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Supreme Court Judgments February 2026

पॉक्सो एक्ट और नाबालिगों के सहमति संबंध रोचक कोर्ट केस और कानूनी व्याख्या

एक मामला दर्ज हुआ जिसमें लड़की की आयु 16 वर्ष की है और वह एक लड़के के साथ घर से भाग गई। लड़की के घरवालों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने कुछ समय बाद लड़की को लड़के के साथ बरामद करके लड़के के खिलाफ पास्को एक्ट में मुकदमा दर्ज कर उसको जेल भेज दिया। ऐसी स्थिति में अगर वह आप को अपना अधिवक्ता नियुक्त करता है तो आप उसको किस प्रकार से मददगार साबित हो सकते हैं। उसकी प्रथम जमानत प्रार्थना पत्र drafting  करो तथा जज के सामने तर्को के साथ उनको जमानत दी जाये।इसकी पुरजोर कोशिश करे। ऐसे तर्क पेश करें कि जज उसको बेल देदे।

बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत मामलों में आरोपित की जमानत प्राप्त करना कठिन हो सकता है, विशेषकर तब जब पीड़िता की आयु 18 वर्ष से कम हो। तथापि, आप कानूनी प्रक्रिया में रहते हुए कुछ तर्क और तथ्यों के आधार पर बचाव कर सकते हैं, जो आपके मुवक्किल के पक्ष में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।  

यहां मैं एक जमानत प्रार्थना पत्र का प्रारूप एवं संभावित तर्क प्रस्तुत कर रहा हूँ:


जमानत प्रार्थना पत्र (First Bail Application)

आवेदक: __________ (लड़के का नाम)  
प्रति: माननीय न्यायालय, __________ (न्यायालय का नाम)

विषय: धारा 376 IPC और पॉक्सो एक्ट में दर्ज मुकदमा संख्या __________ में जमानत हेतु प्रार्थना पत्र

माननीय महोदय,

1. मुवक्किल का परिचय: आवेदक __________ निवासी __________ है और निर्दोष है, जिसने किसी प्रकार का अपराध नहीं किया है।

2. घटनाक्रम का विवरण: जैसा कि मामले में दर्ज हुआ है, आवेदक पर आरोप है कि वह पीड़िता (लड़की) को अपने साथ भगाकर ले गया। तथापि, यह पाया गया कि पीड़िता और आवेदक दोनों ने अपनी सहमति से साथ में रहने का निर्णय लिया था, और इसमें किसी प्रकार की जबरदस्ती या बलप्रयोग की बात सामने नहीं आई है।

3. उम्र संबंधी स्थिति: अभियोजन पक्ष ने दावा किया है कि पीड़िता नाबालिग है और उसकी उम्र 16 वर्ष है। तथापि, इसमें अन्य साक्ष्य या दस्तावेजों के आधार पर उसकी उम्र का सत्यापन होना आवश्यक है, और आयु की पुष्टि के लिए न्यायालय को वैध जन्म प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना होगा।

4. सहमति का आधार: उपलब्ध तथ्यों के अनुसार, लड़की और लड़के के बीच सहमति के आधार पर यह संबंध हुआ था। भारतीय कानून के अनुसार सहमति से बने संबंधों के आधार पर कड़े अपराध का गठन नहीं होता, विशेष रूप से तब जब जबरदस्ती या बलप्रयोग का साक्ष्य न हो।

5. पूर्व अपराध का अभाव: आवेदक के आपराधिक रिकॉर्ड का कोई इतिहास नहीं है, और वह समाज में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में जाना जाता है। पहली बार आरोपी बनाए जाने के आधार पर उसे कठोर सजा देना अनुचित होगा।

6. पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग: इस मामले में, अभियोजन पक्ष द्वारा पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग कर लड़के पर कठोर कार्रवाई की जा रही है, जबकि लड़के का किसी प्रकार की यौन उत्पीड़न करने का इरादा नहीं था। 

