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Supreme Court Judgments February 2026

तलाक क्या होता है ? तलाक लेने की क्या प्रक्रिया होती है?

भारत में तलाक कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक पहलू:→

तलाक एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है, जो न केवल दो व्यक्तियों को प्रभावित करता है बल्कि परिवारों और समाज पर भी गहरा प्रभाव डालता है। भारत में तलाक की कानूनी प्रक्रिया जटिल है और कई कानूनी व सामाजिक पहलुओं पर आधारित है। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने तलाक की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए 6 महीने के अनिवार्य इंतजार की अवधि को समाप्त करने का प्रावधान दिया है। यह बदलाव तलाक के मामलों को जल्दी सुलझाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। 

    भारत में तलाक से जुड़े कानूनी और सामाजिक पहलुओं को समझने के लिए हमें तलाक की प्रक्रिया, कानूनी अधिकारों और दांपत्य जीवन के संबंधों पर एक विस्तृत निबंध प्रस्तुत करना होगा।


(1.) तलाक का सामाजिक और वैवाहिक संदर्भ:→

भारतीय समाज में विवाह को अत्यंत पवित्र माना जाता है, और एक विश्वास है कि "जोड़े स्वर्ग में बनते हैं"। विवाह दो परिवारों और व्यक्तियों के बीच एक अनुबंध होता है, जिसे धार्मिक, सामाजिक और कानूनी मान्यताओं के आधार पर संपन्न किया जाता है। परंतु, हर वैवाहिक संबंध सफल नहीं होता। कई बार, वैवाहिक जीवन में तनाव, घुटन, असहमति और असंतोष का जन्म होता है, जो अंततः तलाक की आवश्यकता तक पहुंच जाता है। 

तलाक के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना एक अंतिम उपाय होता है जब सभी अन्य विकल्प समाप्त हो जाते हैं। यहां तलाक के दो प्रमुख तरीके हैं: →
1. आपसी सहमति से तलाक
2. एकतरफा अर्जी

(2.) तलाक की प्रक्रिया और कानूनी अड़चनें

(i) आपसी सहमति से तलाक:→
यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब दोनों पति-पत्नी आपस में सहमत होकर संबंध को समाप्त करना चाहते हैं। इस प्रक्रिया में विवाद कम होता है और दोनों पक्ष सुलह कर लेते हैं। आपसी सहमति से तलाक की प्रमुख प्रक्रियाएं निम्नलिखित हैं:→

• दोनों पक्षों को अदालत में याचिका दाखिल करनी होती है।
•अदालत की ओर से एक औपचारिक प्रक्रिया के तहत दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए जाते हैं।
•इसके बाद, अदालत छह महीने का समय देती है, जिससे वे अपने फैसले पर पुनर्विचार कर सकें। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद, यह छह महीने की अनिवार्यता खत्म की जा सकती है।
  
(ii) एकतरफा तलाक:→
यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब दोनों में से एक पक्ष तलाक के लिए सहमत न हो। इस स्थिति में एक पक्ष अदालत में तलाक की अर्जी दाखिल करता है और विभिन्न कानूनी आधारों पर तलाक का दावा करता है, जैसे:→

•विवाहेतर संबंध
•शारीरिक या मानसिक क्रूरता
•लंबे समय तक अलग रहना
•मानसिक अस्वस्थता या गंभीर यौन रोग

(3.) तलाक के कानूनी पहलू:→

(i)गुजारा भत्ता:→
तलाक के बाद, एक महत्वपूर्ण मुद्दा गुजारा भत्ता होता है। अगर पति या पत्नी में से कोई एक आर्थिक रूप से कमजोर है, तो दूसरे को गुजारा भत्ता देना आवश्यक होता है। अदालत इसे तय करती है कि गुजारा भत्ता कितना होना चाहिए। यह दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, जीवनशैली और अन्य कारकों पर निर्भर करता है।

(ii)बच्चों की कस्टडी:→
तलाक के बाद बच्चों की देखरेख और कस्टडी एक और महत्वपूर्ण मुद्दा होता है। बच्चे की कस्टडी सामान्यतः माता-पिता में से किसी एक को दी जाती है, लेकिन कई बार अदालत मिल-जुलकर कस्टडी देने का भी प्रावधान करती है। इस प्रक्रिया में बच्चे के कल्याण को प्राथमिकता दी जाती है, और दूसरे पक्ष को आर्थिक मदद करनी होती है।

