Skip to main content

Supreme Court Judgments February 2026

निजी रक्षा के अधिकार का भारतीय दंड संहिता में दिए गए कौन-कौन से प्रावधान है?( explain the right of self defence in view of revision mode in I.P.C.

आत्मरक्षा का अधिकार( right to self defence):- प्रतिरक्षा के अधिकार के अंतर्गत सबसे पहले व्यक्ति की अपनी रक्षा(self defence ) का प्रश्न पैदा होता है जिसके लिए कोई व्यक्ति अपने जीवन को हानि से बचाने या अपनी मृत्यु  होने से रोकने के लिए शक्ति का प्रयोग कर सकता है परंतु शक्ति उतनी ही प्रयोग करना कानूनी तौर पर मान्य होगा जितनी  उस अपराध या शारीरिक क्षति को रोकने के लिए आवश्यक है । इसके लिए धारा 99 में कुछ प्रतिबंध दिए गए हैं जिनके अनुसार कोई व्यक्ति अपनी निजी रक्षा के लिए निम्नलिखित कार्य करने का अधिकार नहीं रखता:


(1) जब तक किसी कार्य से जिससे कि मृत्यु और गंभीर चोट लगने की युक्ति उक्त आशंका उत्पन्न ना हो जाए सदभावना पूर्वक अपने पदाभास(Under the colour of his office ) में  कार्य करते हुए लोक सेवक द्वारा किया जाता है या लोक सेवक के निर्देशों के अनुसार कार्य करने वाला कोई व्यक्ति जब सदभावना पूर्वक और विधि के अनुसार अपना कार्य करें तो किसी व्यक्ति द्वारा निजी रक्षा के लिए कोई अनुचित कार्य नहीं किया जा सकता है ।


(2) जब अपनी प्रतिरक्षा के लिए लोक अधिकारियों तक पहुंचने का समय हो  तो प्रतिरक्षा का अधिकार प्रयोग नहीं हो सकता ।

(3) आत्मरक्षा के लिए केवल उतनी ही हानि या चोट पहुंचाई जा सकती है जितनी की प्रतिरक्षा के उद्देश्य से किया जाना आवश्यक है।


  •                          एक मामले में गुजरात में भुज ग्राम निवासी योगेंद्र मोरारजी (अपीलार्थी) नामक व्यक्ति ने वहां से 8 मील दूर रामधनपुर नामक ग्राम में भूमि खरीदी और उसकी देखभाल का उत्तरदायित्व एक व्यक्ति को दे दिया जो कि उसी गांव में किराए के मकान में रहता था । एक बार 30 जून 1970 को अपीलार्थी बंबई से अपने गांव आया जहां तथाकथित अभियुक्त ने उससे अपने उन बकाया रुपयों की जो अपीलार्थी  द्वारा उसके खेत में कुआं खोदने की मजदूरी की मद में देय थे भुगतान के लिए मना किए जाने पर वे उत्तेजित हो गए और उन्होंने अपीलार्थी  को गांव से वापस जाने से रोकने के लिए उसकी जीप को घेरकर रोकने का प्रयत्न किया ।अपीलार्थी  ने अपनी पिस्तौल निकालकर तीन फायर किए जिनमें से दो खाली गये और एक गोली घिराव करने वाले में से एक व्यक्ति को लगी जिसकी कि बाद में मृत्यु हो गई। अपीलार्थी ने पुलिस थाने में जाकर अपनी पिस्तौल जमा करा कर  रिपोर्ट दर्ज कराई क्योंकि उसके जीवन को खतरा उत्पन्न हो गया था । अतः उसने आत्मरक्षा एक गोली चलाई । न्यायालय ने आत्मरक्षा के अधिकार को उन परिस्थितियों में उस सीमा तक उचित नहीं माना जहां आतताइयों ने मृत्यु कार्य किया । अतः उसे धारा 304(2) के अधीन दंडित किया .


इस केस में शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के द्वंद में निम्नलिखित सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया:-


(1) व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार ऐसे किसी कृत्य के विरुद्ध नहीं मिलता जो भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध नहीं है ।


(2) इस अधिकार का उपयोग केवल तभी किया जा सकता है जब शरीर के प्रति कोई वास्तविक एवं तत्कालीन खतरा हो ।


(3) यह एक प्रतिकारात्मक अधिकार है ना कि  दंडात्मक 

(4) इसका विस्तार मृत्यु होने तक उस समय होता है जब धारा 100 में वर्णित परिस्थितियां उत्पन्न हो जाएं 


(5) जहां लोक पदाधिकारी  के संरक्षण प्राप्त करने का युक्तियुक्त अवसर हो वहां इस अधिकार का उद्भव नहीं होता


