शरीर तथा संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार कब से प्रारंभ होकर कब तक रहता है और कब समाप्त हो जाता है?( right of private defence commence continue and terminate defence of person and property ?
(A) शरीर की प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ तथा कालावधि(Commencement and duration of the defence of body): शरीर की प्रतिरक्षा का अधिकार उस समय से प्रारंभ हो जाता है जब किसी व्यक्ति को अपने या किसी अन्य व्यक्ति के शरीर के संकट उत्पन्न होने की युक्तियुक्त आशंका हो जाए और उस समय तक बना रहता है जब तक कि ऐसी आशंका बनी रहे ।
( धारा 102)
धार 102 का आशय यह है कि प्रतिरक्षा का अधिकार केवल उसी समय प्रारंभ हुआ नहीं माना जाता जब कोई अपराध वास्तव में घटित हो जाए बल्कि धमकी मिलने पर शुरू हो जाता है और पहले से ही प्रतिरक्षा संबंधी कार्यवाही की जा सकती है।
रविंद्र नाथ बनाम राज्य के मामले में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि निजी प्रतिरक्षा के बचाव के लिए अभियुक्त द्वारा केवल इतना साबित कर देना मात्र पर्याप्त नहीं है कि उसके शरीर के खतरे की आशंका का प्रारंभ हो गया है अपितु उसे यह भी साबित करना होगा कि अपराध कारित होने तक वह खतरा निरंतर बना हुआ था। खतरे की समाप्ति होते ही इस प्रतिरक्षा का अधिकार भी समाप्त हो जाएगा ।
धारा 102 के अंतर्गत व्यक्ति को प्राप्त निजी प्रतिरक्षा का अधिकार स्वयं को अवैध हमले से बचने के लिए होगा ना कि हमलावर को उसके द्वारा किए गए हमले की सजा देने के लिए। अतः यह एक प्रतिरोधात्मक अधिकार है ना कि दंडात्मक अधिकार।
(ब) संपत्ति की प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ तथा कालावधि(Commencement and duration of Right of private defence of property): भारतीय दंड संहिता की धारा 105 के अनुसार संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार तब प्रारंभ होता है जब संकट की युक्तियुक्त आशंका प्रारंभ हो। निम्नलिखित अपराधों में यह व्यवस्था इस प्रकार है:
(1) चोरी(Thieft): चोरी के मामले में संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार उस समय तक रहता है जब तक की
(a) अपराधी माल चुराकर उस चोरी की संपत्ति सहित बाहर न चला जाए
(b) जब तक लोक अधिकारी की अपेक्षित सहायता ना मिल जाए।
या
(c) वह संपत्ति वापस ना मिल जाए
(2) लूट(Robbery) के मामले में
(a) जब अपराधी किसी की मृत्यु कर रहा हो
या
(ब) किसी व्यक्ति को चोट पहुंचा रहा हो
या
(स) दोषपूर्ण ढंग से अवरुद्ध करने की चेष्टा कर रहा हो
(द) जब तक तत्काल मृत्यु या तत्काल चोट या तत्काल वैयक्तिक अवरोध बना रहने का भय हो
(3) आपराधिक अनाधिकारी प्रवेश(criminal tresspass): अपराधिक अनाधिकार प्रवेश(criminal trespass) ,रिष्टि(mischeif) के मामलों में उस समय तक जब तक अपराधी इस कार्य को करता रहता है।
(4) रात्रि में गृह भेदन के विरुद्ध(Against house breaking by night): जब तक गृह भेदन का कार्य चलता है।
यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति को क्षति पहुंचाई जा रही हो तो ऐसी स्थिति में उसे संपत्ति की प्राइवेट रूप से प्रतिरक्षा का तथा अपने शरीर की प्रतिरक्षा का भी अधिकार प्राप्त होगा। इस अधिकार के प्रयोग में उनके द्वारा आक्रमणकारियों को पहुंची क्षति के लिए उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
सामग्री बनाम गुरु चरण सिंह के मामले में गृह भेदन करने वाले एक अपराधी को घर वालों ने पकड़कर कब्जे में कर लिया और उसे निस्सहाय कर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। अभियुक्तों ने धारा 103 के अधीन निजी प्रतिरक्षा की मांग की। न्यायालय ने अभियुक्त के बचाव को अमान्य करते हुए इसे प्रतिरक्षा के अधिकार का उल्लंघन माना।इसी प्रकार जहां एक व्यक्ति अभियुक्त के घर सेंध लगा रहा था आवाज सुनकर अभियुक्त की नींद खुल गई और उसने दबे पांव चोर तक पहुंच कर उस पर गंडासे से वार कर दिया जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई। न्यायालय ने अभियुक्त यकृत को धारा 103 के अंतर्गत निजी प्रतिरक्षा के अधिकार उल्लंघन मानते अभियुक्त को दोष सिद्धि कर दी है।
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