Skip to main content

Supreme Court Judgments February 2026

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105: अपरोक्ष हत्या का अपराध, सजा और उदाहरण (पूर्व में IPC की धारा 304)

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105: हत्या का अपरोक्ष अपराध (पूर्व में IPC की धारा 304)→

परिचय→
भारतीय दंड संहिता (IPC) में संशोधन के बाद इसे अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) के रूप में जाना जाता है, जिसमें कई धाराओं में परिवर्तन किए गए हैं। IPC की धारा 304 को अब BNS की धारा 105 के रूप में जाना जाता है। यह धारा उन मामलों पर लागू होती है जब किसी व्यक्ति की हत्या तो हुई होती है, लेकिन इसे प्रत्यक्ष हत्या (murder) नहीं, बल्कि "अपरोक्ष हत्या" या "गैर-इरादतन हत्या" (culpable homicide not amounting to murder) माना जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें आरोपी का इरादा किसी की जान लेने का नहीं होता है, लेकिन उसके कार्य से किसी की मृत्यु हो जाती है।

 धारा 105 का उद्देश्य→
धारा 105 का उद्देश्य उन अपराधों पर कार्रवाई करना है जिनमें व्यक्ति ने ऐसे कार्य किए जो किसी की मृत्यु का कारण बने, लेकिन उसका सीधा उद्देश्य हत्या करना नहीं था। इस धारा के तहत, कानून यह मानता है कि आरोपी ने स्थिति को ध्यान में रखकर, या तो अनजाने में या लापरवाही से ऐसा किया जिससे किसी की जान चली गई। 

धारा 105 के अंतर्गत अपराध का वर्गीकरण
BNS की धारा 105 को दो भागों में विभाजित किया गया है:→

1. पहला भाग→: जब अपराध करने वाले को यह पता था कि उसका कार्य जानलेवा हो सकता है लेकिन उसने इसे रोका नहीं, जिससे किसी की मृत्यु हो गई। इसे "अपरोक्ष हत्या" के अंतर्गत आता है और इसकी सजा कड़ी होती है।

2. दूसरा भाग→: जब अपराध करने वाले ने अज्ञानता या लापरवाही के कारण जानबूझकर नहीं, लेकिन गलती से ऐसा कार्य किया जिससे मृत्यु हुई। ऐसे मामलों में सजा कम होती है क्योंकि व्यक्ति का उद्देश्य जान लेने का नहीं था।

 सजा का प्रावधान→
BNS की धारा 105 के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की हत्या अप्रत्यक्ष रूप से हो जाती है और यह साबित होता है कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसा कार्य नहीं किया, तो उसे 10 वर्ष की सजा या आर्थिक दंड (fine) दिया जा सकता है। यदि उसका कार्य अत्यंत घातक था, तो आजीवन कारावास की सजा भी दी जा सकती है। 

धारा 105 के अंतर्गत उदाहरण→
1. उदाहरण 1→: मान लीजिए कि एक व्यक्ति ने अपने खेत में जंगली जानवरों से बचाव के लिए एक जाल बिछाया है। गलती से एक व्यक्ति उस जाल में फंस जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। ऐसे में, खेत का मालिक उस व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है लेकिन उसका उद्देश्य हत्या नहीं था। इस स्थिति में धारा 105 के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है।

2. उदाहरण 2→: एक फैक्ट्री का मालिक सुरक्षा मानकों का पालन किए बिना एक मशीनी उपकरण का उपयोग करवा रहा है। किसी कर्मचारी की इस मशीनी उपकरण के कारण मृत्यु हो जाती है। यहां फैक्ट्री मालिक की लापरवाही के कारण मृत्यु हुई है, इसलिए इसे धारा 105 के तहत दर्ज किया जा सकता है।

 धारा 105 और हत्या में अंतर:→
धारा 105 और हत्या (murder) में एक मूलभूत अंतर होता है - हत्या के मामलों में आरोपी का इरादा जान लेने का होता है जबकि धारा 105 में ऐसा नहीं होता। धारा 105 की परिभाषा और सजा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल उन्हीं पर कठोर कार्रवाई की जाए जिनका उद्देश्य जानबूझकर हत्या करना होता है। 

निष्कर्ष:→
BNS की धारा 105 (पूर्व में IPC की धारा 304) का महत्व भारतीय न्यायिक प्रणाली में इसलिए है कि यह इरादतन और गैर-इरादतन अपराधों में स्पष्ट अंतर करता है। यह धारा न केवल न्याय व्यवस्था में सटीकता लाती है, बल्कि लापरवाही और अज्ञानता के कारण हुई मौतों के मामलों में सही सजा देने में भी सहायक है।

Comments

Popular posts from this blog

असामी कौन है ?असामी के क्या अधिकार है और दायित्व who is Asami ?discuss the right and liabilities of Assami

