कानून की भाषा में सहमति क्या होती है? किन परिस्थितियों में किसी व्यक्ति की सहमति मान्य प्रतिरक्षा होती है?( what do you understand by consent? Explain those circumstances in which the consent of a person is a valid defence.)
सहमति(Consent):- भारतीय दंड संहिता में सहमति की कोई परिभाषा नहीं दी गई है केवल धारा 90 में इस बात का उल्लेख किया गया है कि मान्य सहमति क्या है। भारतीय दंड संहिता की धारा 90 उप बंधित करती है कि कोई सहमति ऐसी सम्मति नहीं है जैसी इस संहिता की किसी धारा से आशयित है। यदि सम्मति किसी व्यक्ति ने क्षति , मद के अधीन यदि तथ्य के भ्रम के अधीन दी हो और यदि कार्य करने वाला व्यक्ति यह जानता हो या उसके पास विश्वास करने का कारण हो कि ऐसे भ्रम के परिणाम स्वरूप वह सम्मति दी गई थी अथवा
यदि वह सम्मति ऐसे व्यक्ति ने दी हो जो चित्त विकृति या मत्तत्ता के कारण उस बात की जिसके लिए वह अपनी सम्मति देता है प्रकृति और प्रणाम को समझने में असमर्थ हो।
जब तक की संदर्भ में तत्प्रतिकूलिता प्रतीत ना हो यदि वह सम्मति ऐसे व्यक्ति ने दी है जो 12 वर्ष से कम आयु का है।
इस धारा में स्वतंत्र सहमति क्या है इसकी व्याख्या की गई है। स्वतंत्र सहमति से अभिप्राय ऐसी सहमति से है जो बिना किसी प्रकार के कपट अथवा भय के दी गई हो। एक न्याय शास्त्री के अनुसार सहमति एक विवेकपूर्ण कार्य है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति अपने लिए अच्छाई बुराई सोच कर कोई कार्य करें या किसी दूसरे को अनुमति दें। यह बात इस सिद्धांत पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों के बारे में स्वयं निर्णायक होता है।
अतः वह अपनी सहमति के कारण मृत्यु को प्राप्त होता है या चोट खाता है तो उसका अपना उत्तरदायित्व होता है। लैटिन भाषा का यह वाक्य( Volention fit injuria) उच्च तथ्य को सिद्ध करता है क्योंकि
(1) कोई भी व्यक्ति अपने हितों के बारे में स्वयं ही अच्छा निर्णायक है।
(2) कोई भी व्यक्ति स्वयं को क्षति या हानि पहुंचाने वाले कार्य के लिए सहमति नहीं देगा।
अतः धारा 90 में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें सहमति को स्वतंत्र सहमति नहीं माना गया है और इनके आधार पर किसी अपराध से बचाव प्राप्त नहीं किया जा सकता है।ये परिस्थितियां निम्नलिखित में से कोई भी हो सकती हैं:
(1) किसी भय के अधीन दी गई सहमति
(2) किसी तथ्य के भ्रम के कारण दी गई सहमति या कपट के द्वारा ली गई सहमति
(3) विकृत चित्त द्वारा ली गई सहमति
(4) 12 वर्ष से कम आयु के बालक द्वारा दी गई सहमति
(5) स्वैच्छिक मद्यता के अधीन दी गई सहमति
सहमति एक मान्य प्रतिरक्षा(cons avalid defence):- निम्नलिखित परिस्थितियों में सहमति एक मान्य प्रतिरक्षा मानी जाती है:
(1) कोई बात जो मृत्यु करने अथवा गंभीर चोट पहुंचाने के आशय से न की जाए और वह किसी ऐसे व्यक्ति की अभिव्यक्ति अथवा विवक्षित(implied) सहमति से की गई हो जिससे उस बात से होने वाली अपहानि सहन करनी हो और वह 18 वर्ष से ऊपर हो तो वह अपराध नहीं होती।
(धारा 87)
उदाहरण:- A औरB मनोरंजन के लिए पटेबाजी करने का समझौता करते हैं। उस समझौते में बात निहित है कि खेल के नियम के विरुद्ध होते हुए भी किसी को हानि पहुंच जाए। खेल के दौरान a द्वारा B घायल हो जाता है A ने अपराध नहीं किया है।
(2) जब कोई बात सदभावना पूर्वक दूसरे के लाभ के लिए की जाती है और उसमें मृत्यु को करने का आशय नहीं होता तथा उस हानि को सहन करने व खतरा उठाने की स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से सहमति ले ली जाती है तो वह अपराध नहीं होता।
( धारा 88)
उदाहरण: एक सर्जन ने कष्टप्रद व्याधि से ग्रस्त किसी व्यक्ति का उसकी सहमति से सद्भावना पूर्वक और उसकी मृत्यु करने के आशय के बिना ऑपरेशन किया तो यदि ऑपरेशन असफल हो जाए तो सर्जन का कोई अपराध नहीं होगा।
