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Supreme Court Judgments February 2026

भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और इसका सही उपयोग

 धारा 85 क्या है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाई गई है। यह धारा पत्नी या बहू के साथ पति और उसके परिवार द्वारा की गई क्रूरता को अपराध मानती है। इसके अंतर्गत पीड़ित महिला न केवल अपने पति बल्कि उसके अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करवा सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी महिला के साथ शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न करने वालों को सजा दी जा सके।

धारा 85 के तहत सजा:→
इस धारा के अंतर्गत, अगर किसी महिला के साथ क्रूरता की जाती है तो आरोपित पति और उसके रिश्तेदारों को अधिकतम तीन साल की सजा हो सकती है। इसके अलावा, उन पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। कोई भी पीड़ित महिला अपने क्षेत्र के थाने में जाकर शिकायत दर्ज करा सकती है, और पुलिस इस शिकायत पर कार्रवाई करती है।

क्रूरता का अर्थ:→
धारा 85 के तहत क्रूरता का मतलब केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं, बल्कि मानसिक उत्पीड़न भी है। उदाहरण के तौर पर:→
1. शारीरिक क्रूरता→: मारपीट, जोर-ज़बरदस्ती, या महिला को शारीरिक रूप से चोट पहुँचाना।
2. मानसिक क्रूरता→: बार-बार गाली देना, दहेज की मांग करना, महिला के रंग-रूप या उसकी जाति पर टिप्पणी करना। 

उदाहरण से समझें:→
कल्पना कीजिए कि एक महिला के साथ उसके पति और सास-ससुर मिलकर मारपीट करते हैं। कभी उसे उसके रंग को लेकर ताने मारे जाते हैं, तो कभी दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है। यह सब धारा 85 के तहत क्रूरता की श्रेणी में आता है। अगर महिला यह स्पष्ट रूप से पुलिस को बताती है कि किस दिन, किस समय, किसने क्या किया, तो आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज होगा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:→
हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने भी धारा 85 पर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने कहा कि इस धारा का उपयोग महिलाओं की सुरक्षा के लिए है, लेकिन कई बार इसका गलत इस्तेमाल भी देखा गया है। कुछ महिलाएं इसे बदले की भावना से भी इस्तेमाल करती हैं। इसलिए कोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर मामला दर्ज न किया जाए। हर घटना का विवरण होना जरूरी है, जैसे - किसने, कब, और कैसे क्रूरता की।

 गलत उपयोग का मामला:→
कई बार देखा गया है कि महिलाएं इस धारा का दुरुपयोग करके सौदेबाजी करने लगती हैं। पहले शिकायत दर्ज करवाई जाती है, फिर मामला सुलझाने के लिए समझौते की कोशिश की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'सौदेबाजी का गढ़' कहा है और इस धारा में सुधार की जरूरत बताई है।

धारा 85 का सही उपयोग कैसे करें?
महिलाओं के लिए यह जरूरी है कि वे इस धारा का सही और ईमानदारी से उपयोग करें। अगर सच में उनके साथ अन्याय हो रहा है, तो उन्हें पुलिस के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज करवानी चाहिए और सबूतों के साथ मामले को स्पष्ट रूप से रखना चाहिए। यह जरूरी है कि घटना का पूरा विवरण दिया जाए ताकि गलतफहमी न हो और न्याय मिल सके।

 निष्कर्ष:→
भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है। इसका उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकार दिलाना और क्रूरता से बचाना है। हालांकि, इसका सही तरीके से और सच्चाई के साथ उपयोग किया जाना चाहिए ताकि इसे दुरुपयोग से बचाया जा सके। महिलाओं को यह समझना होगा कि कानून उनकी सुरक्षा के लिए है, न कि किसी प्रकार की बदले की भावना या सौदेबाजी के लिए।

धारा 85 के तहत दर्ज किए गए मामलों में कई बार गंभीर परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जहाँ न केवल पीड़िता न्याय की मांग करती है, बल्कि बचाव पक्ष भी अपनी बात रखने की कोशिश करता है। इन मामलों को उदाहरण सहित समझने से यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के दृष्टिकोण क्या हैं और बचाव पक्ष के वकील इनका कैसे विश्लेषण करते हैं।

केस 1: सीमा बनाम रमेश:→

 परिस्थिति:→
सीमा ने अपने पति रमेश और ससुराल वालों के खिलाफ धारा 85 के तहत शिकायत दर्ज करवाई, जिसमें उसने आरोप लगाया कि उसके पति और सास-ससुर ने दहेज की मांग की और उसके साथ मारपीट की। सीमा ने यह दावा किया कि उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। उसने यह भी बताया कि कई बार उसे उसके रंग और रूप को लेकर ताने मारे गए, जिससे उसका आत्मसम्मान आहत हुआ।

बचाव पक्ष की दलील:→
रमेश के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि सीमा द्वारा लगाए गए आरोप सामान्य हैं और उसने मारपीट या मानसिक प्रताड़ना का कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया है। वकील ने यह भी कहा कि सीमा और रमेश के बीच पहले से ही वैवाहिक विवाद चल रहा था, जिसमें सीमा रमेश से अधिक पैसे की मांग कर रही थी, और जब रमेश ने इनकार कर दिया तो सीमा ने धारा 85 का गलत उपयोग कर झूठा मामला दर्ज करवाया।

 वकील की रणनीति:→
1. साक्ष्यों की कमी→: वकील ने तर्क दिया कि सीमा के आरोपों में कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। उसने मारपीट के लिए कोई चिकित्सीय रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की, और न ही कोई प्रत्यक्ष गवाह है जो उसकी दलीलों का समर्थन कर सके।
   
