मुस्लिम कानून कैसे बने? इनको बनाने का क्या उद्देश्य था? या मुस्लिम विधि के उद्भव एवं इसकी प्रकृति की विवेचना कीजिए?( development and nature of the Mohammedan law?)
मुस्लिम विधि का उद्भव(Origin):- मुस्लिम विधि का उद्भव 'अल कुरान' अथवा 'कुरान' से हुआ है जिसका अंत काल से खुदा की सत्ता में अस्तित्व होना विश्वास किया जाता है। पैगंबर ने स्वयं कहा है की उनको फरिश्ता जिब्राइल के द्वारा विभिन्न भागों में तथा विभिन्न अवसरों पर प्रकाशित किया गया। कुरान की आयतें खुदा का कलाम ( कलामे अल्लाह) होने के कारण जो इंसान को उनके पैगंबर के आखिरी देवदूत के माध्यम से पहुंची प्रश्नातीत (unquestionable ) तथा निश्चायात्मक समझी जाती हैं। 'कुरान 'अल्लाह का पैगंबर साहब को संबोधित संवादों के एक क्रम के रूप में है। ये संवाद जनता के सामने पैगंबर साहब के पैगंबर बनने के बाद 23 वर्षों में भिन्न-भिन्न अवसरों पर प्रकट किए गए और उनमें ज्यों-ज्यों प्रश्न उठते गए विभिन्न समस्याओं से संव्यवहार किया गया। धर्म तथा आध्यात्म के अलावा कुरान में विधिशास्त्र का समावेश है जो 'शरअ' मुख्य आधार है। इस व्याख्या से स्पष्ट है कि मुस्लिम विधि का उद्भव ईश्वरीय है। यह ईश्वर द्वारा प्रदत्त विधि है। इसका पालन करना हमारा कर्तव्य हो जाता है। कुरान के उपबंन्धों के पूरक हैं : अहदी तथा सुन्ना। अहदी (Ahadis) अर्थात पैगंबर तथा सुन्ना की परंपराएं। अहदी अथवा परम्परायें पैगंबर के उपदेश , कार्य तथा कथन है जो उनके जीवन काल में लिपिबद्ध तो नहीं किए गए थे, परंतु परंपरागत रूप से सुरक्षित रखे गए और जो अधिकृत व्यक्तियों द्वारा एक के बाद दूसरे को सौंपे गए थे जिनसे कानूनी फैसले के लिए प्रेरणा प्राप्त की जाती थी।
सुन्ना वे परंपराएं हैं जो स्वयं पैगंबर ने किया। यदि किसी प्रश्न पर कोई बात कुरान या अहदी तथा सुन्ना में नहीं दी गई है तो ऐसी दशा में इज्मा (Ijma) अर्थात किसी प्रश्न विशेष पर किसी काल विशेष के विधि वेत्ताओं की सहमति (Concurrence) तथा कियास (Qiyas) अर्थात अंतःकरण और तर्क अनुसार निश्चित नियमों का पालन किया जाता था। यह सिद्धांत ही मुस्लिम धर्म विधि की आधारशिला हैं।
मुस्लिम विधि का विकास:- मुस्लिम विधि के विकास को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है
(1) प्रथम काल:- यह काल हिजरी सन् 10(622 ई. से 632 ई. )तक है।मक्का से हिजा या पलायन के समय (सन् 622 ई.) से मुस्लिम युग आरम्भ होता है क्योंकि मोहम्मद साहब ने अपने अनुयायियों को इकट्ठा करके मक्का वालों को बदर की लड़ाई (सन् 623) में पराजित किया। तदुपरांत सफलता के 10 वर्ष(हिज्री सन् 1 से 10 ) आरंभ हो गया। इस काल में कुरान की आयतों और हजरत साहब के उपदेशों और उनके आचरण से उन्नत परंपराओं का संकलन किया गया। कुरान की आयतें(Ayats) ईश्वर की वह इच्छाएं और आज्ञायें थी जो हजरत मोहम्मद के माध्यम से विभिन्न विषयों पर शब्दों या आचरण द्वारा उन विषयों पर व्यक्त किए इन पर ईश्वर की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था। कुरान शरीफ भी अधिकांश