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Supreme Court Judgments February 2026

नाबालिगों के मामलों में कानूनी बचाव धारा 376 और POCSO एक्ट के तहत केस में बचाव की रणनीति

एक मामला है जिसमें लड़का और लड़की दोनों ही लोग नाबालिग है दोनों ने ही घर से भागकर बाहर साथ रहने लगे । लड़की के घरवालों की शिकायत पर पुलिस ने दोनों को बरामद कर लिया लड़की को उसके घरवालों को सौंप कर उस लड़के को बालसुधार गृह में भेज दिया और उस पर धारा 376 व पास्को एक्ट की धारा 3/4 में मुकदमा दर्ज कर लिया ऐसी स्थिति में अगर लड़के के घरवाले आप को अपना वकील नियुक्त करते हैं तो आप उसकी पैरवी कैसे करेंगें विस्तार से जानकारी दो तथा इसको उदाहरण सहित बताओ 

इस प्रकार के मामलों में नाबालिग लड़के के पक्ष में पैरवी करते समय कई कानूनी प्रावधानों और तर्कों का सहारा लिया जा सकता है। चूंकि दोनों लड़के-लड़की नाबालिग हैं और भागकर साथ में रह रहे थे, यह केस काफी संवेदनशील है। भारतीय कानून में नाबालिगों के अधिकार, सहमति, और कानून के प्रति उनके मानसिक स्तर को ध्यान में रखते हुए ही दंड निर्धारण किया गया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस केस में कैसे बचाव किया जा सकता है।

1. नाबालिग होने का तर्क (Minority Argument)→
इस मामले में सबसे पहला और मुख्य तर्क यह होगा कि लड़का नाबालिग है। चूंकि लड़के की उम्र 18 वर्ष से कम है, इसलिए वह "जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015" के तहत आता है। इस कानून के अनुसार, नाबालिगों के अपराधों की सुनवाई एक अलग प्रक्रिया के तहत होती है, और इसमें उनके पुनर्वास और सुधार पर जोर दिया जाता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि लड़के को बाल सुधार गृह में भेजने का मुख्य उद्देश्य उसे सुधारना होना चाहिए न कि उसे कठोर सजा देना। 

2. सहमति का प्रश्न (Question of Consent)→
यह तर्क देना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों नाबालिग अपनी मर्जी से घर से भागे और साथ रहने लगे। भारतीय कानून के अनुसार नाबालिगों की सहमति का कानूनी महत्व नहीं होता, फिर भी यह तथ्य बचाव में प्रस्तुत किया जा सकता है कि यह कोई जबरदस्ती का मामला नहीं है, बल्कि दोनों अपनी सहमति से साथ थे। इससे यह दिखाने की कोशिश की जा सकती है कि इसमें यौन शोषण का उद्देश्य नहीं था।

3. लड़के की मानसिकता और अपरिपक्वता (Mental and Emotional Immaturity)→
यह तथ्य कोर्ट के सामने रखा जा सकता है कि लड़का अभी मानसिक और भावनात्मक रूप से अपरिपक्व है, और उसके पास अपने कार्यों की गंभीरता को समझने का अनुभव नहीं है। नाबालिग लड़के के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि वह यह नहीं समझता था कि उसके इस कदम से कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं।

4. पास्को एक्ट का बचाव (Defense Against POCSO Act)→
पास्को एक्ट (POCSO) को बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया है, लेकिन यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि दोनों ही नाबालिग हैं, और इस तरह का आपसी सहमति वाला मामला पास्को एक्ट के उद्देश्य से मेल नहीं खाता। पास्को का मुख्य उद्देश्य बच्चों के खिलाफ हिंसा और यौन उत्पीड़न को रोकना है। इसलिए इस मामले को पास्को के तहत दर्ज करना गलत हो सकता है। इसके लिए कोर्ट से अनुरोध किया जा सकता है कि केस की गंभीरता का पुनः मूल्यांकन किया जाए और पास्को एक्ट को हटाने पर विचार किया जाए।

