Borrowing power of a company( कंपनी के ऋण लेने के अधिकार)
प्रत्येक कंपनी को अपने व्यापार के लिए धन उधार लेने तथा अपनी संपत्ति को जमानत के रूप में रखने का अधिकार होता है। कंपनी अपने पार्षद सीमा नियम अथवा अंतर नियम में वर्णित नियमों के अधीन ही धन उधार लेने के अधिकार का प्रयोग कर सकती है। कंपनी के संचालक पार्षद सीमा नियम व अंतर नियम द्वारा निर्धारित सीमाओं के अंदर ही ऋण ले सकते हैं अर्थात कंपनी के पार्षद सीमा नियम एवं पार्षद अंतर नियम एक सीमा तक ऋण लेने के लिए संचालकों को अधिकार प्रदान करता है और उसमें अधिक ऋण लेने के लिए कंपनी की व्यापक सभा में सहमति लेना आवश्यक होता है।
ऋण लेने के अधिकार संबंधी प्रावधान( provision of rights of borrowing )
कंपनी के ऋण लेने के अधिकार संबंधी प्रावधान इस प्रकार हैं:
(1) व्यापारिक कंपनियों को अधिकार: प्रत्येक व्यापारिक कंपनी को ऋण प्राप्त करने का अधिकार होता है चाहे उसके सीमा नियम एवं अंतर नियमों में स्पष्ट अधिकार ना दिया गया हो। ऐसी कंपनियां अपने मूल एवं सहायक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऋण प्राप्त करने का गर्वित अधिकार रखती हैं। यदि अंतर नियमों या सीमा नियम के अंतर्गत कंपनी के संचालकों के इस अधिकार पर निषेध लगा दिया गया हो तो संचालक मंडल ऋण प्राप्त करने के अधिकार का उपयोग नहीं कर सकते हैं। किंतु अगर सीमा नियम या अंतर नियमों द्वारा निषिद्ध नहीं किया गया है तो संचालक मंडल अपने ऋण लेने के अधिकार का प्रत्यायोजन किसी एजेंडे को भी सकते हैं। यहां व्यापारिक कंपनियों से तात्पर्य उन कंपनियों से है जिनका उद्देश्य लाभ कमाना एवं सदस्यों में वितरित करना होता है।
(2) गैरव्यापारिक कंपनियों को ऋण लेने का अधिकार नहीं: गैर व्यापारिक कंपनियां वे होती है जिनका उद्देश्य धर्म कला वाणिज्य विज्ञान आदि के विकास के लिए कार्य करना तथा प्राप्त लाभों को उन्हीं उद्देश्यों के लिए खर्च करना होता है। ऐसी कंपनियां तब तक धन उधार नहीं ले सकती है जब तक कि इनके सीमा नियम तथा अंतर नियमों द्वारा इन्हें धन उधार लेने का स्पष्ट अधिकार ही ना दिया गया हो। इन कंपनियों को जिस सीमा तक ऋण लेने का अधिकार स्पष्ट रूप से प्रदान किया गया है उसी सीमा तक वह कंपनियां ऋण प्राप्त कर सकती हैं।
(3) व्यापार प्रारंभ करने का अधिकार प्राप्त होने से पूर्व ऋण नहीं: एक सार्वजनिक कंपनी व्यापार करने का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद तथा निजी कंपनी समामेलन का प्रमाण पत्र मिलने पर ही ऋण प्राप्त कर सकती है। किंतु वह अंश व ऋण पत्रों को एक साथ जनता को क्रय करने के लिए प्रस्तावित कर सकती है।
(4) पूंजी व कोषों से अधिक ऋण नहीं: एक सार्वजनिक कंपनी व्यापक सभी की सहमति के बिना अपनी प्रदत्त पूंजी व स्वतंत्र कोषों के कुल योग से अधिक ऋण नहीं ले सकती। यदि ऋण ली जाने वाली राशि और पहले से निकली हुई राशियों का जोड़ कंपनी की चुकता पूंजी और स्वतंत्र संचय के जोड से अधिक होता है तो इस आधिक्य के लिए कंपनी की साधारण सभा से स्वीकृति लेना आवश्यक है। बिना इस प्रकार की स्वीकृति के इस आधिक्य की राशि का ऋण नहीं लिया जा सकता है। साथ ही इस प्रस्ताव में उस राशि का उल्लेख अवश्य होना चाहिए जिस तक संचालक मंडल ऋण ले सकते हैं।
(5) पार्षद सीमा नियम व पार्षद अंतर नियम के अधीन ऋण: यद्यपि कंपनी को ऋण लेने का अधिकार है किंतु सीमा नियम अंतर नियम के नियमों के विरुद्ध कंपनी ऋण नहीं ले सकती है और ऐसा ऋण अधिकारों के बाहर माना जाएगा।
(6) अस्थाई ऋण ऋणों में सम्मिलित नहीं : आस्थायी या अल्पकालीन ऋण या मांग पर देय ऋण जो 6 माह की अवधि के भीतर देय हो उन्हें ऋणों में सम्मिलित नहीं किया जाता है। ऐसे ऋण बिलों को भुना कर नगद साख खाता खोलकर प्राप्त किए जा सकते हैं। ऐसे ऋणों का उपयोग कार्यशील पूंजी के लिए ही किया जाना चाहिए ना कि पूंजीगत खर्चों की पूर्ति के लिए। ऐसे ऋणों की राशि को ऋण प्राप्त करने की वैधानिक सीमा में नहीं जोड़ा जाता है।
(7) ऋण प्राप्ति के अधिकार के उपयोग का समय: कोई भी कंपनी ऋण प्राप्ति के अधिकार का उपयोग तभी कर सकती है जबकि उसे व्यवसाय प्रारंभ करने का प्रमाण पत्र प्राप्त हो गया हो। किंतु एक निजी कंपनी अपने समामेलन का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद से ही ऋण प्राप्त करने के अधिकार का उपयोग कर सकती है।
