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FIR होने के बाद क्या करें? आरोपी के लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया | BNSS 2023

स्त्री धन से आप क्या समझते हैं? What do you understand by streedhan?

स्त्रीधन (stridhan ) :-हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के पारित होने के पूर्व किसी स्त्री के पास दो प्रकार के संपत्ति हो सकती थी -

( 1) वह संपत्ति जिस पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता था , तथा 

( 2) ऐसी संपत्ति जिस पर सीमित स्वामित्व होता था.

प्रथम को स्त्री धन तथा दूसरे को नारी संपदा कहा जाता था.

स्त्रीधन का अर्थ: - स्त्रीधन से तात्पर्य नारी की उस संपत्ति से है जिस पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता है शब्द स्त्रीधन सर्वप्रथम स्मृतियों में पाया जाता है और गौतम के धर्मसूत्र में पाया जाता है वर्तमान हिंदू विधि में शब्द स्त्रीधन ना केवल विशिष्ट प्रकार की संपत्ति संचित करती है जो स्मृतियों में परीगणित है किंतु संपत्ति के विभिन्न प्रकारों को परिगणित करती हैं जो किसी स्त्री द्वारा अर्जित अथवा उसके स्वामित्व में हैं जिसके ऊपर उसका पूर्ण नियंत्रण है और ऐसी संपत्ति के संबंध में वह वंशजों की संपत्ति का निर्माण करती है जो तदनुसार उस के निजी उत्तराधिकारीगण पर न्याय गत होती है स्त्री धन की परिभाषा बहुत से स्मृति कारों ने दी है जिनमें से कुछ निम्नलिखित परिभाषाएं हैं -

(a) मनु के अनुसार अध्याग्नि वैवाहिक आदमी के समक्ष दिया गया अव्यवहारिक है (वधु के जाने के समय दिया गया )स्तम प्रीति कर्मणि(प्रेम में दिया गया) तथा पिता माता एवं भाई के द्वारा दिया गया 6 प्रकार का उपहार स्त्रीधन की कोटि में रखा गया है.

विष्णु के अनुसार किसी स्त्री को उसके पिता माता पुत्रों अथवा भाईयों द्वारा जो प्राप्त हुआ है जो उसे अध्याग्नि  में प्राप्त है जो वह अपने पति द्वारा पुनर्विवाह करने पर उसे प्राप्त करती है जो उसको उसके संबंधियों द्वारा दिया गया है उसके शुल्क तथा विवाह उपरांत प्राप्त उपहार स्त्रीधन कहा गया है.

याज्ञवल्क्य  कहते हैं कि किसी स्त्री को अपने माता-पिता अथवा भाई द्वारा जो प्राप्त हुआ है अथवा जो अध्याग्नि द्वारा प्राप्त होता है अथवा अधिवेदनिका में प्राप्त उपहार आदि स्त्री की संपत्ति कहलाते हैं.

      मनु की भांति कात्यायन ने भी छह प्रकार की स्त्री धन का वर्णन करते हुए उसकी परिभाषा में दो और बातों को सम्मिलित किया है -

( 1) कला से प्राप्त लाभ

( 2) कुमारी अवस्था में वधू के जाने के समय दिया गया तथा विधवा अवस्था के उपहार.

          इसके अतिरिक्त कात्यायन  ने मनु के द्वारा गिनाए गए दान एवं उपहारों को स्त्रीधन की कोटि में रखा है कात्यायन  के अनुसार पति पुत्र पिता और भाई किसी को भी स्त्री की विधि पूर्ण संपत्ति अर्थात स्त्री धन का इस्तेमाल अथवा हस्तान्तरण करने का कोई अधिकार नहीं है यदि उनमें से किसी ने उसकी संपत्ति का प्रयोग उसकी स्वीकृति के बिना किया है तो उसको संपत्ति ब्याज सहित लौटाना पड़ेगा और इस अनाधिकार प्रयोग के लिए राजा को अर्थदंड भी देना होगाजब पति किसी बीमारी से पीडित हो अथवा भीषण संकट  मे हो अथवा ऋण दाताओं द्वारा पीड़ित किया जा रहा हो तो पत्नी अपनी संम्पती स्वेच्छा से लगा दे किंतुबाद मे स्वयं लौटा दे.

            इस प्रकार स्मृतिकारों के अनुसार विवाह काल में अग्नि साक्षित्व के समय पिता आदि के द्वारा दिया गया आदि के द्वारा दिया गया धन पति के घर  पिता के घर से लाई  जाती हुई कन्या को प्रतिरक्षा पिता माता भाई और पति द्वारा उपहार मे  दिया गया धन अधिवेदानिक शुल्क  अन्वाधेय स्नेही संबंधियों द्वारा उपहार रूप में दिया गया धन  स्त्री धन होता है.

(b) भाष्य कारों के अनुसार स्त्रीधन: -  मिताक्षरा विधि के अंतर्गत निम्नलिखित स्त्री धन माना गया है -

(1) पिता (2) माता (3)पिता और (4)भाई द्वारा दिया गया धन (5)आधिवेदनिक (7) बंधकोंं द्वारा प्राप्त धन (8)शुल्क और (9)अन्वाधेय से प्राप्त धन 

इसके अलावा वह संपत्ति जो(1) दाय से (2) विक्रय से (3)विभाजन से (4)अभिग्रहण  से (5)अन्य वैद्य साधनों से प्राप्त स्त्री धन कहलाती है.

वीर मित्रोदय मिताक्षरा के मत का समर्थन करता है कि स्त्री द्वारा धारित प्रत्येक प्रकार की संपत्ति स्त्री धन है विवाद चिंतामणि के अनुसार भी मनु के 6 प्रकार के स्त्री धन के अतिरिक्त अन्य प्रकार के स्त्रीधन होते हैं.

