Skip to main content

Supreme Court Judgments February 2026

स्त्री धन से आप क्या समझते हैं? What do you understand by streedhan?

स्त्रीधन (stridhan ) :-हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के पारित होने के पूर्व किसी स्त्री के पास दो प्रकार के संपत्ति हो सकती थी -

( 1) वह संपत्ति जिस पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता था , तथा 

( 2) ऐसी संपत्ति जिस पर सीमित स्वामित्व होता था.

प्रथम को स्त्री धन तथा दूसरे को नारी संपदा कहा जाता था.

स्त्रीधन का अर्थ: - स्त्रीधन से तात्पर्य नारी की उस संपत्ति से है जिस पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता है शब्द स्त्रीधन सर्वप्रथम स्मृतियों में पाया जाता है और गौतम के धर्मसूत्र में पाया जाता है वर्तमान हिंदू विधि में शब्द स्त्रीधन ना केवल विशिष्ट प्रकार की संपत्ति संचित करती है जो स्मृतियों में परीगणित है किंतु संपत्ति के विभिन्न प्रकारों को परिगणित करती हैं जो किसी स्त्री द्वारा अर्जित अथवा उसके स्वामित्व में हैं जिसके ऊपर उसका पूर्ण नियंत्रण है और ऐसी संपत्ति के संबंध में वह वंशजों की संपत्ति का निर्माण करती है जो तदनुसार उस के निजी उत्तराधिकारीगण पर न्याय गत होती है स्त्री धन की परिभाषा बहुत से स्मृति कारों ने दी है जिनमें से कुछ निम्नलिखित परिभाषाएं हैं -

(a) मनु के अनुसार अध्याग्नि वैवाहिक आदमी के समक्ष दिया गया अव्यवहारिक है (वधु के जाने के समय दिया गया )स्तम प्रीति कर्मणि(प्रेम में दिया गया) तथा पिता माता एवं भाई के द्वारा दिया गया 6 प्रकार का उपहार स्त्रीधन की कोटि में रखा गया है.

विष्णु के अनुसार किसी स्त्री को उसके पिता माता पुत्रों अथवा भाईयों द्वारा जो प्राप्त हुआ है जो उसे अध्याग्नि  में प्राप्त है जो वह अपने पति द्वारा पुनर्विवाह करने पर उसे प्राप्त करती है जो उसको उसके संबंधियों द्वारा दिया गया है उसके शुल्क तथा विवाह उपरांत प्राप्त उपहार स्त्रीधन कहा गया है.

याज्ञवल्क्य  कहते हैं कि किसी स्त्री को अपने माता-पिता अथवा भाई द्वारा जो प्राप्त हुआ है अथवा जो अध्याग्नि द्वारा प्राप्त होता है अथवा अधिवेदनिका में प्राप्त उपहार आदि स्त्री की संपत्ति कहलाते हैं.

      मनु की भांति कात्यायन ने भी छह प्रकार की स्त्री धन का वर्णन करते हुए उसकी परिभाषा में दो और बातों को सम्मिलित किया है -

( 1) कला से प्राप्त लाभ

( 2) कुमारी अवस्था में वधू के जाने के समय दिया गया तथा विधवा अवस्था के उपहार.

          इसके अतिरिक्त कात्यायन  ने मनु के द्वारा गिनाए गए दान एवं उपहारों को स्त्रीधन की कोटि में रखा है कात्यायन  के अनुसार पति पुत्र पिता और भाई किसी को भी स्त्री की विधि पूर्ण संपत्ति अर्थात स्त्री धन का इस्तेमाल अथवा हस्तान्तरण करने का कोई अधिकार नहीं है यदि उनमें से किसी ने उसकी संपत्ति का प्रयोग उसकी स्वीकृति के बिना किया है तो उसको संपत्ति ब्याज सहित लौटाना पड़ेगा और इस अनाधिकार प्रयोग के लिए राजा को अर्थदंड भी देना होगाजब पति किसी बीमारी से पीडित हो अथवा भीषण संकट  मे हो अथवा ऋण दाताओं द्वारा पीड़ित किया जा रहा हो तो पत्नी अपनी संम्पती स्वेच्छा से लगा दे किंतुबाद मे स्वयं लौटा दे.