2. आरोपों का सामान्यीकरण→: वकील ने कहा कि सीमा के आरोप केवल सामान्य आरोप हैं, जैसे "दहेज की मांग" और "ताने मारना," लेकिन उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि कौन से ताने किस समय और किस संदर्भ में मारे गए थे। क्रूरता को साबित करने के लिए यह जरूरी है कि घटना के समय, स्थान और स्थिति का सही-सही उल्लेख हो।

3. पारिवारिक तनाव का उपयोग→: वकील ने यह भी कहा कि सीमा और रमेश के बीच के पारिवारिक विवाद के चलते यह आरोप लगाए गए हैं। सीमा ने जानबूझकर सास-ससुर और अन्य रिश्तेदारों को मामले में घसीटा ताकि दबाव बनाया जा सके और मामले का जल्दी समाधान हो।

अदालत का फैसला:→
अदालत ने सीमा के आरोपों को पर्याप्त साक्ष्य न होने की वजह से खारिज कर दिया। यह पाया गया कि मामले में दिए गए बयान अस्पष्ट थे और मारपीट या प्रताड़ना का कोई ठोस सबूत नहीं था। हालाँकि, अदालत ने सीमा को यह निर्देश दिया कि अगर भविष्य में उसे नए साक्ष्य मिलते हैं, तो वह पुनः शिकायत दर्ज कर सकती है।

केस 2: रेखा बनाम विनोद:→

परिस्थिति:→
रेखा ने अपने पति विनोद पर आरोप लगाया कि वह उसे दहेज के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है। उसने यह भी कहा कि विनोद की माँ और बहनें अक्सर उसे उसके काम और रंग-रूप के बारे में बुरी बातें कहती थीं और ताने मारती थीं। उसने दावा किया कि उसे मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा।

बचाव पक्ष की दलील:→
विनोद के वकील ने रेखा द्वारा लगाए गए आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया और कहा कि यह मामला केवल विवाह में हो रहे आपसी मनमुटाव का परिणाम है। वकील ने यह भी तर्क दिया कि रेखा और विनोद के बीच कुछ घरेलू विवाद थे, लेकिन वे किसी भी प्रकार की क्रूरता के स्तर तक नहीं पहुँचे।

वकील की रणनीति:→
1. साक्ष्य के अभाव का जोर→: बचाव पक्ष ने यह तर्क दिया कि रेखा द्वारा लगाए गए मानसिक उत्पीड़न के आरोपों का कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। उसकी शिकायत में दिन, समय और घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, जिससे यह आरोप साबित हो सके।

2. पारिवारिक विवाद का संदर्भ→: वकील ने यह बताया कि रेखा और उसकी सास-ससुर के बीच पहले से ही पारिवारिक तनाव था, लेकिन यह तनाव कानूनी रूप से क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता। वकील ने कहा कि घरेलू झगड़े होना आम बात है और इसे धारा 85 के तहत अपराध मानना अनुचित होगा।

3. गवाहों का बयान:→बचाव पक्ष ने कुछ पारिवारिक दोस्तों और पड़ोसियों को गवाह के रूप में पेश किया, जिन्होंने बताया कि विनोद और उसके परिवार के लोग रेखा के साथ अच्छा व्यवहार करते थे और कभी उसे परेशान नहीं किया गया। यह गवाह बचाव पक्ष के लिए महत्वपूर्ण साबित हुए।

अदालत का फैसला:→
अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को मानते हुए पाया कि रेखा के आरोप सही साबित नहीं होते हैं। मानसिक उत्पीड़न के आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं थे, और अदालत ने इसे पारिवारिक विवाद के रूप में माना, न कि क्रूरता के रूप में।

बचाव पक्ष के वकील की भूमिका:→

इन दोनों मामलों में, बचाव पक्ष के वकील की भूमिका महत्वपूर्ण थी। वकील ने यह दिखाने की कोशिश की कि धारा 85 के तहत लगाए गए आरोप केवल वैवाहिक विवाद या पारिवारिक तनाव का परिणाम हैं, न कि वास्तविक क्रूरता। वकील ने साक्ष्यों की कमी को जोर देकर यह तर्क दिया कि पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है।

मुख्य रणनीतियाँ:→
1. स्पष्ट साक्ष्य की माँग→: बचाव पक्ष हमेशा यह माँग करता है कि शिकायतकर्ता यह साबित करे कि उसके साथ क्रूरता कब, कहाँ, और कैसे हुई।
   
2. गवाहों का इस्तेमाल→: बचाव पक्ष अक्सर गवाहों का सहारा लेकर यह साबित करने की कोशिश करता है कि परिवार का व्यवहार सामान्य था और कोई क्रूरता नहीं हुई।

3. आरोपों का खंडन→: बचाव पक्ष यह तर्क देता है कि सिर्फ पारिवारिक या वैवाहिक विवाद को क्रूरता का नाम नहीं दिया जा सकता, और धारा 85 का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

 निष्कर्ष:→
धारा 85 का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा देना है, लेकिन कई मामलों में इसका गलत उपयोग भी होता है। बचाव पक्ष के वकील का काम होता है कि वे इस धारा के तहत लगाए गए आरोपों की गहनता से विवेचना करें और साक्ष्यों के आधार पर यह साबित करें कि मामला असली है या नहीं। यह न्यायपालिका के लिए भी आवश्यक है कि वे हर मामले का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें ताकि सही निर्णय लिया जा सके।

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