(4.)तलाक के उदाहरण: →

 उदाहरण 1:→
नीरज और सीमा की शादी पांच साल पहले हुई थी, परंतु उनके बीच लगातार विवाद होते रहे। दोनों ने विवाह के शुरुआती दौर में एक-दूसरे को समझने की कोशिश की, परंतु उनके रिश्ते में घुटन और असहमति ने जगह बना ली। उन्होंने आपसी सहमति से तलाक का निर्णय लिया। अदालत ने उनके बयान दर्ज किए और उन्हें 6 महीने का समय दिया। बाद में, सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के आधार पर, अदालत ने यह छह महीने का समय समाप्त कर दिया और उन्हें तुरंत तलाक दे दिया। 

उदाहरण 2:→
एक अन्य उदाहरण में, मोहन और सरिता के बीच शारीरिक और मानसिक क्रूरता के कारण समस्याएं उत्पन्न हुईं। सरिता ने मोहन के खिलाफ तलाक की अर्जी दाखिल की, जिसमें उसने शारीरिक हिंसा और अपमानजनक व्यवहार का आरोप लगाया। अदालत ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद, सरिता के पक्ष में फैसला सुनाया और तलाक की मंजूरी दी।

(5.)तलाक का सामाजिक प्रभाव:→

तलाक का निर्णय न केवल पति-पत्नी को प्रभावित करता है, बल्कि बच्चों, परिवार और समाज पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। समाज में तलाक को अभी भी नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाता है, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में। परंतु शहरी क्षेत्रों में तलाक को अधिक स्वीकृति मिलने लगी है। 

 निष्कर्ष:→

तलाक एक गंभीर और जटिल प्रक्रिया है, जो कानूनी, सामाजिक और व्यक्तिगत पहलुओं पर आधारित होती है। सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला तलाक के मामलों को तेजी से निपटाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। तलाक का निर्णय लेते समय, दोनों पक्षों को अपने कानूनी अधिकारों और दायित्वों की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए।

       तलाक से जुड़े कुछ रोचक और चर्चित केस भारत में न केवल कानूनी प्रक्रिया बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण को भी प्रभावित करते हैं। यहां कुछ ऐसे मामलों का उल्लेख है, जो अपने अनोखे और असाधारण कारणों से सुर्खियों में रहे:→

( 1.)सुप्रीम कोर्ट में रात में खाना न देना का मामला:→2016 में, दिल्ली की एक महिला ने अपने पति पर यह आरोप लगाया कि वह उसे रात में खाना नहीं देती थी और उसके साथ दुर्व्यवहार करती थी। पति ने तलाक के लिए अदालत में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने यह मानते हुए कि यह शारीरिक और मानसिक क्रूरता का मामला है, पति के पक्ष में तलाक मंजूर कर दिया। यह केस इसलिए रोचक है क्योंकि खाना न देना तलाक का आधार बना।

(2.)वॉट्सएप के ब्लू टिक  के आधार पर तलाक:→
महाराष्ट्र के एक दंपत्ति का मामला चर्चा में आया जब पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दाखिल की, जिसमें कहा गया कि पत्नी उसकी वॉट्सएप पर भेजे गए संदेशों को पढ़कर नजरअंदाज करती थी। उसने इसे मानसिक क्रूरता का आधार बताया। अदालत में इस पर लंबी बहस चली, और यह मामला समाज में डिजिटल युग के प्रभाव का एक अनोखा उदाहरण बना।

3.पति का गंजा होना तलाक का आधार:→
2017 में मुंबई की एक महिला ने अपने पति से तलाक का दावा किया क्योंकि उसका पति गंजा था और उसने अपनी शादी से पहले यह बात छिपाई थी। महिला का कहना था कि उसे धोखे में रखकर शादी की गई थी, और इस आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की गई। अदालत ने धोखे को तलाक का वैध आधार मानते हुए तलाक की मंजूरी दी।