   नूर मियाँ बनाम राज्य के मामले में जब अभियुक्त पर अपने व्यक्तियों द्वारा विभिन्न शस्त्रों से हमला किया जा रहा था  उस समय उसने एक हमलावर से हथियार छीन कर उस पर वार किया जिससे उस हमलावर की मृत्यु हो गई । न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उक्त परिस्थितियों में अभियुक्त अपनी प्रतिरक्षा के बचाव में कार्य कर रहा था इसलिए उसे दोषमुक्त कर दिया यद्यपि जिस समय अभियुक्त ने वार किया था उस समय मृतक बिना हथियार के था ।


       रोज का मामला यह इंग्लैंड का मामला है । अभियुक्त ने गोली चला कर अपने पिता की मृत्यु कर दी । यह समझ कर कि उसके पिता उसकी माता की गर्दन काट रहे थे। यह धारण किया गया कि अभियुक्त  को अपनी माता की प्रतिरक्षा का पूर्ण अधिकार था ।


     परमसुख का मामला इस मामले में एक पुलिस निरीक्षक एक सिपाही के साथ यह सूचना पाकर परमसुख के घर चोरी की संपत्ति रखी हुई है उसके घर गया । वहां पहुंच कर उसने परमसुख की पत्नी से चोरी की संपत्ति उसे दे देने के लिए कहा । पत्नी ने कहा कि उसे उस संपत्ति की कोई भी जानकारी नहीं है । उसका  पति बाहर गया हुआ है तथा शीघ्र ही लौटने वाला है । पर पुलिस निरीक्षक ने उस पर बैंत चला दी। परमसुख की पत्नी के चिल्लाने पर उसका भतीजा उसकी सहायता के लिए दौड़कर वहां आ गया और उसके साथ पुलिस निरीक्षक के बीच विवाद छिड़ गया ।अन्ततः जब पुलिस निरीक्षक तथा सिपाही के द्वारा उसे मारा गया तो  उसने भी सिपाही के हाथ से डंडा छीन कर उस पुलिस निरीक्षक के सिर पर मारा जिससे उसके सिर में घाव हो गया । यह धारण किया गया कि अभियुक्त को अपनी निजी सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है ।

        जहां अभियुक्त के शरीर में कुछ व्यक्तियों ने साधारण क्षति की परन्तु  अभियुक्त ने उन पर इतनी तीव्र गति से उनको क्षति पहुंचाई की एक आक्रमणकारी की मृत्यु हो गई और अभियुक्त ने पीड़ित को अस्पताल में भी नहीं ले जाने दिया तो तथ्यों से यह स्पष्ट है कि उसने आवश्यकता से कहीं अधिक बल का प्रयोग किया और इसके फलस्वरूप उसे प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का लाभ नहीं मिल सकता ।


          जहां पर मृतक स्त्री के पुत्र ने अभियुक्त पर शारीरिक क्षति पहुंचाई परंतु अभियुक्त ने लड़ाई के दौरान पुत्र पर नहीं बल्कि निहत्थे  उसकी मां पर लाठी से कई वार की है  तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसने प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के अंतर्गत ऐसा किया ।


      मोहम्मद यूसुफ बनाम राज्य में अभियुक्त और मृतक के बीच तू-तू मैं-मैं में दोनों एक दूसरे पर राइफल तान दी । मृतक के द्वारा अपनी राइफल नीचे किए जाने के पश्चात अभियुक्त ने उस पर गोली चला दी । उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया  कि अभियुक्त का प्राइवेट प्रतिरक्षा का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है ।


इस संबंध में निम्नलिखित व्यवस्थाएं भी हैं-

     कोई व्यक्ति लोक सेवक द्वारा किए गए कार्यों या उसके निर्देशों द्वारा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए कार्यों के प्रति अपनी आत्मरक्षा के अधिकार से उस समय तक वंचित नहीं होता जब तक यह ना जानता या विश्वास करने का कारण ना रखता हो  कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसा लोकसेवक है या उसके निर्देश के अनुसार कार्य करने वाला कोई व्यक्ति है बशर्ते ऐसे लोग से वाक्य व्यक्ति के पास की लिखित अधिकार पत्र जिसे वह प्रकट ना कर दे ।


(1854)15 क्रोक्स 540

(1925) 27क्रि.ला.ज. 11

कन्हैयालाल बनाम राज्य ,20 ए.आई .आर. 1989 एस.सी. 1515

रामअवतार बनाम राज्य ए.आई.आर. 1993 एस. सी. 302

1954 क्रि.एल.जे. 2181(एस.सी.)