            इस प्रकार स्मृतिकारों के अनुसार विवाह काल में अग्नि साक्षित्व के समय पिता आदि के द्वारा दिया गया आदि के द्वारा दिया गया धन पति के घर  पिता के घर से लाई  जाती हुई कन्या को प्रतिरक्षा पिता माता भाई और पति द्वारा उपहार मे  दिया गया धन अधिवेदानिक शुल्क  अन्वाधेय स्नेही संबंधियों द्वारा उपहार रूप में दिया गया धन  स्त्री धन होता है.

(b) भाष्य कारों के अनुसार स्त्रीधन: -  मिताक्षरा विधि के अंतर्गत निम्नलिखित स्त्री धन माना गया है -

(1) पिता (2) माता (3)पिता और (4)भाई द्वारा दिया गया धन (5)आधिवेदनिक (7) बंधकोंं द्वारा प्राप्त धन (8)शुल्क और (9)अन्वाधेय से प्राप्त धन 

इसके अलावा वह संपत्ति जो(1) दाय से (2) विक्रय से (3)विभाजन से (4)अभिग्रहण  से (5)अन्य वैद्य साधनों से प्राप्त स्त्री धन कहलाती है.

वीर मित्रोदय मिताक्षरा के मत का समर्थन करता है कि स्त्री द्वारा धारित प्रत्येक प्रकार की संपत्ति स्त्री धन है विवाद चिंतामणि के अनुसार भी मनु के 6 प्रकार के स्त्री धन के अतिरिक्त अन्य प्रकार के स्त्रीधन होते हैं.

न्यायिक निर्णय के अनुसार ठाकुरदेई बनाम राय बालक राम के वाद में पृवी काउंसिल ने यह अभि निर्धारित किया है कि किसी स्त्री द्वारा पति की संपत्ति दाय  रूप में प्राप्त करने पर वह स्त्री धन नहीं होता है भगवानदीन बनाम मैना बाई के वाद में भी अभिनिर्धारित किया गया है शिव शंकर बनाम देवी के वाद में यह अभी निर्धारित किया गया है कि पुत्री द्वारा माता से प्राप्त संपत्ति उसका स्त्रीधन नहीं होती है चाहे वह संपत्ति माता का स्त्री धन रही हो तथा ऐसी संपत्ति माता के दायदों को चली जाती है.

बलवंतराव बनाम वागीराव के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि बम्बई में मान्य नियम यह है कि जो स्त्रियां मृतक के परिवार में विवाह के द्वारा आई हैं उन्हें छोड़कर अन्य स्त्रियों को पुरुषों में प्राप्त संपत्ति स्त्रीधन होती है.

रामकुवैर बनाम वाह कुँवर के वाद में यह  अभिनिर्धारित किया गया है कि यदि हिंदू अविभाजित परिवार की कोई भी विधवा भरण-पोषण के लिए अविभाजित  परिवार की संपत्ति के किसी भाग पर 12 वर्ष से अधिक उत्तर भोगी दायदो के खिलाफ कब्जा रखती है तो वह संपत्ति उसकी स्त्री धन होती है यदि सरकार द्वारा किसी हिंदू विधवा को अनुदान में दिया गया संपत्ति स्थाई अथवा दायभाग अधिकारों के साथ प्राप्त होती है तो वह स्त्री धन होती है.

    इस प्रकार  स्मृतिकारों भाष्यकारों तथा न्यायिक निर्णयों द्वारा दी गई परिभाषाओं से यही निष्कर्ष निकलता है कि स्त्री धन स्त्री की ऐसी संपत्ति होती है जिस पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता है तथा जो उसे विवाह के समय पिता माता भाई तथा अन्य सभी संबंधियों से प्रीतवश तथा उपहार स्वरूप प्राप्त होती है यह धन वधु को पति ग्रह जाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाता है.