7. जमानत पर रहकर जांच में सहयोग की तत्परता: आवेदक वचन देता है कि जमानत मिलने के पश्चात् भी वह न्यायालय में हर सुनवाई में उपस्थित रहेगा और जांच में पूर्ण सहयोग करेगा।

प्रार्थना: 
अतः, निवेदन है कि आवेदक को न्यायालय द्वारा जमानत प्रदान की जाए ताकि वह सामान्य जीवन व्यतीत कर सके तथा इस मामले में अपनी बेगुनाही साबित कर सके।

आवेदक के अधिवक्ता:
__________ (अधिवक्ता का नाम)  
दिनांक: __________



जमानत हेतु तर्क:

1. सहमति का तर्क: न्यायालय के सामने यह प्रस्तुत किया जा सकता है कि यह संबंध दोनों की सहमति से हुआ था और इसमें कोई भी यौन उत्पीड़न की मंशा नहीं थी।

2. आरोपों की सत्यता: तथ्यों के आधार पर लड़की ने अपनी मर्जी से आवेदक का साथ दिया, जिससे यह सिद्ध होता है कि इसमें किसी प्रकार की जबरदस्ती नहीं की गई थी।

3. जमानत में सहयोग का संकल्प: यह बताया जा सकता है कि आवेदक जमानत के बाद जांच में सहयोग देने के लिए तैयार है और किसी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया में बाधा नहीं डालेगा।

4. मामले की गंभीरता का उचित मूल्यांकन: चूंकि यह दोनों के बीच सहमति से बने संबंध पर आधारित है, यह किसी कठोर आपराधिक इरादे का मामला नहीं है।

5. पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग: इस बात का उल्लेख करना चाहिए कि यह कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए है और इसके दुरुपयोग से समाज में इसका उद्देश्य कमजोर हो सकता है।

अतिरिक्त तर्क: यदि न्यायालय आशंकित है कि आवेदक जमानत पर रहते हुए मामले को प्रभावित कर सकता है, तो विशेष शर्तें (जैसे, पीड़िता के संपर्क में न रहना, न्यायालय में नियमित हाजिरी) लागू करने की अनुमति मांगी जा सकती है। 


इस प्रकार आप उपरोक्त तर्क और कानूनी आधारों के माध्यम से जमानत अर्जित करने का प्रयास कर सकते हैं।


जब किसी नाबालिग लड़की के साथ घर से भागने के मामले में लड़के को गिरफ्तार किया जाता है और उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट जैसी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाता है, तो पुलिस आमतौर पर लड़के को हिरासत में लेकर रिमांड पर पूछताछ के लिए पुलिस थाने में रखेगी। रिमांड पर रखने के दौरान पुलिस उससे इस घटना के संबंध में पूछताछ करेगी, और यह जानने का प्रयास करेगी कि क्या इसमें अन्य कोई व्यक्ति या कोई अन्य कारण शामिल है। 

अगर मामले में किसी विशेष प्रकार की जानकारी जुटाने की आवश्यकता हो, तो पुलिस उसे अदालत से रिमांड की अवधि बढ़ाने का निवेदन कर सकती है। 

पुलिस को अदालत में यह साबित करना होता है कि रिमांड की आवश्यकता क्यों है और किस आधार पर उसकी हिरासत बढ़ाई जानी चाहिए। रिमांड की अवधि पूरी होने पर आरोपी को वापस अदालत में पेश किया जाएगा, जहाँ उसके लिए आगे की न्यायिक प्रक्रिया (जैसे जमानत की सुनवाई या न्यायिक हिरासत) पर निर्णय लिया जाएगा। 

रिमांड पर रहते हुए, आरोपी को थाने में रखा जाएगा, और यदि रिमांड अवधि समाप्त होती है या रिमांड नहीं दी जाती है, तो उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेजा जाएगा।



हाँ, यदि लड़की की आयु 18 वर्ष से कम है, तो सहमति के बावजूद पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है। पॉक्सो एक्ट के अनुसार, 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे के साथ यौन संबंध, चाहे उसकी सहमति से ही क्यों न हों, गैरकानूनी माने जाते हैं और इसे यौन शोषण की श्रेणी में रखा जाता है। 