    

Comments

Popular posts from this blog

असामी कौन है ?असामी के क्या अधिकार है और दायित्व who is Asami ?discuss the right and liabilities of Assami

अधिनियम की नवीन व्यवस्था के अनुसार आसामी तीसरे प्रकार की भूधृति है। जोतदारो की यह तुच्छ किस्म है।आसामी का भूमि पर अधिकार वंशानुगत   होता है ।उसका हक ना तो स्थाई है और ना संकृम्य ।निम्नलिखित  व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आसामी हो गए (1)सीर या खुदकाश्त भूमि का गुजारेदार  (2)ठेकेदार  की निजी जोत मे सीर या खुदकाश्त  भूमि  (3) जमींदार  की बाग भूमि का गैरदखीलकार काश्तकार  (4)बाग भूमि का का शिकमी कास्तकार  (5)काशतकार भोग बंधकी  (6) पृत्येक व्यक्ति इस अधिनियम के उपबंध के अनुसार भूमिधर या सीरदार के द्वारा जोत में शामिल भूमि के ठेकेदार के रूप में ग्रहण किया जाएगा।           वास्तव में राज्य में सबसे कम भूमि आसामी जोतदार के पास है उनकी संख्या भी नगण्य है आसामी या तो वे लोग हैं जिनका दाखिला द्वारा उस भूमि पर किया गया है जिस पर असंक्रम्य अधिकार वाले भूमिधरी अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते हैं अथवा वे लोग हैं जिन्हें अधिनियम के अनुसार भूमिधर ने अपनी जोत गत भूमि लगान पर उठा दिए इस प्रकार कोई व्यक्ति या तो अक्षम भूमिधर का आसामी होता ह...

बलवा और दंगा क्या होता है? दोनों में क्या अंतर है? दोनों में सजा का क्या प्रावधान है?( what is the riot and Affray. What is the difference between boths.)

बल्बा(Riot):- भारतीय दंड संहिता की धारा 146 के अनुसार यह विधि विरुद्ध जमाव द्वारा ऐसे जमाव के समान उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए बल या हिंसा का प्रयोग किया जाता है तो ऐसे जमाव का हर सदस्य बल्बा करने के लिए दोषी होता है।बल्वे के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है:- (1) 5 या अधिक व्यक्तियों का विधि विरुद्ध जमाव निर्मित होना चाहिए  (2) वे किसी सामान्य  उद्देश्य से प्रेरित हो (3) उन्होंने आशयित सामान्य  उद्देश्य की पूर्ति हेतु कार्यवाही प्रारंभ कर दी हो (4) उस अवैध जमाव ने या उसके किसी सदस्य द्वारा बल या हिंसा का प्रयोग किया गया हो; (5) ऐसे बल या हिंसा का प्रयोग सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हो।         अतः बल्वे के लिए आवश्यक है कि जमाव को उद्देश्य विधि विरुद्ध होना चाहिए। यदि जमाव का उद्देश्य विधि विरुद्ध ना हो तो भले ही उसमें बल का प्रयोग किया गया हो वह बलवा नहीं माना जाएगा। किसी विधि विरुद्ध जमाव के सदस्य द्वारा केवल बल का प्रयोग किए जाने मात्र से जमाव के सदस्य अपराधी नहीं माने जाएंगे जब तक यह साबित ना कर दिया जाए कि बल का प्रयोग कि...

पार्षद अंतर नियम से आशय एवं परिभाषा( meaning and definition of article of association)

कंपनी के नियमन के लिए दूसरा आवश्यक दस्तावेज( document) इसके पार्षद अंतर नियम( article of association) होते हैं. कंपनी के आंतरिक प्रबंध के लिए बनाई गई नियमावली को ही अंतर नियम( articles of association) कहा जाता है. यह नियम कंपनी तथा उसके साथियों दोनों के लिए ही बंधन कारी होते हैं. कंपनी की संपूर्ण प्रबंध व्यवस्था उसके अंतर नियम के अनुसार होती है. दूसरे शब्दों में अंतर नियमों में उल्लेख रहता है कि कंपनी कौन-कौन से कार्य किस प्रकार किए जाएंगे तथा उसके विभिन्न पदाधिकारियों या प्रबंधकों के क्या अधिकार होंगे?          कंपनी अधिनियम 2013 की धारा2(5) के अनुसार पार्षद अंतर नियम( article of association) का आशय किसी कंपनी की ऐसी नियमावली से है कि पुरानी कंपनी विधियां मूल रूप से बनाई गई हो अथवा संशोधित की गई हो.              लार्ड केयन्स(Lord Cairns) के अनुसार अंतर नियम पार्षद सीमा नियम के अधीन कार्य करते हैं और वे सीमा नियम को चार्टर के रूप में स्वीकार करते हैं. वे उन नीतियों तथा स्वरूपों को स्पष्ट करते हैं जिनके अनुसार कंपनी...