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मेहर क्या है? मुस्लिम पत्नी का मेहर का अधिकार और पूरा कानून कहानी के माध्यम से

मुस्लिम विधि के प्रमुख सम्प्रदाय कौन कौन से ha?

मुस्लिम विधि की दो प्रमुख शाखाएं हैं- सुन्नी तथा शिया। सुन्नी शाखा में इस समय 4 उप शाखाएं हैं :- हनाफी ,मालिकी , शफी और हनबली।

                         शिया शाखा में तीन उपशाखाएं हैं:- अथना, अशारिया, इस्माइलिया और जैदिया । मुस्लिम विधि की दो शाखाओं में विभाजन धार्मिक भेद के कारण ना होकर राजनीतिक आधारों पर है। पैगंबर मोहम्मद साहब की मृत्यु 632 ईसवी में हुई। उनकी मृत्यु के पश्चात यह प्रश्न उठा कि उनका उत्तराधिकारी कौन हो। क्योंकि मोहम्मद साहब के कोई पुत्र नहीं था अतः उत्तराधिकारी की नियुक्ति के प्रश्न पर विवाद हुआ।एक पक्ष उत्तराधिकार के सिद्धांत के पक्ष में था और दूसरा निर्वाचन के पक्ष में। एक पक्ष  शिया का कहना था कि मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी मोहम्मद साहब के परिवार के सदस्य ऐसे व्यक्ति को होना चाहिए जिसे उन्होंने स्वयं कहा हो और पैगंबर के चचेरे भाई अली हो , जो कि उनकी एकमात्र जीवित पुत्री फातिमा के पति थे , इस प्रकार से वह एक वैद्य उत्तराधिकारी थे। दूसरा पक्ष(सुन्नी ) का कहना था कि मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी की नियुक्ति जमात(समुदाय ) के मतदान से होनी चाहिए। मोहम्मद साहब की सबसे छोटी विधवा आयशा ने इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और उसने अपने पिता अबूबकर  को तिकडम से  खलीफा(उत्तराधिकारी ) के पद परचुनवा लिया। यह चुनाव वास्तव में उस समय हुआ जब पैगंबर मोहम्मद साहब के परिवार के लोग और अली उनके अंतिम संस्कार में व्यस्त थे। इस प्रकार इस चुनाव द्वारा मोहम्मद साहब के दामाद अली अपने श्वसुर के उत्तराधिकारी बनने से वंचित रह गए।


             शिया सम्प्रदाय के लोग अली को प्रथम खलीफा मानते हैं और वे लोग अबू बकर , उमर और उस्मान को खलीफा( मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी) के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं और उनका कहना है कि यह तीनों खलीफा वास्तविक उत्तराधिकारी ना होकर अप्रतिभावी (Usurpers) थे।


               मोहम्मद साहब की मृत्यु के पश्चात मुस्लिम समाज उनके उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर दो वर्गों में विभाजित हो गया। एक वर्ग सुन्नी संप्रदाय के लाया तथा दूसरा शिया।


सुन्नी संप्रदाय: इस संप्रदाय को अबू हनीफा ने स्थापित किया था। सुन्नी लोग जनतांत्रिक प्रणाली में विश्वास रखते थे।अतः उनका विचार था कि खलीफा के पद के लिए चुनाव होने चाहिए। इस संप्रदाय के लोग विधिवेत्ताओं की साधारण सभा के विनिश्चयों को कुरान के नियमों का अनुपूरकों के समय मानते हैं। उनकी दृष्टि में इज्मा और कियास का महत्वपूर्ण स्थान है।

सुन्नी संप्रदाय को निम्नलिखित चार भागों में विभक्त किया जा सकता है:-

(1) हनाफी  (Hanafi)

(2)  मालिकी (Maliki)

(3) शापई (shafei)

(4) हनवाली (Hanbali)