( 4.)पत्नी का हर रोज़ अपने माता-पिता से बात करना:→
उत्तर प्रदेश के एक पति ने तलाक की अर्जी दाखिल की, जिसमें उसने दावा किया कि उसकी पत्नी हर दिन अपने माता-पिता से फोन पर लंबी बातें करती थी और उसे अनदेखा करती थी। उसने इसे "वैवाहिक कर्तव्यों की अनदेखी" बताया। हालांकि, अदालत ने इसे तलाक के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना और पति की याचिका खारिज कर दी।

(5.)पत्नी का मांसाहारी खाना न बनाना:→
2018 में गुजरात के एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी से इसलिए तलाक मांगा क्योंकि वह मांसाहारी खाना नहीं बनाती थी। पति मांसाहारी भोजन का शौकीन था और उसे उम्मीद थी कि शादी के बाद उसकी पत्नी उसके लिए मांसाहारी खाना बनाएगी। अदालत ने इस याचिका को ठुकराते हुए कहा कि यह तलाक का पर्याप्त कारण नहीं हो सकता और शादी को समाप्त नहीं किया जा सकता।

(6.)पत्नी का रोजाना पूजा-पाठ करना:→
मध्य प्रदेश के एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी से तलाक की मांग की, यह कहते हुए कि वह रोजाना घंटों पूजा-पाठ में व्यस्त रहती है और उसे समय नहीं देती। उसने इसे "क्रूरता" का आधार बताया। अदालत ने कहा कि धार्मिक आस्थाओं के कारण तलाक नहीं दिया जा सकता, और यह मामला खारिज कर दिया गया।

(7.)दूल्हे का नाचने से इनकार:→
उत्तर प्रदेश में एक शादी के दौरान एक पति ने शादी में नाचने से इनकार कर दिया, जिससे पत्नी का परिवार नाराज हो गया। यह बात इतनी बढ़ गई कि पत्नी ने पति के साथ जाने से इनकार कर दिया और तुरंत तलाक की मांग की। इस घटना ने लोगों का ध्यान खींचा और भारतीय शादियों में परंपराओं और अपेक्षाओं का एक अनोखा उदाहरण बना।

( 8.)पत्नी का नौकरी न करना:→
दिल्ली में एक व्यक्ति ने तलाक की अर्जी दी, जिसमें उसने कहा कि उसकी पत्नी शादी के बाद नौकरी नहीं करना चाहती थी, जबकि शादी से पहले उसने नौकरी करने का वादा किया था। अदालत ने इसे धोखे का मामला मानते हुए पति के पक्ष में फैसला सुनाया और तलाक की मंजूरी दी।

 (9.)पति का बिना बताये टैटू बनवाना:→
मुंबई के एक दंपत्ति में, पत्नी ने तलाक की याचिका दायर की क्योंकि उसके पति ने उसकी अनुमति या जानकारी के बिना टैटू बनवाया था। पत्नी ने इसे धोखे और असहमति का प्रतीक माना। हालांकि, अदालत ने इसे तलाक का पर्याप्त आधार नहीं माना और याचिका खारिज कर दी।

(10.)पति का घर के कामों में मदद न करना:→
पुणे की एक महिला ने अपने पति के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की, जिसमें उसने कहा कि उसका पति घर के कामों में मदद नहीं करता और उसे सारा काम अकेले ही करना पड़ता है। उसने इसे मानसिक और शारीरिक क्रूरता का आधार बताया। अदालत ने इस तर्क पर विचार करते हुए तलाक को मंजूरी दी।


निष्कर्ष:→
तलाक के ये अनोखे केस भारतीय समाज और कानूनी प्रणाली में हो रहे बदलावों को दर्शाते हैं। हर मामला अपने आप में अलग है और यह साबित करता है कि तलाक के कारण किसी भी सामाजिक, धार्मिक या व्यक्तिगत कारण से उत्पन्न हो सकते हैं।

     तलाक की नोटिस का ड्राफ्ट तैयार करते समय यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उसमें कानूनी बारीकियां स्पष्ट रूप से शामिल हों। नोटिस का उद्देश्य संबंधित पक्ष को तलाक की प्रक्रिया के बारे में सूचित करना और उनके अधिकारों और दायित्वों के बारे में जानकारी देना होता है। 