       स्त्री उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 14 के अनुसार अधिनियम के प्रारंभ होने के समय हिंदू स्त्री के कब्जे में आई हुई प्रत्येक संपत्ति स्त्री धन कहलाती है ।अतः प्रत्येक संपत्ति के विषय में उसको निवर्तन के पूर्ण अधिकार दिए गए हैं.

स्त्री धन के स्रोत निम्नलिखित स्रोतों से अर्जित की गई संपत्ति स्त्रीधन कहलाती है -

( 1) नातेदारों से उत्तर दान तथा उपहार में प्राप्त संपत्ति

( 2) अन्य जनों से उपहार तथा उत्तर दान में प्राप्त संपत्ति.

( 3) विभाजन के फलस्वरूप प्राप्त संपत्ति.

( 4) भरण पोषण में प्राप्त संपत्ति  

( 5) दाय में प्राप्त संपत्ति

( 6) यंत्र संबंधी कला से अर्जित संपत्ति

( 7) समझौते  में प्राप्त संपत्ति

( 8) प्रतिकूल कब्जा से प्राप्त संपत्ति

( 9) स्त्री धन से खरीदी गई अथवा स्त्रीधन की आय की बचत से अर्जित की गई संपत्ति.

( 10) उपयुक्त स्त्रोतों के अतिरिक्त अन्य स्रोतों से अर्जित संपत्ति

स्त्री धन के प्रकार एवं उसके लक्षण

निम्नलिखित विभिन्न प्रकार के स्त्रीधन हो सकते हैं -

( 1) अध्याग्नि : - विवाह के समय अग्निसाक्षित्व के समय दिए गए उपहार.

( 2) अध्य वाहिनिकी : - पिता के घर से पति के घर लाई जाती हुई कन्या को दिए गए उपहार.

( 3) पदवन्दनिका: - वधू के द्वारा बड़ों का अभिवादन करने के अवसर पर प्राप्त संपत्ति.

( 4) अन्वध्येयक: - विवाह के बाद पति के परिवार से प्राप्त उपहार.

( 5) अधिवेदानिका : - दूसरी वधू  लाने  पर प्रथम वधु को दिया गया उपहार

( 6) शुल्क: - विवाह के लिए धन

( 7) प्रीति दत्त: - सास ससुर के स्नेहवश दिये गये उपहार

( 8) पति दत्त: - पति के द्वारा दिए गए उपहार

( 9) बंधु दत्त: - पिता तथा माता के संबंधियों द्वारा दिए गए उपहार

( 10) वृत्ति: - भरण पोषण के लिए दिया गया धन या उस धन से खरीदी गई संपत्ति

( 11) सौदायिका: - विवाहिता अथवा अविवाहित कन्या पति अथवा पिता से पति या पिता के घर जो कुछ प्राप्त करती है वह सौदायिका स्त्री धन कहलाता है.

( 12) स्त्री धन की आय की बचत

( 13) क्वारेपन अथवा वैधव्यकाल में नारी द्वारा शिल्प कला अथवा शारीरिक श्रम से प्राप्त संपत्ति.

( 14) योवुक: - विवाह के समय जब वर-वधू एक स्थान पर खड़े होते हैं तो उस समय प्राप्त संपत्ति
दिया गया उपहार 
  

Comments

Popular posts from this blog

असामी कौन है ?असामी के क्या अधिकार है और दायित्व who is Asami ?discuss the right and liabilities of Assami

