भारतीय चुनाव प्रणाली का एक प्रमुख स्तंभ धर्मनिरपेक्षता (Secularism) है, जो देश के संविधान के मूल ढांचे में निहित है। जब चुनावी उम्मीदवार या राजनीतिक दल धर्म के आधार पर वोट मांगते हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) के तहत भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि किस प्रकार धर्म का उपयोग चुनावी प्रक्रिया को दूषित कर सकता है और धर्मनिरपेक्षता को खतरे में डाल सकता है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और धारा 123(3):→
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) विशेष रूप से इस बात से संबंधित है कि कोई भी उम्मीदवार, उसकी एजेंट, या उसके लिए काम करने वाला कोई भी व्यक्ति, धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर मतदाताओं से वोट मांगने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। यह प्रावधान चुनावों की निष्पक्षता और पवित्रता को बनाए रखने के लिए बनाया गया है। जब धर्म के आधार पर वोट मांगा जाता है, तो यह मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकता है, जो चुनावी प्रक्रिया में असमानता उत्पन्न करता है।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले:→
अबीराम सिंह बनाम सीडी कोम्माचन (2017)
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर वोट मांगना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) के तहत "भ्रष्ट आचरण" माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि धर्म एक व्यक्तिगत मामला है, और इसे चुनावी मंच पर लाना लोकतंत्र की भावना और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र का उल्लंघन है। यह फैसला चुनावी अभियानों में धर्म के गलत उपयोग को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
यह फैसला भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को लेकर एक मील का पत्थर था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है और राज्य को धर्म से तटस्थ रहना चाहिए। इस फैसले के अनुसार, धर्म का उपयोग किसी भी प्रकार से राजनीति में करना अनुचित है और यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का उल्लंघन है।
उदाहरण:→
मान लीजिए कि एक चुनावी उम्मीदवार अपने भाषण में किसी विशेष धर्म के अनुयायियों से यह अपील करता है कि वे केवल धार्मिक आधार पर उसे वोट दें। वह कहता है कि "हमारे धर्म के लोग मुझे वोट दें, क्योंकि मेरा धर्म हमें सत्ता में लाएगा।" ऐसे भाषण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) के तहत भ्रष्ट आचरण माने जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, इस प्रकार की अपीलें न केवल चुनावी प्रक्रिया को दूषित करती हैं बल्कि समाज में धार्मिक विभाजन को भी बढ़ावा देती हैं।
निष्कर्ष:→
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धर्म के आधार पर वोट मांगना न केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों का उल्लंघन है, बल्कि यह भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और चुनावों की पवित्रता को भी प्रभावित करता है। लोकतंत्र की सफलता इसके निष्पक्षता और पारदर्शिता पर निर्भर करती है, और जब धर्म का उपयोग चुनावी अभियानों में किया जाता है, तो यह पूरी चुनावी प्रक्रिया को दूषित कर सकता है। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव धर्मनिरपेक्षता और समानता के सिद्धांतों के तहत संपन्न हों।
इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि भारतीय चुनाव प्रणाली में धर्म के आधार पर वोट मांगना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह लोकतंत्र की मूल भावना के भी विपरीत है।
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