यहां एक सामान्य ''तलाक की नोटिस'' का ड्राफ्ट दिया गया है जिसे पति की तरफ से पत्नी को भेजा जा सकता है:→


                       नोटिस फॉर डिवोर्स

From:→
[पति का नाम]  
[पता]  
[फोन नंबर]  
[ईमेल]

To:→
[पत्नी का नाम]  
[पता]  
[फोन नंबर] (यदि ज्ञात हो)

Subject: →तलाक के लिए विधिक नोटिस

दिनांक: [तारीख]

प्रिय [पत्नी का नाम],

मैं, [पति का नाम], आपको यह कानूनी नोटिस भेज रहा हूं कि हमारे वैवाहिक संबंधों में उत्पन्न समस्याओं, विवादों और असहमति के कारण मैं आपके साथ वैवाहिक जीवन को आगे जारी नहीं रख सकता। हमारा वैवाहिक जीवन पिछले [साल/महीने] से तनावपूर्ण और असंतोषजनक रहा है, जिसके कारण हमारे बीच समझौता संभव नहीं है।

    मैंने कई बार प्रयास किया कि हमारे बीच का विवाद हल हो सके और हमारा वैवाहिक जीवन सुचारु रूप से चल सके, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। हमारे बीच पिछले [अलग रहने की अवधि] से आपसी सहमति और तालमेल की कमी रही है, जिससे वैवाहिक संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए हैं।

       अतः, मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि मैं आपके साथ तलाक लेना चाहता हूं। यह नोटिस आपको वैधानिक रूप से तलाक की प्रक्रिया की जानकारी देने के उद्देश्य से भेजी जा रही है। मेरी ओर से यह निर्णय पूरी तरह से ठोस और गंभीर विचार-विमर्श के बाद लिया गया है, और मैं अब हमारे वैवाहिक संबंध को समाप्त करना चाहता हूं।

तलाक के संदर्भ में मैं आपको कुछ शर्तों की जानकारी देना चाहता हूं:→

(1.)गुजारा भत्ता (Alimony): →मैं इस विषय पर सहमति के लिए तैयार हूं कि यदि आप तलाक के बाद गुजारा भत्ता की मांग करती हैं तो मैं कोर्ट द्वारा तय की गई राशि देने के लिए सहमत हूं। इसे लेकर आप मुझसे सीधे संपर्क कर सकती हैं।

(2.)बच्चों की कस्टडी (यदि कोई हो): →हमारे बच्चे [बच्चों का नाम] के संबंध में हम आपसी सहमति से कस्टडी और उनकी देखरेख के संबंध में फैसला कर सकते हैं। मैं यह सुझाव देता हूं कि हम दोनों बच्चों के सर्वश्रेष्ठ हित में मिलकर निर्णय लें। 

3. संपत्ति का विभाजन: →हमारी साझा संपत्तियों का बंटवारा कानूनी प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि इस बंटवारे में आपकी अधिकारों की पूर्ण रक्षा हो।

        इस नोटिस के प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर आप तलाक की प्रक्रिया को लेकर अपनी सहमति या असहमति से मुझे सूचित करें। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर आपकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिलता है, तो मैं यह मान लूंगा कि आप इस मामले में सहमत हैं और तब मैं तलाक की अर्जी अदालत में दाखिल करूंगा।

    आप इस नोटिस के संदर्भ में कानूनी सलाह लेने के लिए स्वतंत्र हैं और मुझे इस मामले को सुलझाने में आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। 

  आपकी ओर से कोई भी प्रतिक्रिया [पति का पता या वकील का पता] पर भेजी जा सकती है।

धन्यवाद,

आपका शुभेच्छु,  
[पति का नाम]  
[हस्ताक्षर]



महत्वपूर्ण बातें:→

1. इस नोटिस को भेजने से पहले किसी वकील से सलाह लेना आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कानूनी रूप से सब कुछ सही हो।
2. नोटिस में किसी भी प्रकार की धमकी या अनुचित भाषा का उपयोग नहीं होना चाहिए।
3. नोटिस भेजते समय शिष्टाचार का ध्यान रखें ताकि मामला और अधिक जटिल न हो।
  
