शरीर की व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब होता है? Describe those circumstances under which the right of self defence extents to causing death of an offender.
धारा 100 में उन छ: परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें अभियुक्त को व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए हमलावर की मृत्युकारित करने पर भी अपराध नहीं माना जाता क्योंकि उसका कृत्य निजी प्रतिरक्षा के अधिकार तक नहीं किया गया होता है । यदि अभियुक्तों को धारा 100 में उपबंधित किसी क्षति की युक्तियुक्त आशंका हो तो वह हमलावर की मृत्युकारित कर सकेगा और ऐसी दशा में यह नहीं माना जाएगा कि उसने निजी प्रतिरक्षा के आधार का उल्लंघन किया है ।

निम्नलिखित अवस्थाओं में निजी सुरक्षा का अधिकार किसी की मृत्यु कारित कर दिए जाने तक विस्तृत हो जाता है। यह अवस्थाएं निम्नलिखित है:
(1) ऐसा हमला जिसका परिणाम मृत्यु होने की आशंका से: ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो जाये कि अन्यथा हमले का परिणाम मृत्यु होगी ।
(धारा 100)
उदाहरण के लिए 'क ,ख को छुरा दिखाते हुए यह कहता है कि वह उसे अमुक धनराशि तत्काल प्रदान करें अन्यथा वह छुरे से उसकी हत्या कर देगा और ऐसा कहते ही वह हमला करने को तैयार हो गया। ऐसी अवस्था में ख को अपनी सुरक्षा का अधिकार भी हत्या कर देने तक विस्तृत हो जाएगा।
अजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य के बाद में अभियुक्त मृतक को गालियां दे रहा था जबकि मृतक अपने पास खतरनाक हथियार रखे थे जिससे वह अभियुक्त पर वार कर रहा था। मृतक के हमले के परिणाम स्वरूप अपनी मृत्यु के भय स्वरूप अभियुक्त ने मृतक पर बल्लभ से वार कर दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई । उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त को धारा 100 के अंतर्गत निजी प्रतिरक्षा का बचाव मान्य करते हुए दोषमुक्त कर दिया ।
मसीला माणि बनाम तमिल नाडु राज्य में मद्रास उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अभियुक्त की पीठ पर कारित की गई क्षति जिसका स्पष्टीकरण अभियोजन पक्ष नहीं दे सका यह साबित करती है कि अभियुक्त का पीछा मृतक ने किया था और मृतक ही हमलावर था । यह निष्कर्ष चिकित्सीय साक्ष्य से भी साबित होता है कि जिससे मृतक की पीठ पर कोई क्षति नहीं पाई गई । अभिलेख पर साक्ष्य के अनुसार यह स्पष्ट है कि अभियुक्त की मृत्यु का आशय संकट था अतः उसने मृतक पर जो क्षति कारित की वह प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई अन्वेषण अधिकारी का परीक्षण अभियोजन पक्ष के द्वारा ना करना अभियुक्त पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव डालता है । अतः न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जिला न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित करना कि अभियुक्त ने अपनी प्राइवेट प्रतिरक्षा से परे कार्य किया उचित नहीं था।
नाबियाबाई बनाम राज्य (एआईआर 1992, एस सी 602) के मामले में मृतक ने अभियुक्त स्त्री पर चाकू से आक्रमण कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। अभियुक्त ने किसी प्रकार स्वयं को छुड़ाकर मृतक के हाथ से चाकू छीन कर स्वयं को बचाने के लिए मृतक पर चाकू से कुछ वार किये जिससे उसकी मृत्यु हो गई। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्त ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अपने अधिकार के अंतर्गत ऐसा किया था ।
(2) गंभीर चोट की आशंका: यदि किसी व्यक्ति का कृत्य ऐसा है जिससे गंभीर चोट पहुंचने की आशंका है तो निजी सुरक्षा के अधिकार का विस्तार हो जाता है ।
एक नवीनतम वाद श्रीमती विद्या शरण शर्मा बनाम सुदर्शन कुमार के वाद में अभियुक्त तथा मृतक के बीच हाथापाई हुई इस हाथापाई में अभियुक्त को चोट लगी। अभियुक्त को यह आशंका हो गई कि उसकी जान को खतरा पैदा हो गया है। उसने उस पर हमला किया जिससे उसकी गर्दन में चोट लगी जो घातक सिद्ध हुई । जिससे उसकी मृत्यु हो गई। उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त की दोष मुक्ति को जो कि आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग करने पर प्रदान की गई थी उचित माना।
(3) बलात्कार आदि के आशय से किया गया हमला: बलात्कार(Rape) अप्राकृतिक मैथुन(unnatural inter course) अथवा व्यवहार या अपहरण(kidnapping abduction) करने के आशय से किए जाने वाले हमले की अवस्था में निजी सुरक्षा अधिकार मृत्यु कारित कर देने तक विस्तृत हो जाता है।
(धारा 100)
मोहम्मद सफी बनाम सम्राट के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि यदि मृतक ने अभियुक्त की पत्नी के साथ बलात्कार के लिए उस पर हमला किया हो और अभियुक्त अपनी पत्नी की शरीर रक्षा के लिए हमलावर की मृत्यु कारित की है , तो उसे धारा 100 अंतर्गत प्राइवेट प्रतिरक्षा का बचाव उपलब्ध होगा।
(4) लूट(Robbery): रात्रि में गृह भेदन(House breaking by night ), अग्नि द्वारा रिष्टि(mischief by fire) जो मानव निवास स्थान टेंट या जलयान जो संपत्ति की अभिरक्षा का स्थान हो , को कारित की गई हो । चोरी रिष्टि अतिचार जिससे मृत्यु या गंभीर चोट की आशंका हो की अवस्था में निजी सुरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित कर देने तक विस्तृत हो जाता है।( धारा 100)
उपर्युक्त अधिकार का प्रयोग तभी किया जाएगा जब कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत रक्षा के लिए लोक अधिकारियों तक पहुंचने और तुरंत सहायता लेने के लिए सक्षम नहीं हो।
अपवाद(Exception): यदि कोई अधिकार उपयुक्त में से किसी श्रेणी का नहीं हो तो निजी रक्षा के लिए अपराधी की मृत्यु नहीं की जा सकती । केवल मृत्यु के अलावा उतनी ही चोट पहुंचाई जा सकती है जितनी कि उस अपराध को रोकने के लिए आवश्यक है।
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