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Supreme Court Judgments February 2026

इद्दत का अर्थ और उद्देश्य का क्या मतलब होता है। विस्तृत जानकारी दो।

इद्दत का अर्थ और उद्देश्य

इद्दत (या इद्दा) इस्लाम धर्म में एक अनिवार्य अवधि है, जिसे तलाक या पति की मृत्यु के बाद मुस्लिम महिला को पालन करना होता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिला गर्भवती नहीं है, और पति के साथ उसके रिश्ते की समाप्ति के बाद उचित समय व्यतीत हो सके। इद्दत एक प्रकार की प्रतीक्षा अवधि होती है, जिसमें महिला को पुनः विवाह करने से रोका जाता है। इस अवधि का धार्मिक महत्व है और यह शरीयत के अनुसार एक धार्मिक कर्तव्य है।

इद्दत कब और क्यों की जाती है?

इद्दत तब की जाती है जब:→
1. पति की मृत्यु हो जाती है।
2. तलाक हो जाता है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अगर महिला गर्भवती है, तो अगले पति का अनुमानित पिता कौन होगा, साथ ही महिला को मानसिक और भावनात्मक रूप से संभलने का समय भी मिलता है।

इद्दत की अवधि कब शुरू होती है?

•पति की मृत्यु पर:→पति की मृत्यु के बाद इद्दत की अवधि तुरंत शुरू हो जाती है। 
•तलाक के बाद:→तलाक के तुरंत बाद इद्दत की अवधि शुरू हो जाती है। 

पति की मृत्यु पर इद्दत की अवधि→

यदि पति की मृत्यु हो जाती है, तो पत्नी को चार महीने और दस दिन (चार माह 10 दिन) तक इद्दत में रहना होता है। यदि पत्नी गर्भवती है, तो इद्दत बच्चे के जन्म तक चलेगी, चाहे बच्चा चार महीने और दस दिन के बाद पैदा हो।

तलाक के बाद इद्दत की अवधि→

तलाक के बाद, महिला को तीन मासिक धर्म (Periods) तक इद्दत का पालन करना होता है। अगर महिला गर्भवती है, तो उसकी इद्दत अवधि बच्चे के जन्म तक होती है। तलाक चाहे किसी भी प्रकार का हो (तलाक-ए-अहसन, तलाक-ए-हसन, इला, ज़िहार, खुला, मुबारत), इद्दत के नियम सभी पर लागू होते हैं।

अगर तलाक के बाद इद्दत के दौरान पति की मौत हो जाए→

यदि तलाक के बाद इद्दत की अवधि में पति की मौत हो जाए, तो महिला को चार महीने और दस दिन की नई इद्दत अवधि पूरी करनी होगी। अगर महिला गर्भवती है, तो इद्दत अवधि बच्चे के जन्म तक चलेगी।

इद्दत के दौरान शादी के नियम→

•सुन्नी मुस्लिमों में:→इद्दत के दौरान शादी करना अनियमित (Irregular) माना जाता है, लेकिन पूरी तरह अमान्य नहीं होता।
शिया मुस्लिमों में:→इद्दत के दौरान शादी करना पूरी तरह से अमान्य (Void) होता है।

इद्दत के दौरान पत्नी के अधिकार→

1. भरण-पोषण:→इद्दत के दौरान पति पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होता है।
2. मेहर:→पत्नी मेहर की हकदार होती है, और यदि मेहर का भुगतान नहीं किया गया है, तो इसे तुरंत देना आवश्यक होता है।
3. उत्तराधिकार:→यदि इद्दत के दौरान पति की मृत्यु हो जाती है, तो पत्नी पति की संपत्ति में उत्तराधिकार पाने की हकदार होती है, बशर्ते तलाक पूर्ण न हुआ हो। इसी प्रकार, यदि पत्नी की इद्दत अवधि के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो पति उसकी संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त कर सकता है।

इद्दत में क्या नहीं करना चाहिए? (इद्दत के नियम)→

1. इद्दत की अवधि में महिला किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकती।
2. महिला को उसी घर में इद्दत पूरी करनी होती है, जहां वह पति के साथ रहती थी।
3. इद्दत के दौरान महिला को घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती, जब तक कि कोई आपातकालीन स्थिति न हो।
4. सादे कपड़े पहनना आवश्यक होता है, दिखावटी कपड़े पहनना इस अवधि में मना होता है।
5. मेकअप या सजने-संवरने की अनुमति नहीं होती।
6. अंतिम संस्कार में भी शामिल होने की अनुमति नहीं होती।
7. पति के लिए शोक मनाना अनिवार्य होता है।

इद्दत के दौरान पत्नी का भरण-पोषण→

इद्दत की अवधि में पत्नी का भरण-पोषण पति की जिम्मेदारी होती है। सुप्रीम कोर्ट के "शाह बानो केस" में यह तय किया गया कि यदि पत्नी इद्दत के बाद भी खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो पति को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण देना होगा। 

इस प्रकार, इद्दत का पालन एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक प्रक्रिया है, जिसे इस्लामिक कानून में कड़ाई से पालन किया जाता है।

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