नशे में धुत व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध:- भारतीय दंड संहिता की धारा 85 और 86 में इस संबंध में यह व्यवस्था की गई है कि:
अपनी इच्छा के विरुद्ध मदहोश कर दिए जाने की स्थिति में एक व्यक्ति का जो कि निर्णय असमर्थ है कार्य( act of a person incapable of judgement by region intoxication caused against his will):- भारतीय दंड संहिता की धारा 85 के अनुसार कोई भी कार्य अपराध नहीं है जो कि उसे करते समय नशे के कारण उस कार्य के रूप में यह कि जो वह करता है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है , इसके जानने में असमर्थ है किंतु उस समय जबकि वह वस्तु जिससे उसको नशा हुआ है उसकी उसे अनजाने में उसकी इच्छा के विरुद्ध दी गई है।
इस प्रकार नशे में धुत व्यक्ति को इस धारा के अंतर्गत अपवाद का लाभ प्राप्त करने के लिए यह सिद्ध करना होगा कि(1) वह कार्य की प्रवृत्ति को समझने में असमर्थ था , या
(2) वह यह जानने में असमर्थ था कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है।
(3) वह चीज जिससे अभियुक्त को नशा हुआ था वह उसके अपने ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दी गई होना चाहिए।
अतः भारतीय दंड संहिता की धारा 85 में यह बताया गया है कि यदि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध या जानकारी के बिना धोखे से या षड्यंत्र द्वारा मद्यपान या नशा करने के लिए विवश किया जाए और नशे के प्रभाव में वह अपने कृत्य की प्रकृति अथवा गुण दोष को समझ सकने में असमर्थ हो तो उसका कृत्य क्षम्य होगा। परंतु यदि मद्यपान या नशा स्वयं की इच्छा से किया गया है , तो नशे की हालत में किया गया अपराध कृत्य क्षमा के योग्य नहीं है बल्कि दंडनीय होगा।
यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी नशीली वस्तु का सेवन करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दंड का पात्र होगा।
इस संबंध में डायरेक्टर ऑफ पब्लिक प्रॉसीक्यूशन बनाम बियर्ड का वाद उल्लेखनीय है। इस केस में अभियुक्त ने एक 13 वर्ष की बालिका के साथ बलात्कार किया और इसके पश्चात उसकी हत्या कर दी। अभियुक्त ने अपने बचाव में कहा कि बलात्कार करते समय वह नशे में था। न्यायालय द्वारा यह अवधारित किया गया कि अभियुक्त हत्या के अपराध के लिए दोषी है क्योंकि बलात्कार एवं उसके पश्चातवर्ती अपराध हत्या को अलग अलग नहीं किया जा सकता।
आर .बनाम टेन्डी(R. Vs. Tandy 1989)all england के इंग्लिश वाद में अभियुक्त ने सदैव की भांति यार माउथ 20बार्ले शराब की बजाय बोडका(vodka) की एक पूरी बोतल चढ़ा ली तथा इसके कारण उत्पन्न हुई मत्तत्ता के अधीन उसने अपनी 11 वर्षीय पुत्री की गला घोंटकर हत्या कर दी। उसके विरुद्ध हत्या का अभियोग चलाए जाने पर उसने मत्तत्ता का बचाव लिया। न्यायालय ने उसके बचाव को अमान्य करते हुए उसे हत्या के लिए दोषी ठहराया क्योंकि अपने समान दैनिक मंदिरा के बजाय बोडका पीने की प्रधानता देना यह साबित करने के लिए पर्याप्त था कि उसने जानबूझकर स्वेच्छा से नशीली मदिरा का सेवन किया था जिसके कारण उसकी मानसिक शक्ति का ह्रास हो गया था तथा वह अपने कार्य के परिणामों को समझने की क्षमता खो बैठा था।
देदेकूला खवाला साहब बनाम राज्य में अभियुक्त और मृतक दोनों ही शराब के नशे में झगड़ा करने लगे। अभियुक्त ने मृतक को पीटा और वह उसे खींच कर ले जा रहा था मृतक के पुत्र और पत्नी को अपनी ओर आता हुआ देखकर निहत्थे अभियुक्त से एक पत्थर से मृतक के सिर पर प्रहार किया जिससे उसकी मृत्यु हो गई। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने अभियुक्त को धारा 304 के प्रथम भाग के अधीन दोषी सिद्ध करते हुए यह स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से शराब पीकर अपराध करना संहिता की धारा 85 के अंतर्गत विधि मान्य प्रतिरक्षा नहीं है।