इस नोटिस के आधार पर संबंधित महिला को तलाक की प्रक्रिया शुरू करने की जानकारी दी जाती है।


तलाक की प्रक्रिया में नोटिस भेजने के बाद कितने दिनों में तलाक मिल सकता है, यह कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे तलाक किस प्रकार का है (आपसी सहमति से या एकतरफा), अदालत में लंबित मामलों की संख्या, और कानूनी प्रक्रिया का पालन।

(1.)आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce):→
आपसी सहमति से तलाक में, दोनों पति-पत्नी सहमत होते हैं कि वे अपने वैवाहिक संबंध को समाप्त करना चाहते हैं। इस प्रकार के तलाक में सामान्यत: प्रक्रिया इस प्रकार होती है:→

पहला चरण:→ जब दोनों पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल करते हैं, तो अदालत उनकी याचिका पर विचार करती है और दोनों पक्षों को सुनती है।
  
6 महीने की प्रतीक्षा अवधि:→ पहले, अदालत 6 महीने का इंतजार करवाती थी ताकि पति-पत्नी अपने फैसले पर पुनर्विचार कर सकें। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के अनुसार, यदि अदालत को लगता है कि सुलह का कोई अवसर नहीं है, तो वह 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि को खत्म कर सकती है।
  
अंतिम सुनवाई: →यदि 6 महीने की अवधि खत्म हो जाती है (या उसे माफ कर दिया जाता है) और दोनों पक्ष तलाक के लिए सहमत रहते हैं, तो अदालत तलाक की डिक्री (अंतिम आदेश) जारी करती है।

समय सीमा: →आपसी सहमति से तलाक में सामान्यत: 6 महीने से 1 साल का समय लग सकता है, यदि दोनों पक्ष तैयार हैं और सुलह की कोई संभावना नहीं है।

(2.)एकतरफा तलाक (Contested Divorce):→
यदि केवल एक पक्ष तलाक चाहता है और दूसरा पक्ष तैयार नहीं होता, तो यह एकतरफा तलाक का मामला होता है। इसमें अदालत को तलाक के वैध आधारों (जैसे कि क्रूरता, विवाहेतर संबंध, मानसिक बीमारी, धर्म परिवर्तन, इत्यादि) पर सुनवाई करनी होती है। यह प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है।

प्रारंभिक सुनवाई: → जब एक पक्ष तलाक की याचिका दाखिल करता है, तो अदालत दूसरे पक्ष को नोटिस जारी करती है, और उन्हें जवाब देने का समय देती है (आमतौर पर 30 दिनों के भीतर)।
  
साक्ष्यों और गवाहों की सुनवाई: →दोनों पक्ष अदालत में अपने साक्ष्य और गवाह पेश करते हैं। अदालत इन सभी साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए तलाक का निर्णय करती है।
  
अंतिम आदेश:→ अदालत मामले की जटिलता के आधार पर तलाक की डिक्री जारी करती है।

समय सीमा: →एकतरफा तलाक में आमतौर पर 1 से 3 साल या उससे अधिक का समय लग सकता है, क्योंकि इसमें गवाही, साक्ष्य और अपील जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।

(3.)सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप:→
कभी-कभी तलाक के मामले सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच जाते हैं, खासकर जब दोनों पक्षों के बीच कोई कानूनी जटिलता होती है। ऐसी स्थिति में यह प्रक्रिया और लंबी हो सकती है।


निष्कर्ष:→
•आपसी सहमति से तलाक : →6 महीने से 1 साल में हो सकता है (अदालत द्वारा 6 महीने की अवधि खत्म किए जाने पर और भी जल्दी)। 
•एकतरफा तलाक:→1 साल से 3 साल या उससे अधिक समय लग सकता है, यह मामले की जटिलता पर निर्भर करता है।

कानूनी प्रक्रिया की जटिलता और अदालतों में लंबित मामलों की संख्या के कारण तलाक मिलने में समय बदल सकता है।

नोट:→

 यह मात्र एक सुझाव है या नमूना मात्र है अत्यधिक जानकारी के लिये किसी वकील की सलाह अवश्य लें ।
    

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