(8) प्रतिभूति या जमानत देने का अधिकार: कंपनी ऋण प्राप्त करने के लिए अपनी वर्तमान एवं भावी संपत्तियों को गिरवी या बंधक भी रख सकती है। जमानत किन-किन संपत्तियों को रखा जा सकता है यह कंपनी अंतर नियमों में उल्लेख रहता है। किंतु समानता कंपनी अपने स्वत्वाधिकारों पुस्तकीय ऋण ख्याति पेटेंट अधिकारों ट्रेडमार्क कॉपीराइट संपत्ति आदि का जमानत पर ऋण प्राप्त कर सकती है। कंपनी अपनी अयाचित पूंजी पर भी प्रभाव उत्पन्न करके ऋण प्राप्त कर सकती है।
अधिकारों से बाहर ऋण लेने का आशय( meaning of ultravires borrowing): अधिकारों के बाहर ऋणों से तात्पर्य ऐसे ऋण से है जो कंपनी के अधिकारों की सीमा के बाहर जा कर लिया गया हो। कंपनी की ऋण प्राप्ति की अधिकार सीमा कंपनी अधिनियम में निर्धारित की गई है जिसे कंपनी की साधारण सभा में प्रस्ताव पारित करके बढ़ाया जा सकता है। कंपनी के सीमा नियम एवं अंतर नियमों में व्यवस्था करके भी कंपनी की अधिकार सीमा को निर्धारित किया जा सकता है।इन सीमाओं के बाहर जा कर लिया गया ऋण अधिकारों के बाहर कहलाता है। कई बार कंपनी को तोरण प्राप्ति का अधिकार होता है किंतु उस अधिकार को संचालकों को दिया हुआ नहीं होता। ऐसी दशा में यदि संचालक अपने अधिकारों की सीमा के बाहर जाकर ऋण लेते हैं तो वह संचालकों के अधिकारों के बाहर ऋण कहलाता है। कई बार कंपनी को तो ऋण प्राप्ति का अधिकार होता है किंतु उस अधिकार को संचालकों को दिया हुआ नहीं होता है। ऐसी दशा में यदि संचालक अपने अधिकारों को सीमा के बाहर जा कर लेते हैं तो यह संचालकों के अधिकारों के बाहर ऋण कहलाता है।
अधिकार के बाहर ऋण लेने के परिणाम( results of ultravires borrowing )
(1) सीमा नियम के बाहर अनाधिकृत एवं व्यर्थ: कंपनी के सीमा नियम की सीमा के बाहर लिए गए ऋण अनाधिकृत ऋण कहलाते हैं तथा ऐसे अनुबंध व्यर्थ होते हैं। परिणाम स्वरूप ऐसे ऋण देने वाले व्यक्ति का कंपनी के विरुद्ध वैधानिक एवं न्यायिक कोई अधिकार नहीं होता है।
(2) कंपनी के विरुद्ध कोई वाद नहीं: कंपनी के अधिकारों के बाहर के ऋणों के लिए ऋण दाता कंपनी पर कोई वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता है।
(3) कंपनी द्वारा दी गई जमानत प्रभावहीन: यदि कंपनी के संचालकों ने कंपनी के सीमा नियम एवं अंतर नियमों के बाहर ऋण लिया है और उस ऋण के लिए कोई संपत्ति जमानत के रूप में रखी है तो ऋण दाता उस संपत्ति पर जमानती अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता है।
ऋण दाता को प्राप्त उपचार( remedies available to the lender)
कंपनी के अधिकारों के बाहर ऋण प्रदान करने वाले ऋण दाता को कंपनी के विरुद्ध वाद प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं होता किंतु ऋण दाता को अग्र उपचार प्राप्त हो सकते हैं
(1)निषेधाज्ञा का अधिकार : यदि कंपनी को ऋण के रूप में दी गई राशि अभी कंपनी द्वारा खर्च नहीं की गई है तो ऋण दाता इस राशि के खर्च करने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।
(2) क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार: यदि कंपनी के पार्षद सीमा नियम एवं अंतर नियम से यह स्पष्ट नहीं होता है कि संचालकों को ऋण लेने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं तो ऋण दाता संचालकों से क्षतिपूर्ति पाने का दावा कर सकता है।
(3) ऋण दाताओं का स्थान ग्रहण करना: यदि कंपनी ने किसी ऋण दाता से अधिकारों के बाहर लिए गए ऋण की रकम को अपने लेनदारों को भुगतान कर दी है तो वह ऋण दाता उस लेनदार का स्थान ग्रहण कर सकता है अर्थात उस लेनदार के सारे अधिकार प्राप्त कर लेगा।
(4) पहचान होने पर संपत्ति की प्राप्ति: ऋण दाता को यह अधिकार है कि यदि उसके द्वारा दिए गए ऋण से ली हुई कोई संपत्ति पहचानी जा सकती है तो वह कंपनी से उसे वापस ले सकता है।
(5) संचालकों के विरुद्ध कार्यवाही: अधिकारों के बाहर ऋण देने वाला ऋण दाता उस संचालकों पर दावा कर सकता है जिन्होंने अधिकारों की सीमा से बाहर ऋण लिया है।
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