न्यायिक निर्णय के अनुसार ठाकुरदेई बनाम राय बालक राम के वाद में पृवी काउंसिल ने यह अभि निर्धारित किया है कि किसी स्त्री द्वारा पति की संपत्ति दाय  रूप में प्राप्त करने पर वह स्त्री धन नहीं होता है भगवानदीन बनाम मैना बाई के वाद में भी अभिनिर्धारित किया गया है शिव शंकर बनाम देवी के वाद में यह अभी निर्धारित किया गया है कि पुत्री द्वारा माता से प्राप्त संपत्ति उसका स्त्रीधन नहीं होती है चाहे वह संपत्ति माता का स्त्री धन रही हो तथा ऐसी संपत्ति माता के दायदों को चली जाती है.

बलवंतराव बनाम वागीराव के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि बम्बई में मान्य नियम यह है कि जो स्त्रियां मृतक के परिवार में विवाह के द्वारा आई हैं उन्हें छोड़कर अन्य स्त्रियों को पुरुषों में प्राप्त संपत्ति स्त्रीधन होती है.

रामकुवैर बनाम वाह कुँवर के वाद में यह  अभिनिर्धारित किया गया है कि यदि हिंदू अविभाजित परिवार की कोई भी विधवा भरण-पोषण के लिए अविभाजित  परिवार की संपत्ति के किसी भाग पर 12 वर्ष से अधिक उत्तर भोगी दायदो के खिलाफ कब्जा रखती है तो वह संपत्ति उसकी स्त्री धन होती है यदि सरकार द्वारा किसी हिंदू विधवा को अनुदान में दिया गया संपत्ति स्थाई अथवा दायभाग अधिकारों के साथ प्राप्त होती है तो वह स्त्री धन होती है.

    इस प्रकार  स्मृतिकारों भाष्यकारों तथा न्यायिक निर्णयों द्वारा दी गई परिभाषाओं से यही निष्कर्ष निकलता है कि स्त्री धन स्त्री की ऐसी संपत्ति होती है जिस पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता है तथा जो उसे विवाह के समय पिता माता भाई तथा अन्य सभी संबंधियों से प्रीतवश तथा उपहार स्वरूप प्राप्त होती है यह धन वधु को पति ग्रह जाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाता है.

       स्त्री उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 14 के अनुसार अधिनियम के प्रारंभ होने के समय हिंदू स्त्री के कब्जे में आई हुई प्रत्येक संपत्ति स्त्री धन कहलाती है ।अतः प्रत्येक संपत्ति के विषय में उसको निवर्तन के पूर्ण अधिकार दिए गए हैं.

स्त्री धन के स्रोत निम्नलिखित स्रोतों से अर्जित की गई संपत्ति स्त्रीधन कहलाती है -

( 1) नातेदारों से उत्तर दान तथा उपहार में प्राप्त संपत्ति

( 2) अन्य जनों से उपहार तथा उत्तर दान में प्राप्त संपत्ति.

( 3) विभाजन के फलस्वरूप प्राप्त संपत्ति.

( 4) भरण पोषण में प्राप्त संपत्ति  

( 5) दाय में प्राप्त संपत्ति

( 6) यंत्र संबंधी कला से अर्जित संपत्ति

( 7) समझौते  में प्राप्त संपत्ति

( 8) प्रतिकूल कब्जा से प्राप्त संपत्ति

( 9) स्त्री धन से खरीदी गई अथवा स्त्रीधन की आय की बचत से अर्जित की गई संपत्ति.

( 10) उपयुक्त स्त्रोतों के अतिरिक्त अन्य स्रोतों से अर्जित संपत्ति

स्त्री धन के प्रकार एवं उसके लक्षण

निम्नलिखित विभिन्न प्रकार के स्त्रीधन हो सकते हैं -

( 1) अध्याग्नि : - विवाह के समय अग्निसाक्षित्व के समय दिए गए उपहार.

( 2) अध्य वाहिनिकी : - पिता के घर से पति के घर लाई जाती हुई कन्या को दिए गए उपहार.

( 3) पदवन्दनिका: - वधू के द्वारा बड़ों का अभिवादन करने के अवसर पर प्राप्त संपत्ति.

( 4) अन्वध्येयक: - विवाह के बाद पति के परिवार से प्राप्त उपहार.

( 5) अधिवेदानिका : - दूसरी वधू  लाने  पर प्रथम वधु को दिया गया उपहार

( 6) शुल्क: - विवाह के लिए धन

( 7) प्रीति दत्त: - सास ससुर के स्नेहवश दिये गये उपहार

( 8) पति दत्त: - पति के द्वारा दिए गए उपहार

( 9) बंधु दत्त: - पिता तथा माता के संबंधियों द्वारा दिए गए उपहार

( 10) वृत्ति: - भरण पोषण के लिए दिया गया धन या उस धन से खरीदी गई संपत्ति

( 11) सौदायिका: - विवाहिता अथवा अविवाहित कन्या पति अथवा पिता से पति या पिता के घर जो कुछ प्राप्त करती है वह सौदायिका स्त्री धन कहलाता है.

( 12) स्त्री धन की आय की बचत

( 13) क्वारेपन अथवा वैधव्यकाल में नारी द्वारा शिल्प कला अथवा शारीरिक श्रम से प्राप्त संपत्ति.

( 14) योवुक: - विवाह के समय जब वर-वधू एक स्थान पर खड़े होते हैं तो उस समय प्राप्त संपत्ति
दिया गया उपहार 
  

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