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Supreme Court Judgments February 2026

अविवाहित मां के अधिकार और बच्चे का कल्याण सुप्रीम कोर्ट का ABC बनाम स्टेट (NCT ऑफ दिल्ली) 2015 का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट के ABC बनाम स्टेट (NCT ऑफ दिल्ली) 2015 का फैसला: 

अविवाहित मां का बच्चे पर अधिकार और गोपनीयता का सम्मान

आज के दौर में परिवार और सामाजिक संरचना में बदलाव के साथ कई ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं, जो एक समय पारंपरिक कानूनों में जगह नहीं पाते थे। ऐसा ही एक अहम सवाल सुप्रीम कोर्ट के ABC बनाम स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली) 2015 के फैसले में सामने आया। इस केस में कोर्ट से पूछा गया कि क्या एक अविवाहित मां अपने बच्चे के पिता की पहचान बताए बिना उसका अभिभावक नियुक्त हो सकती है?
ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पारंपरिक दृष्टिकोण में बच्चे के माता-पिता के अधिकार और जिम्मेदारियां एक साथ मानी जाती थीं। आइए इस मामले और इससे जुड़े कानूनों को सरल भाषा में समझते हैं।

केस का मुख्य मुद्दा: क्या अविवाहित मां बच्चे की अकेली अभिभावक बन सकती है?

इस केस में एक महिला, जो अविवाहित मां थी, अपने बच्चे की अकेली अभिभावक बनने की मांग कर रही थी। उसका कहना था कि बच्चे के पिता की पहचान न बताकर भी उसे बच्चे का अभिभावक नियुक्त किया जाए। कोर्ट में इस बात पर बहस हुई कि क्या मां को इस तरह से अभिभावक बनने का अधिकार है?

महिला का कहना था कि पिता की पहचान उजागर करने से उसकी निजता का हनन होगा और साथ ही उसके बच्चे को भी सामाजिक दबाव झेलना पड़ेगा। इसलिए, उसने मांग की कि उसे बिना किसी अतिरिक्त शर्त के बच्चे का अभिभावक माना जाए।


 कौन-सा कानून लागू होता है?

इस केस को समझने के लिए हमें गार्जियन और वॉर्ड्स एक्ट, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) की ओर देखना होता है। ये कानून बताता है कि जब किसी बच्चे का अभिभावक नियुक्त करना होता है, तो कोर्ट को बच्चे के कल्याण को सबसे महत्वपूर्ण मानना चाहिए।

•सेक्शन 7: ये कोर्ट को अधिकार देता है कि वो बच्चे के हित में अभिभावक नियुक्त कर सकता है, चाहे बच्चे के माता-पिता के कुछ अधिकारों की अनदेखी करनी पड़े।
  
•सेक्शन 11: इस सेक्शन के अनुसार अभिभावक नियुक्त करने से पहले बच्चे के माता-पिता को सूचित करना जरूरी है। यानी, बच्चे के पिता की जानकारी दिए बिना मां को अभिभावक बनाना इस कानून के अनुसार चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

•सेक्शन 19: इस प्रावधान के अनुसार अगर पिता जीवित हैं और उसे अनुचित नहीं माना गया है, तो कोर्ट किसी और को अभिभावक नहीं बना सकता।


 कोर्ट का निर्णय: बच्चे की भलाई सर्वोपरि है

कोर्ट ने मां के तर्क पर ध्यान दिया और इस फैसले में सबसे पहले बच्चे की भलाई को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने यह माना कि जब पिता का बच्चे की देखभाल में कोई योगदान नहीं है, तो बच्चे का कल्याण मां की जिम्मेदारी को प्राथमिकता देने में है। इस तरह, कोर्ट ने ये फैसला किया कि अविवाहित मां को पिता की पहचान बताए बिना बच्चे का अभिभावक नियुक्त किया जा सकता है।

कोर्ट ने इस मामले में “परेंस पैट्री” का सिद्धांत अपनाया, जिसका मतलब है कि कोर्ट खुद को बच्चे का संरक्षक मानते हुए उसके हित में फैसला ले सकती है। कोर्ट ने कहा कि मां की गोपनीयता और बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए पिता की पहचान को उजागर करना जरूरी नहीं है।


 गोपनीयता का अधिकार और माता-पिता का संतुलन:

इस मामले में कोर्ट ने मां की गोपनीयता के अधिकार को भी महत्व दिया। मां का कहना था कि अगर पिता की पहचान सार्वजनिक की जाती है, तो उसके निजी जीवन और बच्चे के भविष्य पर बुरा असर पड़ेगा। कोर्ट ने भी माना कि व्यक्तिगत मामलों में गोपनीयता का अधिकार बहुत महत्वपूर्ण है।

इससे पहले के एक महत्वपूर्ण केस, गीता हरिहरन बनाम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में कोर्ट ने मां को पिता की अनुपस्थिति में बच्चे की अभिभावक बनने का अधिकार दिया था। इस फैसले में कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एकल मां को बच्चों के जीवन में प्राथमिकता दी जा सकती है, खासकर तब जब वो अकेली ही बच्चे की जिम्मेदार हों।



अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत का परिप्रेक्ष्य:

भारत ने "कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ द चाइल्ड" को स्वीकार किया है, जिसमें कहा गया है कि बच्चे को अपने माता-पिता की पहचान जानने का अधिकार है। लेकिन इस केस में कोर्ट ने इस अधिकार और इससे जुड़े संभावित नकारात्मक प्रभाव के बीच संतुलन बनाया। कोर्ट ने माना कि इस मामले में बच्चे की भलाई और मां की गोपनीयता को देखते हुए पिता की पहचान को उजागर करना जरूरी नहीं है।


 एकल माताओं के अधिकारों के लिए नई राह:

इस फैसले ने एकल माताओं के अधिकारों के लिए एक नई राह खोली है। यह फैसला एकल माताओं को अपने बच्चों के लिए कानूनी अभिभावक बनने का अधिकार देता है, भले ही वो पिता की पहचान न बताना चाहें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य बच्चों की भलाई का समर्थन करना होना चाहिए।

इस निर्णय ने भारतीय कानून को आधुनिक समाज के अनुसार ढालने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जो परिवार और व्यक्तिगत अधिकारों के जटिल समीकरणों को ध्यान में रखता है।

 निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पारंपरिक पारिवारिक नियमों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने दिखाया कि बच्चे की भलाई, अभिभावक के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है। साथ ही, यह निर्णय अविवाहित माताओं के लिए एक नई उम्मीद है, जहां उन्हें बिना किसी अतिरिक्त शर्त के अपने बच्चों के अधिकार और जिम्मेदारी मिल सके।

यह एक ऐसा उदाहरण है जो बताता है कि कैसे न्याय प्रणाली समाज के बदलते ढांचे को स्वीकार कर रही है और बच्चों के कल्याण और एकल माताओं के अधिकारों को प्राथमिकता दे रही है।

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