इसी प्रकार भारतीय दंड संहिता की धारा 85 की विवेचना करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से नशे में होता है तो उसका अपराध क्षमा नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत यदि उस व्यक्ति को बाध्य करके चालाकी से धोखे से उसको अज्ञानता में अन्य किसी साधन द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध नशे की वस्तु दी जाती है भारतीय दंड संहिता की धारा 85 के अंतर्गत क्षमा किया जा सकता है।
किसी व्यक्ति द्वारा जो नशे में है किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय का होना अपेक्षित है: भारतीय दंड संहिता की धारा 86 के अनुसार जब कोई व्यक्ति नशे की वस्तु अपनी स्वेच्छा से ग्रहण करें तो वह अपने कार्यों और परिणामों के ज्ञान के लिए उसी प्रकार उत्तरदाई माना जाएगा जैसा वह नशे में ना होने पर माना जाता बशर्ते उसे नशा बिना उसकी जानकारी या इच्छा के विरुद्ध ना करा दिया गया हो।
(धारा 86)
(1) A ने जानबूझकर शराब पी और उत्तेजना युक्त आशय से उसने B पर hockey से प्रहार किया।
(2)A का कोई अपराध नहीं है। यदि वह b के द्वारा दी गई भांग युक्त मिठाई खाने के कारण वह नशे में हो गया जिसके कारण वह अपने कार्य की प्रकृति और परिणाम को अपराध होते समय समझने में असमर्थ था ।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रभुनाथ बनाम राज्य के वाद में अभिनिर्धारित किया कि विधि कि यह उपधारणा है कि नशे की हालत में व्यक्ति में अपराधकारिता करने का आशय निर्माण करने की सामर्थ हो सकती है , अतः दंड संहिता की धारा 86 के प्रावधान गंभीर स्वास्थ्य के अपराध करने वाले अभियुक्तों के प्रति आसानी से लागू नहीं किए जाने चाहिए जब तक इस धारा की सभी आवश्यकतायें भली-भांति पूरी नहीं हो जाती।
सारथी बनाम राज्य में मदिरा के नशे में मत्त तीनों अभियुक्तों ने पहले तो ऐसे ही मत्त मृतक को पीटा और फिर गला घोट कर उसको अचेत कर यह बगैर मालूम किए क्या वह उस समय जीवित था या मृत उसे एक कमरे की छत से लटका दिया। न्यायालय ने उन तीनों अभियुक्तों को अपराधिक मानव वध के लिए इस आधार पर दोष सिद्ध किया कि यद्यपि कार्य करते समय वे तीनों मत्तत्ता में थे , पर धारा 299(3) के अंतर्गत उन्हें यह जानकारी थी कि उनके द्वारा किए जा रहे कार्य के क्या परिणाम होंगे और इसलिया वे धारा 304 भाग (2) के अंतर्गत दंडनीय थे।
एनरीक एफ. रियो बनाम राज्य को अभियुक्त ने अत्यधिक नशे की हालत में अपने मृतक के उदर में प्राणघातक वार किया। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अभियोजनपक्ष अभियुक्त की मृत्यु कारित करने का आशय साबित करने में विफल रहा , पर यह उप धारणा की जा सकती थी कि अभियुक्त धारा 299(3) के अंतर्गत अपने कार्य के परिणामों को जानता था और इसलिए वह धारा 304 भाग 2 के अंतर्गत दंडनीय था।
बाबू सदाशिव जाधव बनाम राज्य में अभियुक्त ने शराब के नशे में अपनी पत्नी के साथ तीखी बातचीत की। क्रोध में उसने पत्नी पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी। पर उसके तुरंत बाद उसने आग बुझाना प्रारंभ कर दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 299(2) के अंतर्गत उसका आशय इस प्रकार की शारीरिक क्षति कारित करना था जिससे मृत्यु सम्भाव्य थी और इसलिए वह धारा 304 भाग (1) के अंतर्गत दंडनीय था।
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