अधिनियम की नवीन व्यवस्था के अनुसार आसामी तीसरे प्रकार की भूधृति है। जोतदारो की यह तुच्छ किस्म है।आसामी का भूमि पर अधिकार वंशानुगत   होता है ।उसका हक ना तो स्थाई है और ना संकृम्य ।निम्नलिखित  व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आसामी हो गए (1)सीर या खुदकाश्त भूमि का गुजारेदार  (2)ठेकेदार  की निजी जोत मे सीर या खुदकाश्त  भूमि  (3) जमींदार  की बाग भूमि का गैरदखीलकार काश्तकार  (4)बाग भूमि का का शिकमी कास्तकार  (5)काशतकार भोग बंधकी  (6) पृत्येक व्यक्ति इस अधिनियम के उपबंध के अनुसार भूमिधर या सीरदार के द्वारा जोत में शामिल भूमि के ठेकेदार के रूप में ग्रहण किया जाएगा।           वास्तव में राज्य में सबसे कम भूमि आसामी जोतदार के पास है उनकी संख्या भी नगण्य है आसामी या तो वे लोग हैं जिनका दाखिला द्वारा उस भूमि पर किया गया है जिस पर असंक्रम्य अधिकार वाले भूमिधरी अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते हैं अथवा वे लोग हैं जिन्हें अधिनियम के अनुसार भूमिधर ने अपनी जोत गत भूमि लगान पर उठा दिए इस प्रकार कोई व्यक्ति या तो अक्षम भूमिधर का आसामी होता ह...

बलवा और दंगा क्या होता है? दोनों में क्या अंतर है? दोनों में सजा का क्या प्रावधान है?( what is the riot and Affray. What is the difference between boths.)

बल्बा(Riot):- भारतीय दंड संहिता की धारा 146 के अनुसार यह विधि विरुद्ध जमाव द्वारा ऐसे जमाव के समान उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए बल या हिंसा का प्रयोग किया जाता है तो ऐसे जमाव का हर सदस्य बल्बा करने के लिए दोषी होता है।बल्वे के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है:- (1) 5 या अधिक व्यक्तियों का विधि विरुद्ध जमाव निर्मित होना चाहिए  (2) वे किसी सामान्य  उद्देश्य से प्रेरित हो (3) उन्होंने आशयित सामान्य  उद्देश्य की पूर्ति हेतु कार्यवाही प्रारंभ कर दी हो (4) उस अवैध जमाव ने या उसके किसी सदस्य द्वारा बल या हिंसा का प्रयोग किया गया हो; (5) ऐसे बल या हिंसा का प्रयोग सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हो।         अतः बल्वे के लिए आवश्यक है कि जमाव को उद्देश्य विधि विरुद्ध होना चाहिए। यदि जमाव का उद्देश्य विधि विरुद्ध ना हो तो भले ही उसमें बल का प्रयोग किया गया हो वह बलवा नहीं माना जाएगा। किसी विधि विरुद्ध जमाव के सदस्य द्वारा केवल बल का प्रयोग किए जाने मात्र से जमाव के सदस्य अपराधी नहीं माने जाएंगे जब तक यह साबित ना कर दिया जाए कि बल का प्रयोग कि...

पार्षद अंतर नियम से आशय एवं परिभाषा( meaning and definition of article of association)

कंपनी के नियमन के लिए दूसरा आवश्यक दस्तावेज( document) इसके पार्षद अंतर नियम( article of association) होते हैं. कंपनी के आंतरिक प्रबंध के लिए बनाई गई नियमावली को ही अंतर नियम( articles of association) कहा जाता है. यह नियम कंपनी तथा उसके साथियों दोनों के लिए ही बंधन कारी होते हैं. कंपनी की संपूर्ण प्रबंध व्यवस्था उसके अंतर नियम के अनुसार होती है. दूसरे शब्दों में अंतर नियमों में उल्लेख रहता है कि कंपनी कौन-कौन से कार्य किस प्रकार किए जाएंगे तथा उसके विभिन्न पदाधिकारियों या प्रबंधकों के क्या अधिकार होंगे?          कंपनी अधिनियम 2013 की धारा2(5) के अनुसार पार्षद अंतर नियम( article of association) का आशय किसी कंपनी की ऐसी नियमावली से है कि पुरानी कंपनी विधियां मूल रूप से बनाई गई हो अथवा संशोधित की गई हो.              लार्ड केयन्स(Lord Cairns) के अनुसार अंतर नियम पार्षद सीमा नियम के अधीन कार्य करते हैं और वे सीमा नियम को चार्टर के रूप में स्वीकार करते हैं. वे उन नीतियों तथा स्वरूपों को स्पष्ट करते हैं जिनके अनुसार कंपनी...