विधि संबंधी आयतें इसी काल में प्रकाश में आईं। अल्लाह का प्रथम संदेश मोहम्मद साहब को मक्का में 609 ई. में प्राप्त हुआ। तत्पश्चात समय-समय पर उन्हें दैवीय संदेश प्राप्त होते रहे। मक्का के दैवीय संदेश धार्मिक या आध्यात्मिक प्रकृति के होते थे। इस प्रकार मोहम्मद साहब के देहावसान के पूर्व के अंतिम 10 वर्ष मुस्लिम विधि के विधि निर्माण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। कुरान शरीफ की अधिकांश विधि संबंधी आयतें इसी काल में उतरीं। यह सर्वविदित है कि कुरान शरीफ की आयतें मदीना में नाजिल हुईं(उतरीं) । वह एक बढ़ते हुए सामाजिक और राजनीतिक जनसमुदाय और पैगंबर मोहम्मद साहब को विधायक और समाज सुधारक के रूप में प्रकट करते हैं। को शरीफ में वर्णित आयतें प्रत्यक्ष प्रेरणा (Direct inspiration) के परिणाम हैं।
(2) द्वितीय का हाल खिलाफत का काल: -द्वितीय काल हिजरी सन 10 से 14 अर्थात 30 वर्ष का समय है। मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद उनके चार उत्तराधिकारियों (जो खुलफा ए राशिदीन यानी न्यायशील खलीफा कहलाते हैं ) पैगंबर के समान ही मुस्लिम साम्राज्य का शासन चलाया । यह काल चार खलीफाओं अवूबकर उमर उसमान और अली का काल कहा जाता है। इस काल में कुरान का संकलन तथा संपादन कार्य संपन्न हुआ। तृतीय खलीफा उस्मान के समय कुरान प्रकाशित हुई। इस युग में प्राचीन रीति-रिवाजों का प्रयोग अत्याधिक होता था। ऐसा करना सुन्ना का पालन करना अर्थात पैगंबर के आदेशों का पालन करना समझा जाता था। इस काल में पैग़म्बर के चरित्र और उक्तियों का अनुसरण किया गया है।
इस काल में दो महत्वपूर्ण बातें हुई वे हैं प्रथम यह की प्राचीन परंपराओं को मान्यता दी गई और उनको सुन्ना का नाम दिया गया। दूसरे यह कि कुरान शरीफ का संग्रह करा कर खलीफा उस्मान ने अंतिम रूप दे दिया। इस संबंध में यह कहा जाता है कि खलीफा हजरत उस्मान के समय से अब तक इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है और आज भी यह अधिकृत ग्रंथ माना जाता है।
(3) तृतीय काल: यह काल हिजरी सन 40 से प्रारंभ होता है तथा हिज्र पश्चात तीसरी सदी तक विस्तृत होता है। यह काल लंबा तथा महत्वपूर्ण है। इस काल में चार सुन्नी संप्रदाय की स्थापना हुई जिनके नाम क्रमशः हनाफी (Hanafi ), मलिकी (Maliki) ,शाफई (shafi) ,और हनबाली (Hanbali) थे। सर अब्दुल रहीम के अनुसार इन चारों संप्रदायों में आधारभूत रूप में कोई अंतर नहीं था।
इस काल में हजरत के युग की परंपराओं(Tradition ) का वैधानिक रूप से अध्ययन किया गया। तत्कालीन परंपरावादी और विधि शास्त्री 'अबू अब्दिल्लाह मुहम्मद अबू इस्माइल अल बुखारी के जिन्हें संक्षेप में 'बुखारी '(Bukhari) कहा जाता था करीब 600000 प्रमाणित परंपराओं से 7000 का संकलन करके एक पुस्तक तैयार की। इस प्रकार मुस्लिम इब्नुल हजीज ( muslim ibnuil hajij) ने भी परम्पराओं का संकलन किया।
