPC What is section 383 of IPC? Explain in detail.

भारतीय दंड संहिता की धारा 383 में उद्दीपन की परिभाषा दी गई है। जो इस प्रकार है- कोई किसी व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को जानबूझकर क्षति पहुंचाने का भय उत्पन्न करता है और इस प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को कोई मूल्यवान संपत्ति या प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके किसी व्यक्ति को प्रदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है वह उद्दापन करता है।      यदि हम उद्दापन को आम बोलचाल की भाषा में बात करें तो यह अलग-अलग रूप से हमें समझ में आती है अगर हम यूपी और बिहार स्टेट में बात करें तो यहां पर इस प्रकार के कृत्य को रंगदारी के नाम से जाना जाता है रंगदारी एक प्रकार से दबंगों गुंडों द्वारा किसी व्यक्ति को जान से मारने की धमकी और उस धमकी की एवज में उनसे एक मोटी रकम या किसी भी प्रकार की प्रॉपर्टी की मांग करना भी उद्यापन की श्रेणी में आता है। अगर हम अन्य राज्यों में बात करते हैं तो मुंबई मैं जिस प्रकार अंडरवर्ल्ड का दौर था वहां पर उद्यापन को या रंगदारी वसूलने के या धन उगाही करने का तरीका अंडरवर्ल्ड का प्रमुख व्यवसाय था। ऐसी परिस्थितियों में अगर हम बात करें तो आईपीसी की सेक्शन 386 यहां पर ल

भारतीय दंड संहिता में धारा 100 क्या होती है? धारा 100- शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब होता है ? What is section 100 in the Indian Penal Code? Section 100- When does the right of private defense of the body extend to causing death?

धारा 100 में उन छ: परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें अभियुक्त को व्यक्तिगत प्रति रक्षा के अधिकार या शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, पूर्ववर्ती अन्तिम  धारा में वर्णित निर्बन्धनों के अधीन रहते हुये हमलावर की मृत्युकारित करने पर भी अपराध नही माना जाता है क्योंकि उसका कृत्य निजी प्रतिरक्षा के अधिकार तक नही किया गया होता है। यदि अभियुक्त की धारा 100 में उपबन्धित किसी क्षति की युक्ति युक्त, आंशका हो  तो  वह हमलावर की मृत्युकारित कर सकेगा और ऐसी दशा में यह नही माना  जायेगा कि उसने निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का उल्लघंन किया है।  निम्नलिखित अवस्थाओं में निजी सुरक्षा का अधिकार किसी की मृत्यु कारित कर दिये जाने तक विस्तृत हो जाता है। ये अवस्थाये  निम्नलिखित हैं-   (i) ऐसा हमला जिसका परिणाम मृत्यु होने की आंशका से→ ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कार्य हो जाएगी अन्यथा हमले का परिणाम मृत्यु होगी।                                                           धारा 100 Section 100 mentions six circumstances in which the accused is not considered to be guilty of the of

अवश्यम्भावी दुर्घटनाएँ क्या है ? यह दैवीय कृत्य से किस प्रकार भिन्न है?What are inevitable accidents? How is it different from act of God?

अवश्यम्भावी दुर्घटनाएँ (Inevitable Accidents):- अवश्यम्भावी दुर्घटनाओं से तात्पर्य ऐसी दुर्घटनाओं से है जिन्हें किन्हीं सावधानियों से बचाया नहीं जा सकता है। इसका तापर्त्य ऐसी दुर्घटना नहीं है जिसका घटित होना पूर्णतया असम्भव हो, वरन् इसका तात्पर्य है कि उसे एक सामान्य व्यक्ति द्वारा युक्तियुक्त सतर्कता द्वारा रोकना सम्भव नहीं था। विधि किसी व्यक्ति से युक्तियुक्त सम्भावनाओं के प्रति सचेत होने की आशा करती है। परन्तु वह विलक्षण घटनाओं के प्रति सचेत होने के लिए बाध्य नहीं है। जैसे-यदि एक कार के ड्राइवर को कार चलाते समय दौरा पड़ता है और उससे दुर्घटना हो जाती है या वह गैराज से मरम्मत करवा के गाड़ी निकालने समय ब्रेक फेल हो जाने के कारण कोई दुर्घटना हो जाती है तो इन दोनों मामलों में अवश्यम्भावी दुर्घटना का बचाव लागू होगा। Inevitable Accidents:- Inevitable accidents refer to such accidents which cannot be avoided by taking any precautions.  It does not mean such an accident which is completely impossible to happen, but it means that it was not possible to prevent it by an ordinary person by taki

क्षति की दूरस्थता क्या होती है ? क्षति की दूरस्थता को निश्चित करने के लिये क्या नियम है?What is remoteness of damage? What are the rules for determining the remoteness of injury?

अपकृत्य हो जाने के बाद प्रतिवादी के दायित्व का प्रश्न उठता है। किसी दोषपूर्ण कार्य के अन्तहीन (endless) परिणाम हो सकते हैं, अथवा उसके परिणामों के भी परिणाम हो सकते हैं। उदाहरण के लिये, एक साइकिल सवार असावधानी के साथ एक ऐसे पदयात्री को ठोकर मारता है, जो अपने जेब में एक बम लेकर जा रहा था। पदयात्री जैसे ही भूमि पर गिरता है, बम का विस्फोट हो जाता है। पदयात्री और चार अन्य व्यक्ति जो सड़क पर से जा रहे थे, इस विस्फोट के कारण मृत्यु ग्रस्त हो जाते हैं। सड़क के समीप का एक भवन बम विस्फोट के परिणामस्वरूप आग में जलने लगता है, और असमें कुछ महिलायें और बच्चे गम्भीर रूप से जल जाते हैं। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि साइकिल सवार इन समस्त परिणामों के लिये उत्तरदायी है ? After the commission of the tort, the question of the liability of the defendant arises.  A wrongful act can have endless consequences, or its consequences can also have consequences.  For example, a cyclist may inadvertently hit a pedestrian who was carrying a bomb in his pocket.  The bomb explodes as the pedestrian falls to the ground.  Pe