अधिनियम की नवीन व्यवस्था के अनुसार आसामी तीसरे प्रकार की भूधृति है। जोतदारो की यह तुच्छ किस्म है।आसामी का भूमि पर अधिकार वंशानुगत   होता है ।उसका हक ना तो स्थाई है और ना संकृम्य ।निम्नलिखित  व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आसामी हो गए (1)सीर या खुदकाश्त भूमि का गुजारेदार  (2)ठेकेदार  की निजी जोत मे सीर या खुदकाश्त  भूमि  (3) जमींदार  की बाग भूमि का गैरदखीलकार काश्तकार  (4)बाग भूमि का का शिकमी कास्तकार  (5)काशतकार भोग बंधकी  (6) पृत्येक व्यक्ति इस अधिनियम के उपबंध के अनुसार भूमिधर या सीरदार के द्वारा जोत में शामिल भूमि के ठेकेदार के रूप में ग्रहण किया जाएगा।           वास्तव में राज्य में सबसे कम भूमि आसामी जोतदार के पास है उनकी संख्या भी नगण्य है आसामी या तो वे लोग हैं जिनका दाखिला द्वारा उस भूमि पर किया गया है जिस पर असंक्रम्य अधिकार वाले भूमिधरी अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते हैं अथवा वे लोग हैं जिन्हें अधिनियम के अनुसार भूमिधर ने अपनी जोत गत भूमि लगान पर उठा दिए इस प्रकार कोई व्यक्ति या तो अक्षम भूमिधर का आसामी होता ह...

बलवा और दंगा क्या होता है? दोनों में क्या अंतर है? दोनों में सजा का क्या प्रावधान है?( what is the riot and Affray. What is the difference between boths.)

बल्बा(Riot):- भारतीय दंड संहिता की धारा 146 के अनुसार यह विधि विरुद्ध जमाव द्वारा ऐसे जमाव के समान उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए बल या हिंसा का प्रयोग किया जाता है तो ऐसे जमाव का हर सदस्य बल्बा करने के लिए दोषी होता है।बल्वे के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है:- (1) 5 या अधिक व्यक्तियों का विधि विरुद्ध जमाव निर्मित होना चाहिए  (2) वे किसी सामान्य  उद्देश्य से प्रेरित हो (3) उन्होंने आशयित सामान्य  उद्देश्य की पूर्ति हेतु कार्यवाही प्रारंभ कर दी हो (4) उस अवैध जमाव ने या उसके किसी सदस्य द्वारा बल या हिंसा का प्रयोग किया गया हो; (5) ऐसे बल या हिंसा का प्रयोग सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हो।         अतः बल्वे के लिए आवश्यक है कि जमाव को उद्देश्य विधि विरुद्ध होना चाहिए। यदि जमाव का उद्देश्य विधि विरुद्ध ना हो तो भले ही उसमें बल का प्रयोग किया गया हो वह बलवा नहीं माना जाएगा। किसी विधि विरुद्ध जमाव के सदस्य द्वारा केवल बल का प्रयोग किए जाने मात्र से जमाव के सदस्य अपराधी नहीं माने जाएंगे जब तक यह साबित ना कर दिया जाए कि बल का प्रयोग कि...

पार्षद अंतर नियम से आशय एवं परिभाषा( meaning and definition of article of association)

कंपनी के नियमन के लिए दूसरा आवश्यक दस्तावेज( document) इसके पार्षद अंतर नियम( article of association) होते हैं. कंपनी के आंतरिक प्रबंध के लिए बनाई गई नियमावली को ही अंतर नियम( articles of association) कहा जाता है. यह नियम कंपनी तथा उसके साथियों दोनों के लिए ही बंधन कारी होते हैं. कंपनी की संपूर्ण प्रबंध व्यवस्था उसके अंतर नियम के अनुसार होती है. दूसरे शब्दों में अंतर नियमों में उल्लेख रहता है कि कंपनी कौन-कौन से कार्य किस प्रकार किए जाएंगे तथा उसके विभिन्न पदाधिकारियों या प्रबंधकों के क्या अधिकार होंगे?          कंपनी अधिनियम 2013 की धारा2(5) के अनुसार पार्षद अंतर नियम( article of association) का आशय किसी कंपनी की ऐसी नियमावली से है कि पुरानी कंपनी विधियां मूल रूप से बनाई गई हो अथवा संशोधित की गई हो.              लार्ड केयन्स(Lord Cairns) के अनुसार अंतर नियम पार्षद सीमा नियम के अधीन कार्य करते हैं और वे सीमा नियम को चार्टर के रूप में स्वीकार करते हैं. वे उन नीतियों तथा स्वरूपों को स्पष्ट करते हैं जिनके अनुसार कंपनी...