इसके अतिरिक्त परंपराओं को तार्किक दृष्टि से तोला जाने लगा। जिन विषयों पर कोई मतभेद होता था उन पर धर्म विधिशास्त्रियों का सामूहिक निर्णय या इज्मा(Ijma) लिया जाने लगा। क्यास (Quyas ) या तर्क द्वारा निर्णय लेना भी इसी काल में प्रचलित हुआ। अबू हनीफा ,शफी और मलिक द्वारा प्रतिपादित किए गए सिद्धांतों को इल्मुल उसूल (ilmul usul) कहा गया और उन्हें मुस्लिम विधि के दर्शन( philosophy of Muslim law) की जड़ बताया गया। इसी काल में अबू हनीफा हुये जिनकी हनीफी विचार धारा सुन्नी शाखा की चारों विचारधाराओं में उदार है क्योंकि यह क्यास( सदृश्य निष्कर्ष) में विश्वास करती है। इसी काल में इज्मा और क्यास के सिद्धांत पूर्ण किए गए , जिनसे मुस्लिम विधि शास्त्र का विकास हुआ।
(4) चतुर्थ काल: यह काल चारो सुन्नी शाखाओं की स्थापना के समय से प्रारंभ होता है और 1924 ई. तक जारी रहता है। चार बड़े इमामों अबू हनीफा मलिक इब्न अनास अशशफी और इब्न हनब्ल के बाद मुस्लिम विधि के विधिवेक्ताओं ने निर्वाचन (Interpretation) का कार्य जारी रखा। इस काल में इज्तिहाद (स्वतंत्र व्यक्ति गत) और तकलीद (अनुसरण) के नाम के दो समरूप सिद्धांतों का आविर्भाव हुआ। इस काल में इज्तिहाद (Ijtihad ) द्वारा कानून का सूक्ष्म रूप में अध्ययन करके किसी ठोस निर्णय पर पहुंचा जाता था। तकलीद (Taqlid) का कार्य भी इसी युग में प्रारंभ हुआ जिसमें वह कार्य मुज्ताहिद (Mujtahid) द्वारा किया जाता था। वैसे तकलीद (Taqlid) का अर्थ अनुसरण करना होता है जो कि बिना प्रमाण के ज्ञान प्राप्त होने पर किया जाए। चारों सुन्नी शाखाओं के प्रवर्तकों की मृत्यु के पश्चात कोई मुस्लिम विधिवेत्ता उन प्रवर्तक ओं की कोटी का नहीं हुआ जो विधि के नए सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकता । परिणाम स्वरूप उन चार विधिवेक्ताओं के द्वारा निर्मित विधिक नियमों का समाज द्वारा अनुसरण किया गया। इस प्रकार तकलीद के सिद्धांत (अनुसरण के सिद्धांत) का विकास हुआ है।
(5) पंचम काल: सन 1924 ईस्वी में खलीफा के पद को समाप्त कर दिया गया। सन 1924 ईस्वी के पश्चात धार्मिक प्रधान के रूप में कोई खलीफा नहीं हुए जो मुस्लिम धार्मिक विधि को लागू कर सके। इसलिए आधुनिक काल में शरीयत को मुस्लिम विधि से अलग कर दिया गया। शरीयत को लागू करने के लिए कोई उपयुक्त प्राधिकारी ना होने के कारण शरीयत केवल नैतिक आचार संहिता रह गई है। जबकि मुस्लिम विधि के पीछे राज्य की शक्ति(sanction) प्राप्त है। इस्लामिक देशों में (जैसे टर्की मिस्त्र ट्यूनीशिया में) विधि के संहिता करण द्वारा ऐसा प्रयास किया गया है कि शरीयत के मूलभूत चरित्र को सुरक्षित रखते हुए विधि को आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप निर्मित किया जाए।
भारत में मुस्लिम विधि का विकास
(अ) मुस्लिम काल: मुस्लिम काल में न्याय प्रशासन के लिए काजी नियुक्त किए जाते थे। इस काल में काजी(Kazi) कानून के किसी खास विषय के प्रयोग के लिए स्वतंत्र थे। इस तरीके से वे प्रभावशाली न्याय करते थे , परंतु उनका कोई भी निर्णय उनके अनुयायियों के लिए विधि की शक्ति धारण नहीं कर सका। मुगल काल में औरंगजेब द्वारा लिखित फतवा ए आलमगिरी एक महत्वपूर्ण अभिलेख माना जाता है।
