शरीयत अधिनियम 1937:- मुस्लिम विधि के लिए शरीयत अधिनियम एक विशेष महत्व रखता है। इस अधिनियम का उद्देश्य जैसा कि इसकी प्रस्तावना से ही प्रतीत होता है। ऐसी विधि का निर्माण करना है जिससे कि भारतीय मुस्लिमों पर व्यक्तिगत कानून लागू हो सके।यह अधिनियम 7 अक्टूबर 1937 को लागू हुआ। यह अधिनियम उत्तरी पश्चिमी सीमा प्रांत को छोड़कर समस्त भारत व पाकिस्तान के मुस्लिमों पर लागू होता है। इसकी केवल 6 धाराएं हैं।
इसके प्रावधान ऐसे रीति-रिवाजों को मान्यता नहीं देते जो शरीयत अधिनियम के विरुद्ध मालूम पड़ते हैं। शरीयत अधिनियम सारे मुस्लिम संप्रदायों (Mohammedan schools) पर लागू होता है और यह उपबंध कृषि भूमि ,वसीयत द्वारा उत्तराधिकार, दान को छोड़कर सभी प्रकार की संपत्तियों के मामलों में लागू होते हैं।
धारा1 :- इस अधिनियम को मुस्लिम वैधानिक विधि( शरीयत) प्रयोग अधिनियम 1937 कहा जा सकेगा। इस अधिनियम का प्रसार समस्त भारत में होगा।
धारा2:- इसकी सबसे महत्वपूर्ण धारा है , जो कि ऐसे सभी रीति-रिवाजों को रद्द करती है जो इस्लाम धर्म के विरुद्ध हों। इस धारा में निम्नलिखित 10 प्रावधान है
(1) इच्छापत्रहीन उत्तराधिकार (Intestate succession)
(2) स्त्रियों की विशेष संपत्ति जिनमें कि उनको व्यक्तिगत उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति दान तथा संविदा द्वारा प्राप्त संपत्ति भी शामिल है
(3) निकाह या विवाह
(4) विवाह
(5) भरण पोषण
(6) मेहर
(7) संरक्षता
(8) न्यास और न्यस्त संपत्ति
(9) दान (हिबा) तथा
(10) वक्फ
मुस्लिम वैयक्तिक विधि:-( शरीयत) प्रयोग अधिनियम की धारा 2 के प्रावधान अनिवार्य रूप से सभी मुसलमानों पर लागू होंगे। किंतु धारा 3 के प्रावधान तभी लागू माने जाएंगे जब वे इस बात की घोषणा करेंगे कि वह इस धारा के प्रलाभ पाने के इच्छुक हैं।
धारा 3:- इस धारा के अनुसार इस अधिनियम का लाभ केवल वही उठा सकता है जो निम्न शर्ते पूरी करता हो:
(1) वह मुसलमान हो
(2) संविदा करने के सक्षम हो
(3) भारत का निवासी हो
इस प्रकार की लिखित घोषणा करने पर कि वह इस अधिनियम का लाभ उठाना चाहती है धारा 2 के प्रावधान उस पर लागू हो जाएंगे। उक्त प्रावधान जिसकी अल्प वयस्क संतानों तथा इसके अधो वंशजों पर भी ऐसे लागू कर दिए जाएंगे जैसे उसके गोद वसीयत पैतृक संपत्ति संबंधी प्रावधान भी सम्मिलित है।
धारा 5:- इस धारा के अंतर्गत जिला न्यायाधीश को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी विवाहित मुस्लिम स्त्री द्वारा विवाह विच्छेद या तलाक का आवेदन देने पर जिसको कि मुस्लिम विधि में से मान्यता प्राप्त स्वीकार कर सके। आजकल यह धारा प्रचलित है नहीं है क्योंकि इसको मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939(Muslim Dissolution of Marriage Act, 1939) की धारा 6 द्वारा विखंडित कर दिया गया है। इसके अलावा इस धारा 6 से निम्नलिखित धारायें भी विखंडित कर दी गयीं है
(अ) बम्बई रेगुलेशन 4 की धारा 23
(ब) मद्रास सिविल कोर्ट एक्ट की धारा 16
(स) अवध कानून अधिनियम की धारा 3
(द) पंजाब कानून अधिनियम की धारा 5
(य) मध्य प्रांत कानून अधिनियम की धारा 5
(र) अजमेर कानून रेगुलेशन की धारा 4
सन 1936 के एक मामले में शरीयत अधिनियम की धारा कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस निर्णय को रद्द कर दिया गया जिसमें कहा गया था कि विवाह विच्छेद के लिए वाद किसी अधिकार रखने वाले मुंसिफ के न्यायालय में दायर किया जा सकता है । आज भी उस मामले जैसी स्थिति है कि विवाह विच्छेद के लिए जिला अदालत के अलावा किसी भी अन्य निम्न स्थान न्यायालय में वह दायर किया जा सकता है।
शरीयत अधिनियम का प्रभाव(Effect of shariat Act):- शरीयत अधिनियम का मुस्लिम विधि पर क्या प्रभाव पड़ा इसके बारे में अनेक विचार धाराएं हैं:
मुल्ला(Mulla) का कथन है कि शरीयत अधिनियम 1937 भूतलक्षी (Retrospective) प्रभाव नहीं रखता अर्थात इसमें जो आदान-प्रदान तथा दखलयावी इसके लागू होने पर पूर्व हो चुकी है उसमें परिवर्तन नहीं होगा।
लाहौर उच्च न्यायालय ने अपना मत व्यक्त किया कि शरीयत अधिनियम भूतलक्षी प्रभाव(retrospective effect) नहीं रखता है। सन् 1937 के पूर्व वादी की विधवा के बैनामे के विरुद्ध आपत्ति दायर करने का अधिकार उस बैमाने की तिथि से 6 वर्ष के अंतर्गत या शरीयत अधिनियम में लागू होने पर यह अधिकार उससे छीना हुआ नहीं समझा जा सकता।
पेशावर के न्यायिक आयुक्त ने यह निर्णय दिया कि इस अधिनियम के लागू होने के पश्चात उत्तराधिकार के सभी पक्षों के मध्य के मामले मुस्लिम कानून के अनुसार तय किये जाएगें ना कि रिवाजों के अनुसार। चाहे वह उत्तराधिकारी अधिनियम के लागू होने से पहले या बाद में प्रकाश में आए हो।
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