(1) हनाफी (Hanafi):- हनाफी विचार पद्धति के मुख्य प्रमाण अबू हनीफा तथा उनके  दो शिष्यों (1) अबयुसुफ एवं (2) इमाम मोहम्मद की रचनाएं और उनकी रायें हैं। इस विचार पद्धति का लक्षण यह था कि इसने मौखिक परंपराओं (oral tradition ) के पुँज पर विश्वास ना करने तक की एक सूक्ष्म  में युक्ति पूर्ण रीति और सादृश्य (क्यास) के द्वारा कुरान के सिद्धांत का विकास किया और इज्मा के सिद्धांत की स्पष्ट परिभाषा की। अबू हनीफा निजी अनुमान के समर्थक थे। वे सादृश्य ध्धोतक अनुमतियों और विधिवेत्ताओं के अन्त:करण पर ज्यादा भरोसा करते थे तथा उन्होंने बहुत सी परंपराओं का अपवर्जन ही नहीं किया वरन्  परंपरा की विधि तीक्ष्णता को कम करने के लिए इतिहासन नाम के एक विधि शास्त्रीय साम्य के सिद्धांत को भी प्रचलित किया। विधि की यह पद्धति हनीफा विधि कही जाती है। और उसके सागिर्द अब यूसुफ के द्वारा प्रवर्तन में लाए जाने के कारण उसने प्रमुखता  प्राप्त कर ली। यह विचार पद्धति उत्तर भारत ,अरब ,सीरिया ,तुर्की और मिस्र में प्रचलित है। इस विचार पद्धति के अंतर्गत हिदाया ,रह उल मुखतार, दुरूल मुखतार, कुदरी की अल मुख्तसर सुपरिचित ग्रंथ हैं। फतबा ए आलमगीरी में जिसका सम्राट औरंगजेब के आदेश पर संकलन किया तब भी विचार पद्धति के सिद्धांत समाविष्ट हैं।



(ब) मलिकी (Maliki):- इस विचार पद्धति का नाम मलिक इब्न अनास के नाम पर पड़ा जो मदीना में रहते और शिक्षा देते थे जहाँ ये मुफ्ती के पद पर थे यह विचार पद्धति वास्तव में परम्परावादी थी , परन्तु जहाँ परम्परा से काम नहीं चलता था , वहाँ निजी अनुमान के प्रयोग की आज्ञा दे देती थी । यद्यपि मलिक परम्परा पर जोर देते थे फिर भी ' क्यास ' का अपवर्जन नहीं करते थे । इस विचार पद्धति की सम्पत्ति और बच्चों पर शक्ति केवल इसी विचार पद्धति के अन्तर्गत विवाहित स्त्री अपनी सम्पत्ति की पूर्ण स्वामिनी नहीं थी । यह पद्धति उत्तरी अफ्रीका , मोरक्को और स्पेन में प्रचलित है । 

             मालिकी शाखा की मुख्य विशेषता यह है कि परिवार के मुखिया की शक्ति स्त्रियों और शिशुओं पर अत्यधिक होती है । विवाहिता स्त्री अपनी सम्पत्ति की पूर्ण स्वामिनी नहीं मानी जाती और वह पति की आज्ञा के बिना अपनी सम्पत्ति का विक्रय , दान आदि नहीं कर सकती है । मालिकी शाखा के जितने भी बड़े बड़े शिक्षक हुए हैं वे न्यायाधीश या वकोल रहे हैं और इस कारण वे केवल ऐसी बातें करते हैं जो व्यावहारिक ( Practical ) हो  । अन्य शाखा की में ये लोग रीति - रिवाजों की अत्यधिक मान्यता प्रदान करते हैं । 


(स)शफाई ( Shafei ) :- मोहम्मद सफी इस विचारधारा के प्रवर्तक थे । इनका जन्म पैलेस्टाइन में गाजा नामक स्थान पर उस दिन हुआ जिस दिन अबू हनीफा की मृत्यु हुई । मोहम्मद शफी न्याय के लिए प्रसिद्ध हैं । इन्होंने अहादी पर अधिक ध्यान दिया तथा उसूलों की स्थापना सर्वप्रथम की ।ये अबू हनीफा में ज्यादा और मलिक से कम परम्परा पर भरोसा करते थे । शफाई पद्धति के मानने वाले दक्षिणी भारत और कैटो में पाये जाते हैं । 