(ब) ब्रिटिश काल: अंग्रेज मुस्लिम विधि का प्रयोग व्यक्तिगत विधि(Personal law) की शाखा के रूप में करते थे। मुसलमानों के मामलों में दाय (iheritance) उत्तराधिकार(succession) विवाह तथा अन्य जातिगत प्रथाओं के सभी विवादों में मौलवियों के मंत एवं मुस्लिम विधि के अनुरूप कुरान की विधियों पर ही हर न्याय होता था। न्यायालय में भी मुस्लिम विधि से संबंधित मामलों के लिए मुस्लिम विधि अधिकारी (mohammedan law officers) नियुक्त किये गये जो न्यायाधीशों को कुरान और शरीयत के अनुसार निर्णय देने में परामर्श देते थे। मुसलमानों के व्यक्तिगत हितों को शरीयत अधिनियम 1937 की धारा2 के अनुसार सुरक्षित रखा गया जो अब तक सुरक्षित है।
प्रकृति(Nature): विधि शास्त्र के अनुसार विधि को साधारणतया एक समादेश (Command) के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह समादेश व्यक्ति विशेष के कार्य व्यवहार को सुसंगठित करता है । तथा एक विशिष्ट राजनैतिक विधि द्वारा समाज हेतु उसके प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार को ठीक प्रकार से चलाने के लिए होता है। मुस्लिम विधि की प्रकृति मूलतः उपर्युक्त परिभाषा से भिन्न नहीं है। यह केवल विशिष्ट राजनीतिक ना होकर दैवीय होता है। ईश्वर ने मानव को केवल सृष्टि ही नहीं वरन अस्तित्व प्रदान करके उसे उसके पथ से परिचित भी कराया है। उसने मानव को उस मार्गदर्शन का ज्ञान प्रदान किया है। यही मार्गदर्शन और उसका अनुसरण ही वह चीज है जो अरबी भाषा में इस्लाम के नाम से प्रज्ञात है। फितरताल्लाहिल लती फतरन ,नाम अल्लाह ,ला तब्दील लिखित किल्लाह जालिकक्दीनुइल कैयिम अर्थात ईश्वर की प्रकृति जिस पर मानव की रचना की है। ईश्वर की प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं होने का यही ठीक और सही दीन और धर्म है। ईश्वर की इच्छा सत्य शिव और सुंदर है। इसी के अनुसार मानव की रचना हुई है। ईश्वरी इच्छा और उसकी योजना का परिचय स्वयं मानव के अस्तित्व से मिलता है। अतः मुस्लिम विधि की प्रकृति अन्य राजनैतिक विधियों से भिन्न है क्योंकि वह दैवीय अर्थात ईश्वरीय आदेश से अवतरित हुई है। न्यायमूर्ति अब्दुल रहमान ने बहुत स्पष्ट रूप से इसकी व्याख्या की है: विधि ईश्वर के आदेश द्वारा स्थापित होती है। विधि के विषय में सामान्य रूप से प्राचीन काल में धर्म और कानून एक दूसरे से अभिन्न रूप से मिश्रित थे , क्योंकि धर्म की उत्पत्ति दैवीय मानी जाती है। मुसलमानों की विधि दैवीय प्रकाशन पर आधारित है और उनके धर्म से मिश्रित है। इसलिए मुस्लिम विधि शास्त्र का पहला सिद्धांत है: खुदा में ईमान या निष्ठा और कार्यों पर उसके अधिकार की स्वीकृति। दूसरा सिद्धांत है मोहम्मद साहब की पैगंबरी में विश्वास। इस्लाम में अल्लाह ही एकमात्र विधायक है और अल्लाह के बाद सार्वभौम शक्ति(Sovereign) जनता में निहित है। पैगंबर मोहम्मद व्यवस्थाकार है और कुरान ही विधि का ग्रंथ है। इस कारण कानून को धर्म से पृथक करना संभव नहीं है।
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