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Supreme Court Judgments February 2026

उन्मुक्तता (पागलपन )कब एक अच्छा बचाव (प्रतिरक्षा ) होता है?(When is insanity a good defence ?)

भारतीय दंड संहिता की धारा 84 यह  उपबंधित करती है कि कोई बात अपराध  नहीं है जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है जो उसे करते समय चित्त विकृति  के कारण उस कार्य की प्रकृति या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है जानने में असमर्थ है।


         धारा 84 के अंतर्गत अपराधिक विधि में पागल व्यक्तियों को पूर्ण संरक्षण प्रदान किया गया है। कोई व्यक्ति मानसिक विकृति से पीड़ित होता है से विकृत चित्त व्यक्ति कहा जाता है और ऐसा व्यक्ति कोई अपराध करता है तो उसे दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसे विकृत चित्त  व्यक्तियों में अच्छे और बुरे को समझने की क्षमता नहीं होती है। इन विकृत चित्त  व्यक्तियों के बारे में ब्लैक स्टोन ने कहा है कि ये व्यक्ति अपने पागलपन मात्र से ही स्वंय दण्डित है अतः उन्हें विधि द्वारा दंडित किया जाना उचित नहीं है।


स्टीफेन के अनुसार कोई कृत्य अपराध नहीं होगा यदि जिस व्यक्ति ने उसे कारित किया है विकृत करते समय मानसिक विकृति के कारण यह समझने की क्षमता ना रखता हो कि उसके कृत्य की प्रकृति और परिणाम क्या है तथा जो कुछ वह कर रहा है वह गलत( अपराध) कृत्य हैं।



           भारतवर्ष में पागलपन से पीड़ित व्यक्तियों द्वारा किए गए अपराधों के बारे में जो व्यवस्था दंड संहिता की धारा 84 में दी गई है वह कोई मौलिक वस्तु नहीं है वरन इंग्लैंड के मैकनाटन केस में निकाले गए निष्कर्षों का संशोधित रूप है।


मैकनाटन केस: अपराधिक उन्मत्ता के संबंध में यह एक महत्वपूर्ण मामला है। इसमें  मैकनाटन(mac.naughten) कई वर्षों से उत्पीड़न उन्माद नामक रोग से पीड़ित हैं। मैकनाटन की यह धारणा थी कि कुछ व्यक्तियों का दल उनका पीछा करता था। निंदा करता था और उन्हें मिलने वाली जगहों और नौकरियों में बाधा उपस्थित करता था। एक दिन उन्होंने चेयरिंग क्रॉस रेलवे क्रॉसिंग पर एक व्यक्ति को गोली मार दी जिसका नाम डूमंड था। उन्होंने उसे इंग्लैंड का प्रधानमंत्री सर रोबर्ट फील समझकर गोली मारी क्योंकि उन्हीं को वह अपने दुर्भाग्य का कारण मानते थे। जूरी ने अभियुक्त को उन्मुक्तता के आधार पर दोष मुक्त घोषित कर दिया। इस निर्णय की बड़ी आलोचना हुई जिसके कारण लार्ड सभा के न्यायाधीशों विषय पर विचार जानने के लिए पांच प्रश्न भेजें। न्यायाधीशों की ओर से भेजे गए उत्तरों के निष्कर्षों के आधार पर बने नियम को मैकनाटन नियम नाम से जाना जाता है।


         (CR vs. Mac.Naughten 10 C.I.F.30)



मैकनाटन नियम:-


(1) जो व्यक्ति आंशिक भ्रम(Partial delusion) में पडकर कोई अपराध करें उसे दंडित किया जाए।

(2) पागलपन प्रमाणित करने के लिए यह प्रमाणित करना होगा कि वह  व्यक्ति ऐसी मानसिक बीमारी या विवेक हीनता से पीड़ित था कि:


(a) वह उस कार्य की प्रकृति या लक्षण को नहीं जानता था।


(b) उनको इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह जो कुछ कर रहा  है वह दोषपूर्ण है।


(3)यह जूरी का कार्य है कि वह ऐसी व्यवस्थाओं सहित जो मामले की परिस्थितियों में आवश्यक हो वह निश्चित करें कि क्या उसके पास यह जानने का उचित कारण था कि वह दोषपूर्ण कार्य कर रहा था।


(4) जब कोई व्यक्ति पागलपन युक्त भ्रम(Insane delusion) में  अपराध करे तो क्षम्य है परंतु यदि स्वस्थ चित्त  और आंशिक भ्रम से पीड़ित है तो उसी प्रकार से दंडित किया जाएगा जैसा अन्य सामान्य मनुष्य।


(5) डॉक्टरी विशेषज्ञ काम मत जिसने पहले अपराधी को देखा हो परंतु संपूर्ण परीक्षण के समय उपस्थित रहा हो अपराधी की मानसिक स्थिति के बारे में परामर्श देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसका मत केवल साक्ष्य  के लिए होगा।


इस संबंध में भारत में कानून: भारतवर्ष में मैकनाटन  केस के निष्कर्षों को सैद्धांतिक रूप में वैसा मान लिया गया है परंतु व्यवहार में कुछ संशोधन करके छूट दी गई है। अतः धारा 84 में कहा गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कार्य उस स्थिति में अपराध नहीं है जब वह व्यक्ति उस कार्य को किए जाते समय:


(a) पागलपन के कारण उस कार्य की प्रकृति को समझने में असमर्थ हो।

(b) वह यह समझने में असमर्थ हो की वह जिस कार्य को कर रहा है वह गलत और कानून के विरुद्ध है।जिन मामलों में उन व्यक्तियों के संबंध में यह सिद्ध हो की पूरी तरह से जड़ (idiot) या मूर्ख हैं या जिन्हें समझ ना हो यह सिद्ध करना आसान होता है कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया। जो व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं परंतु किसी भ्रम(Delution) के कारण अपराध करते हैं या जिनको पागलपन के आकस्मिक दौरे पड़ते हैं जिन के वशीभूत होकर वे अपराध करते हैं तो उनके पागलपन या उन्माद की स्थिति की गंभीरता को सिद्ध करना बड़ा कठिन होता है।



           इस बचाव के लिए यह आवश्यक है कि अभियुक्त अपराध करते समय विकृत चित्त हो। अपराध किए जाने के पूर्व या बाद में उसकी चित्त  विकृति बचाव के रूप में स्वीकार किए जाने योग्य नहीं होगी। उल्लेखनीय है कि यदि कोई व्यक्ति भाव आवेश में आकर अपना मानसिक संतुलन खो देता है तथा उत्तेजनावश कोई अपराध कर बैठता है तो उसे धारा 84 के अंतर्गत विकृत चित्तता का बचाव उपलब्ध नहीं होगा।


निर्णीत वाद (1) रामलाल बनाम राजस्थान राज्य इस केस में अभियुक्त ने एक 8 वर्षीय बालक की हत्या की थी जिसके लिए कोई कारण प्रतीत नहीं होता था। डॉक्टरी रिपोर्ट में यह कहा गया था कि अभियुक्त मिर्गी का शिकार होने के कारण उसके मस्तिष्क पर इसका प्रभाव पड़ा था परंतु इस बात का कोई साक्ष्य नहीं था कि हत्या कारित करते समय अभियुक्त मानसिक विकार से पीड़ित था। हत्या कारित करने के बाद  अभियुक्त का अपने गांव भाग जाना अपने आप में पर्याप्त कारण था कि उसे अपने कृत्य की प्रकृति तथा विधि विरुद्ध होने की जानकारी थी अतः उसका चित्त  विकृति का बचाव अमान्य किया गया।


(2) सम्राट बनाम लक्ष्मण इस मामले में अभियुक्त सदैव ज्वर से पीड़ित रहता था इसलिए उसे प्राया आवेग आता था। आवेग की अवस्था में वह व्यग्र और बेसुध हो जाता था। एक दिन अपने बच्चों के रोने से खींज कर उसने अपने बच्चों की हत्या कर दी। साक्ष में यह साबित हो चुका था कि हत्या करते समय अभियुक्त आवेग में नहीं था तथा उसे ज्ञान था कि वह क्या कर रहा है।  उसकी ओर से मानसिक विकृति का बचाव प्रस्तुत किया गया। न्यायालय ने अभियुक्त को हत्या के लिए दोषी सिद्ध करते हुए दंडित किया क्योंकि अपराध करते समय वह पूरे होश हवास में था।


(3) महाराष्ट्र राज्य बनाम गौरीशंकर के मामले में अभियुक्त को विक्षिप्तता के दौरे आते रहते थे। इस दौरान वह अपराध करके भाग गया परंतु बाद में उसने स्वयं को छुपाने की कोशिश की तथा उसने गिरफ्तारी से बचने का प्रयत्न किया एवं उसका प्रतिरोध किया। विचारण के समय न्यायालय ने अभियुक्त को पूर्णता स्वस्थ चित्त  पाया। अतः उसके पूरे आचरण को देखते हुए न्यायालय ने धारा 84 के अंतर्गत बचाओ दिए जाने योग्य नहीं पाया और उसे दंडित किया।


(4)विमन शा बनाम मध्य  प्रदेश राज्य में अभियुक्त ने बिना किसी कारण तो महिलाओं की कुल्हाड़ी से सिर काट  कर वीभत्स  हत्या कर दी। यह साक्ष्य  विद्यमान था कि पूर्व में भी उसे कभी-कभी मानसिक विकार के दौरे पडे थे। इस घटना के पश्चात अभियुक्त यह कह रहा था कि उस पर किसी ईश्वर की छाया थी और इसलिए उसने दोनों महिलाओं के सिर काट दिए। पागलपन के तर्क को स्वीकार करते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने रोगमुक्त होने तक उसे मानसिक अस्पताल में रखने का निर्देश दिया।




मत्तता के कारण कारित विकृतिचित्ता भारतीय दंड संहिता की धारा 85 और 86 के अन्तर्गत स्वेच्छया मत्तता(नशेबाजी) एक प्रतिरक्षा नहीं है परंतु यदि लंबे समय तक बार-बार लगातार नशे के कारण अभियुक्त के चित्त  पर इस सीमा तक प्रभाव पड़ जाए कि वह एक पागलपन या विकृत चित्त  व्यक्ति बन जाए तो यदि वह यह साबित कर दें कि विकृति चित्तता के कारण वह अपने कार्य की प्रकृति को नहीं जानता था या यह जानने में असमर्थ था कि उसका कार्य दोषपूर्ण था तो वह धारा 84 के अंतर्गत प्रतिरक्षा प्राप्त करने का अधिकारी है।



(1977) क्रि एल जे (एन ओ सी 165)


10 बम्बई 512

एआईआर 1966 बम्बई 179

1996 क्रि एल जे 3395 (मध्य प्रदेश)


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