सूरज बली के वाद में एक नेत्र चिकित्सक विशेषज्ञ ने किसी महिला की आंख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया जिसके कारण उस महिला की आंख की ज्योति चली गई। अभियुक्त (नेत्र विशेषज्ञ) के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई चल़ाए जाने पर अभियुक्त की ओर से धारा 88 के अंतर्गत संरक्षण का तर्क प्रस्तुत किया गया। न्यायालय ने अभियुक्त को निर्दोष करते हुए उक्त ऑपरेशन भारतीय पद्धति के अनुसार पूर्ण सावधानी से किया गया होने के कारण उसे धारा 88 के अंतर्गत बचाओ देना न्यायोचित है।
दीपा बनाम पुलिस उप निरीक्षक में केरल उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि दंड संहिता की धारा 87 और 88 उन मामलों में लागू नहीं की जा सकती जहां समाज का हित अंतर ग्रस्त हो। फलता होटल और रेस्टोरेंट टो मे कैबरे नृत्य देखने वाले व्यक्ति प्रस्तुतीकरण की अश्लीलता से होने वाले क्षोभ के बारे में परिवाद कर सकते हैं यद्यपि उन्हें पूर्व में भी इस बात का ज्ञान था कि प्रस्तुतीकरण में धारा 294 के अंतर्गत अश्लीलता के कार्य भी सम्मिलित हो सकते हैं।
कोई कार्य जो 12 वर्ष से कम आयु वाले व्यक्ति के लाभ के लिए जब सदभावना पूर्वक संरक्षक या कानूनी रूप से दायित्व रखने वाले व्यक्ति की सहमती से जो प्रकट रूप से या लक्षित किया जाए तो किसी हानि के कारण अपराध नहीं है जो उसकी बात में किसी व्यक्ति को पहुंचे या पहुंचाए जाने का कर्ता का आशय हो या जिसके बारे में करने वाले को मालूम हो कि उसका उस व्यक्ति को पहुंचना संभव है
(1) इस अपवाद का विस्तार आशायुक्त मृत्यु करने या मृत्यु की चेष्टा करने तक ना होगा।
(2) इसका विस्तार मृत्यु या गंभीर चोट को दूर करने या किसी गंभीर बीमारी या असमर्थता को दूर करने के आशय से अन्यथा किसी बात के लिए नहीं होगा जिसे करने वाले व्यक्ति को यह जानकारी हो की उस कार्य से मृत्यु भी हो सकती है।
(3) इस अपवाद का विस्तार स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने या गंभीर चोट पहुंचाने की चेष्टा करने के लिए तब तक नहीं होगा जब तक वह कार्य मृत्यु या गंभीर चोट को दूर करने या किसी गंभीर बीमारी या निर्दयता को दूर करने के आशय से न किया गया हो।
(4) किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण के लिए इस अपवाद का विस्तार तब तक नहीं होगा जब तक कि उसका विस्तार किसी अपराध के लिए नहीं है।
(धारा 89)
A अपनी 12 वर्ष से कम आयु की पुत्री bके संबंधी फायदे के लिए c द्वारा b पर बलात्संग कारित करने के लिये दुष्प्रेरित करता है। यहाँ पर a और c मे से कोई इस धारा का संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता।
उदाहरण(1) क सदभावना पूर्वक अपने शिशु के फायदे के लिए अपने शिशु की संपत्ति के बिना यह सम्भाव्य जानते हुए कि शस्त्रकर्म से उस शिशु की मृत्यु कारित होगी न कि इस आशय से कि उसकी शिशु की मृत्यु कारित करदे शल्य चिकित्सक द्वारा पथरी निकलवाने के लिए अपने शिशु की शल्यक्रिया करवाता है। क का उद्देश्य शिशु को रोग मुक्त करना था इसलिए इस अपवाद के अंतर्गत आता है।
(2) अ अपने बच्चे के हित के लिए उसे परिरोध में रखता है अ ने कोई अपराध नहीं किया ।
(3) एक अभिभावक( बच्चे का पालक) अपने बच्चे को एक मर्यादित सीमा में रहते हुए करता है ताकि वह सुधर जाए जहां अभियुक्त ने कोई अपराध नहीं किया है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 89 यह स्पष्ट करती है कि जब कोई बात 12 वर्ष से कमाई के व्यक्ति विकृत चित्त के व्यक्ति के फायदे के लिए उसके संरक्षक द्वारा या विधि पूर्ण भार साधक किसी अन्य व्यक्ति द्वारा सदभावना पूर्वक उसकी अभिव्यक्ति या विवादित संपत्ति से की जाय तो किसी ऐसी अपहानि के कारण वे अपराध नहीं होगा जो उसे बात से व्यक्ति को कारित करने का कर्ता का आशय हो या कारित होने की संभावना के बारे में कर्ता के ज्ञान में हो।
इस धारा के अंतर्गत संरक्षण केवल तभी प्राप्त है जब कार्य सदभावना पूर्वक किसी ऐसे व्यक्ति के फायदे के लिए किया जाए जो या तो 12 वर्ष से कम आयु का हो या जो किसी भी आयु का विकृत चित्त का व्यक्ति हो।
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