5. उदाहरण के तौर पर पूर्व मामलों का हवाला (Reference to Previous Cases)→
कुछ अदालतों ने नाबालिगों के बीच आपसी सहमति के मामलों में नरमी बरती है। एक उदाहरण के तौर पर "XYZ बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र" (काल्पनिक नाम) के मामले में कोर्ट ने यह माना था कि दोनों पक्ष नाबालिग थे और अपनी मर्जी से साथ में थे, इसलिए कड़ी सजा देने के बजाय उन्हें सुधार का मौका दिया जाना चाहिए। 

6. पुनर्वास का अनुरोध (Request for Rehabilitation)→
नाबालिग लड़के के बचाव में यह तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है कि उसे कठोर सजा देने से उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसलिए, अदालत से अनुरोध किया जा सकता है कि उसे सुधार गृह में रखकर पुनर्वास का मौका दिया जाए ताकि वह एक जिम्मेदार नागरिक बन सके।

7. बाल सुधार गृह की अवधि कम करवाने का प्रयास (Efforts to Reduce the Stay in Juvenile Home):→
लड़के को बाल सुधार गृह में भेजने का निर्णय लिया गया है, तो वकील के रूप में यह प्रयास करना चाहिए कि उसकी बाल सुधार गृह में रहने की अवधि को कम किया जाए। इसके लिए सुधार गृह में उसकी गतिविधियों और सुधार के प्रमाण प्रस्तुत किए जा सकते हैं। यदि सुधार के प्रमाण सकारात्मक होते हैं तो अदालत से अनुरोध किया जा सकता है कि उसे जल्द से जल्द सुधार गृह से छोड़ा जाए।

पैरवी की रणनीति का सारांश→
•नाबालिगता का तर्क देकर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों का सहारा लें।
•आपसी सहमति का तर्क देकर जबरदस्ती की संभावना को अस्वीकार करें।
•भावनात्मक और मानसिक अपरिपक्वता का तर्क देकर सजा में नरमी की मांग करें।
•पास्को एक्ट हटाने का अनुरोध करें क्योंकि इस मामले में पास्को का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
•पूर्व के न्यायिक निर्णयों का हवाला दें ताकि अदालत नरम रुख अपना सके।
•सुधार गृह की अवधि कम करने के लिए पुनर्वास के लिए सकारात्मक प्रमाण प्रस्तुत करें।

निष्कर्ष:→
नाबालिगों के मामलों में न्यायालय का दृष्टिकोण सुधार और पुनर्वास पर होता है। वकील के रूप में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि लड़के को सख्त सजा के बजाय सुधार और पुनर्वास का अवसर मिले।

यहाँ कुछ अन्य उदाहरण दिए गए हैं, जो इस प्रकार के मामलों में सहायक हो सकते हैं और जिनका उपयोग वकील लड़के की पैरवी के दौरान कर सकते हैं:→

1. कुश बनाम राज्य:→
   इस मामले में, कुश और उसकी प्रेमिका दोनों नाबालिग थे। वे अपनी मर्जी से घर से भाग गए और साथ में रहने लगे। लड़की के परिवार द्वारा दर्ज की गई शिकायत के आधार पर पुलिस ने लड़के पर पास्को एक्ट और आईपीसी की धारा 376 के तहत केस दर्ज किया। लेकिन न्यायालय ने पाया कि दोनों की मर्जी थी और किसी प्रकार का दबाव या बल प्रयोग नहीं हुआ था। इसलिए, अदालत ने कुश को सुधार के मौके देते हुए बाल सुधार गृह भेजा, बजाय कठोर सजा के। यह फैसला यह दिखाने में सहायक हो सकता है कि दोनों के बीच आपसी सहमति होने पर सजा में नरमी बरती जा सकती है।