       हनवली ( Hanbali ) - इस विचार पद्धति के संस्थापक अहमद बिन हनबल थे । इन्होंने परम्पराओं पर अधिक जोर दिया । उन्होंने इज्मा तथा क्यास का प्रयोग निश्चित सीमा तक कम कर दिया । यह कहा जाता है कि शफी ने बगदाद छोड़ते समय यह कहा था कि अहमद बिन हलबल एक महात्मा और विधिवेत्ता है और इनसे अच्छा कोई विधिशास्त्री बगदाद में नहीं है । मसनद एक प्राधिकृत पुस्तक है । जिसमें अहमद बिन हलबल ने 80,000 हदीसों को एकत्रित किया है । अरब में इस पद्धति के अनुयायी बहुत कम हैं और अब यह सम्प्रदाय सिर्फ मध्य अरब , फारस की खाड़ी के तटों पर मध्य एशिया और सीरिया में कहीं - कहीं मिलता है ।


         ये चारों पद्धतियाँ कट्टर सुन्नी विधि की हैं जिन्हें ' सुन्ना ' ( परम्परा ) पर आधारित होने के कारण यह नाम  दिया गया है ।  सामान्यता यह माना जाता है कि प्रत्येक मुस्लिम को अपनी विचार पद्धति पसन्द करने का  अधिकार है ।जिसके अनुसार उनका उसका फैसला होगा और प्रत्येक मस्जिद चारों पद्धति वालों के लिए खुली रहती है ।


  शिया ( Shia ) – ' शिया '   शब्द का अर्थ सम्प्रदाय या ‘ गुट ' है । मोहम्मद साहब की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी आएशा ने अली (मोहम्मद साहब के दामाद ) को उत्तराधिकार से वंचित करके अपने पिता अबूबकर को  खलीफा बनवा दिया । शिया सम्प्रदाय ने इसका विरोध किया । उन्होंने कहा कि मोहम्मद साहब के उत्तराधिकार ( successor ) का चयन निर्वाचन के आधार पर नहीं होना चाहिए । उनकी बात न माने जाने पर उन लोगों ने अली ( Ali ) को मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी के रूप में खलीफा मान लिया । शिया लोगों के सिद्धान्त , आदर्श और नियम सुन्नी लोगों से बिल्कुल भिन्न हैं । ये चयन के आधार पर निर्वाचित पहले तीन खलीफा , क्रमशः अबूबक्र , उमर और उस्मान को नहीं मानते । शिया लोगों को दो भागों में बांटा जाता है


 ( अ ) इस्माइली ( Ismailie ) , तथा 

( ब ) इथना आशरी ( Ithna Asharis ) |


 भारतवर्ष में दो प्रकार के शिया लोग पाये जाते हैं 

( क ) खोजा ( Khoias ) या पूर्वी इस्माइली प्रतिनिधित्व 49 वें इमाम आगा खाँ करते हैं ये लोग दक्षिणी अफ्रीका , मध्य एशिया प्रशा और सीरिया इत्यादि में पाये जाते हैं ।

 ( ख ) बोहरा ( Boharas ) या पश्चिमी इस्माइली । इनको दाऊदी ( Daudi ) और सुलेमानी ( Sulamanis ) वर्गों में बाँटा जाता है । बोहरा ( Bohara ) शब्द का अर्थ होता है । व्यापारी । जिनमें हिन्दू बोहरा , सुत्री बोहरा और इस्लामी धर्म के बोहरा सम्मिलित होते हैं । इस सम्प्रदाय के लोग सीरिया , दक्षिणी अरब विशेषकर यमन और प्रशान्त की खाड़ी के पास पाये जाते हैं ।


                अधिकतर शिया लोग इथना आशिरी ( Ithna Ashari ) मत के मानने वाले हैं भारत में लखनऊ , मुर्शिदाबाद में इस मत के लोग मिलते हैं । 

संक्षेप में मुसलमानों को निम्नलिखित तालिका के अनुसार विभक्त किया जा सकता है



 शिया ( Shia ) 

इथना आशरी (Ithna Ashari)

इस्माईली (Ismali) 

जैदी ((zaydi))

( Sunni ) हनाफी मलिकी हर्नबली 
    

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