इस कानून का उद्देश्य बच्चों (अर्थात 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों) को यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करना है। भारतीय कानून के तहत नाबालिग की सहमति को कानूनी सहमति नहीं माना जाता है, इसलिए उसकी सहमति का तर्क यहां मान्य नहीं होगा। 

हालांकि, अदालत में बचाव पक्ष यह तर्क दे सकता है कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे और इसमें जबरदस्ती या हिंसा का कोई साक्ष्य नहीं है। इससे जमानत और सजा में राहत मिल सकती है, लेकिन पॉक्सो एक्ट का प्रवर्तन सहमति के बावजूद लागू रहेगा।


यहाँ कुछ रोचक केस हैं जहाँ पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत सहमति और नाबालिगों के बीच संबंधों के मुद्दे पर अदालतों ने विशेष टिप्पणियाँ और फैसले दिए हैं:

1. सुरेश बनाम राज्य (2019)
इस मामले में केरल हाईकोर्ट ने पाया कि 17 वर्षीय लड़की और 21 वर्षीय लड़के के बीच का संबंध आपसी सहमति से हुआ था। कोर्ट ने कहा कि, यद्यपि पॉक्सो एक्ट के तहत सहमति अप्रासंगिक है, अदालत इस बात को ध्यान में रख सकती है कि संबंध सहमति से था और लड़की ने अपनी मर्जी से इस रिश्ते में कदम रखा। इस मामले में अभियुक्त को जमानत दे दी गई और अदालत ने मामले को कम गंभीरता से देखा क्योंकि कोई हिंसा या शोषण शामिल नहीं था। 

 2. विजय नागरा बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021)
बॉम्बे हाईकोर्ट के इस केस में एक 17 वर्षीय लड़की और एक 20 वर्षीय लड़के के बीच सहमति से संबंध हुआ था। इस मामले में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में कानून में लचीलापन हो सकता है, विशेषकर तब जब लड़की अपने माता-पिता के खिलाफ जाकर, अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी। अदालत ने मामले में जमानत देते समय कहा कि दोनों की सहमति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

 3. प्रदीप बनाम तमिलनाडु राज्य (2021)
तमिलनाडु हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि, पॉक्सो एक्ट के मामलों में, अगर लड़का और लड़की के बीच कोई जबरदस्ती का सबूत नहीं है और दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, तो यह पॉक्सो एक्ट के कठोर प्रावधानों को कम करने का आधार हो सकता है। इस केस में, कोर्ट ने अभियुक्त को राहत दी, क्योंकि दोनों की सहमति थी और जबरदस्ती का कोई सबूत नहीं था। 

4. मणिपुर राज्य बनाम नगेहेलेफू (2018)
मणिपुर हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के एक मामले में अभियुक्त को रिहा कर दिया, यह पाया गया कि 17 साल की लड़की ने अपनी मर्जी से 19 साल के लड़के के साथ संबंध बनाए थे। अदालत ने माना कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था, और इस बात पर जोर दिया कि कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है न कि सहमति से बने संबंधों को अपराध बनाना। 

5.चंद्र किशोर यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022)
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस केस में, 16 वर्षीय लड़की और 18 वर्षीय लड़के के बीच सहमति से संबंध था। अदालत ने माना कि कानून को सही तरीके से लागू करना चाहिए, लेकिन समाज में इस प्रकार के सहमति-आधारित संबंधों के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव की भी आवश्यकता है। 

निष्कर्ष:
इन मामलों में अदालतों ने यह रेखांकित किया कि पॉक्सो एक्ट का उद्देश्य बच्चों के खिलाफ यौन शोषण को रोकना है, न कि सहमति से बने संबंधों को अपराध की श्रेणी में लाना। अदालतें सहमति के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाने और कानून का लचीलापन समझने का सुझाव देती हैं।

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