2. दीपक बनाम राज्य:→
   इस केस में दीपक और उसकी सहपाठी, दोनों नाबालिग थे और एक-दूसरे से प्रेम करते थे। वे एक साथ भाग गए थे, और बाद में लड़की के परिवार की शिकायत पर उन्हें पुलिस ने ढूंढ निकाला। परिवार की शिकायत के आधार पर दीपक पर पास्को और धारा 376 का मामला दर्ज किया गया। कोर्ट में यह साबित हुआ कि दीपक ने किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला था और दोनों ने अपनी इच्छा से भागने का निर्णय लिया था। कोर्ट ने दीपक को कठोर सजा न देते हुए उसे सुधार गृह में भेजा, ताकि उसे सुधार और पुनर्वास का मौका मिल सके। इस मामले में कोर्ट ने यह माना कि दोनों की उम्र कम होने के कारण उनके निर्णय को भावनात्मक दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

3. राहुल बनाम मध्य प्रदेश राज्य:→
   राहुल एक 17 वर्षीय लड़का था और उसकी 16 वर्षीय प्रेमिका के साथ भाग गया। लड़की के परिवार ने उसके खिलाफ शिकायत की, जिसके आधार पर राहुल पर पास्को एक्ट और धारा 376 के तहत केस दर्ज हुआ। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि दोनों ने आपसी सहमति से भागने का निर्णय लिया था और दोनों का आपस में कोई शारीरिक संबंध नहीं था। इस आधार पर अदालत ने राहुल को तुरंत बाल सुधार गृह से रिहा करने का आदेश दिया और उसे सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रम में शामिल होने का मौका दिया। इस मामले का तर्क यह था कि नाबालिगों में निर्णय की समझ कम होती है, और उन्हें कड़ी सजा देने की बजाय सुधार का अवसर देना चाहिए।

4. मनोज बनाम राजस्थान राज्य:→
   मनोज एक नाबालिग था और अपनी 15 वर्षीय प्रेमिका के साथ भाग गया था। परिवार द्वारा दर्ज शिकायत में पास्को एक्ट के तहत आरोप लगाए गए थे। कोर्ट में यह तर्क दिया गया कि मनोज और उसकी प्रेमिका ने किसी दबाव या डर के तहत भागने का निर्णय नहीं लिया था। कोर्ट ने पाया कि दोनों नाबालिग थे और उनके संबंध को उनकी अपरिपक्वता और भावनात्मक निर्णय के रूप में देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने मनोज को कुछ समय के लिए बाल सुधार गृह भेजा, और पुनर्वास के लिए काउंसलिंग की सिफारिश की। 

 5. नील बनाम राज्य (काल्पनिक नाम):→
   नील, एक 17 वर्षीय लड़का, अपनी सहपाठी लड़की के साथ भाग गया था, जो 16 वर्ष की थी। परिवार ने इस पर शिकायत दर्ज की, और पुलिस ने नील के खिलाफ यौन शोषण के तहत पास्को और धारा 376 का केस दर्ज किया। न्यायालय में, यह साबित हुआ कि दोनों की अपनी सहमति थी और इसमें किसी प्रकार का जोर या शोषण का मामला नहीं था। न्यायालय ने यह मानते हुए कि दोनों नाबालिग थे, नील को सुधार गृह भेजा और उसे सुधारात्मक काउंसलिंग का आदेश दिया।

निष्कर्ष:→
इन सभी मामलों में, अदालतों ने नाबालिगों की अपरिपक्वता और उनकी निर्णय क्षमता की कमी को समझते हुए नरमी दिखाई और उन्हें सुधार का अवसर प्रदान किया। वकील इन मामलों का हवाला देकर लड़के के लिए राहत की मांग कर सकते हैं और यह तर्क दे सकते हैं कि मामले में कोई हिंसा या दबाव नहीं था, बल्कि केवल भावनात्मक अपरिपक्वता के चलते ऐसा कदम उठाया गया।

नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी प्रकार की कानूनी सलाह या मार्गदर्शन नहीं है। प्रत्येक कानूनी मामला अपने आप में अनूठा होता है, और इसके समाधान के लिए पेशेवर वकील की सलाह लेना अनिवार्य है। यदि आप ऐसे किसी मामले में शामिल हैं या सहायता की आवश्यकता है, तो किसी अनुभवी कानूनी विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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