Skip to main content

Supreme Court Judgments February 2026

IPC की धारा 326 और BNS की धारा 118(2) गंभीर चोट और खतरनाक हथियार से हमले पर सजा का विवरण

IPC की धारा 326 और BNS की धारा 118(2):→

 गंभीर हमले और सजा का पूरा विश्लेषण→

भारतीय कानून में समय के साथ बदलाव किए जाते रहे हैं ताकि कानून वर्तमान समय के अनुसार प्रासंगिक बना रहे। हाल ही में, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 326, जो खतरनाक हथियारों से गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित थी, अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) में धारा 118(2) के रूप में लागू की गई है। IPC की धारा 326 और BNS की धारा 118(2) दोनों ही ऐसे अपराधों के लिए बनाई गई हैं जिनमें किसी व्यक्ति को खतरनाक हथियार या पदार्थ के उपयोग से गंभीर चोट पहुँचाई जाती है। आइए इन दोनों धाराओं को विस्तार से समझते हैं और इसे उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करते हैं।

 IPC की धारा 326 क्या थी?

IPC की धारा 326 के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति द्वारा खतरनाक हथियार या पदार्थ का प्रयोग कर दूसरे व्यक्ति को गंभीर चोट पहुँचाने पर सजा का प्रावधान था। इसमें उस स्थिति को शामिल किया गया है जहाँ चोट जानबूझकर और गंभीर रूप से दी जाती है, और इसके लिए खतरनाक हथियारों का उपयोग किया गया हो, जैसे:→
•चाकू, तलवार, बंदूक जैसे हथियार
•तेजाब, विष या अन्य खतरनाक पदार्थ

IPC की धारा 326 के अंतर्गत सजा का प्रावधान:→
• दोषी को उम्रकैद तक की सजा, 10 साल तक की जेल, जुर्माना, या दोनों हो सकते थे।
• यह धारा गैर-ज़मानती और संज्ञेय है, जिससे पुलिस को तुरंत कार्रवाई का अधिकार मिलता था।

 IPC की धारा 326 से BNS की धारा 118(2) में बदलाव:→

कानूनी प्रक्रिया को सरल और सशक्त बनाने के लिए अब IPC की धारा 326 को BNS की धारा 118(2) में समाहित किया गया है। BNS की धारा 118(2) भी उन मामलों को कवर करती है जहाँ जानबूझकर खतरनाक हथियार या पदार्थ से किसी को गंभीर चोट पहुँचाई गई हो। 

 BNS की धारा 118(2) के तहत सजा:→
• दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को उम्रकैद तक की सजा, 10 साल तक की जेल, जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है।
•यह धारा भी गैर-ज़मानती और संज्ञेय है, जिससे पुलिस आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर सकती है।

 IPC की धारा 326 और BNS की धारा 118(2) के अंतर्गत गंभीर चोट की परिभाषा:→

इन धाराओं के अंतर्गत "गंभीर चोट" का अर्थ है किसी व्यक्ति को ऐसा नुकसान पहुँचाना जिससे उसे शारीरिक और मानसिक रूप से दीर्घकालिक असर हो। इसमें अस्थाई या स्थाई रूप से अंग-भंग करना, किसी अंग का काम न करना, या चेहरे पर ऐसा निशान छोड़ना शामिल है, जो व्यक्ति को लंबे समय तक प्रभावित करे।

 उदाहरणों से समझें:→

1. उदाहरण 1: तेजाब से हमला→
   मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने निजी दुश्मनी के चलते दूसरे व्यक्ति पर तेजाब फेंक दिया, जिससे उसका चेहरा और शरीर बुरी तरह जल गया। यह हमला जानबूझकर और खतरनाक पदार्थ (तेजाब) का उपयोग करके किया गया है, इसलिए यह BNS की धारा 118(2) के तहत आता है। इस मामले में दोषी को उम्रकैद, दस साल तक की जेल, और जुर्माने की सजा मिल सकती है।

2. उदाहरण 2: तलवार से हमला करना→
   एक व्यक्ति ने गुस्से में आकर दूसरे व्यक्ति पर तलवार से हमला किया, जिससे उसकी एक हाथ की हड्डी टूट गई और उसे कई महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। तलवार का प्रयोग एक खतरनाक हथियार के रूप में किया गया था, और इस हमले में गंभीर चोट दी गई थी। ऐसे में आरोपी पर BNS की धारा 118(2) के तहत मामला दर्ज किया जाएगा और दोषी पाए जाने पर उसे सजा का प्रावधान है।

3. उदाहरण 3: बंदूक से गोली मारना→
   किसी ने पारिवारिक विवाद के कारण दूसरे व्यक्ति पर गोली चला दी, जिससे उसे गंभीर चोट लगी और उसका एक अंग हमेशा के लिए कमजोर हो गया। गोलीबारी के मामले में यह गंभीर चोट का मामला है और इसमें BNS की धारा 118(2) का प्रावधान है। दोषी पाए जाने पर सख्त सजा दी जा सकती है।

4. उदाहरण 4: विष देकर हमला करना→
   मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने दूसरे को विष देकर मारने की कोशिश की, लेकिन पीड़ित व्यक्ति को समय पर अस्पताल ले जाया गया और उसकी जान बच गई। इस मामले में भी विष एक खतरनाक पदार्थ है, और इसे BNS की धारा 118(2) के अंतर्गत दर्ज किया जाएगा, क्योंकि जानबूझकर गंभीर चोट पहुँचाने का प्रयास किया गया है। 

5. उदाहरण 5: लोहे की रॉड से सिर पर हमला:→
   झगड़े के दौरान एक व्यक्ति ने लोहे की रॉड से दूसरे व्यक्ति के सिर पर हमला किया, जिससे उसे गहरी चोट आई और वह कुछ समय के लिए अचेत हो गया। इस स्थिति में लोहे की रॉड का उपयोग खतरनाक हथियार के रूप में किया गया था और इस मामले में भी BNS की धारा 118(2) लागू होगी।

 निष्कर्ष:→

BNS की धारा 118(2) और IPC की धारा 326 के अंतर्गत उन्हीं अपराधों को लाया गया है जिनमें खतरनाक हथियारों या पदार्थों के माध्यम से किसी व्यक्ति को गंभीर चोट पहुँचाई गई हो। IPC की धारा 326 में जो प्रावधान थे, वे ही लगभग BNS की धारा 118(2) में भी बनाए गए हैं, ताकि दोषियों को कड़ी सजा दी जा सके और समाज में कानून का भय बना रहे। 

इन धाराओं के अंतर्गत अपराधी को सख्त सजा का प्रावधान है, जो समाज में यह संदेश देता है कि किसी भी प्रकार का हिंसक हमला या जानलेवा हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

Comments

Popular posts from this blog

असामी कौन है ?असामी के क्या अधिकार है और दायित्व who is Asami ?discuss the right and liabilities of Assami

अधिनियम की नवीन व्यवस्था के अनुसार आसामी तीसरे प्रकार की भूधृति है। जोतदारो की यह तुच्छ किस्म है।आसामी का भूमि पर अधिकार वंशानुगत   होता है ।उसका हक ना तो स्थाई है और ना संकृम्य ।निम्नलिखित  व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आसामी हो गए (1)सीर या खुदकाश्त भूमि का गुजारेदार  (2)ठेकेदार  की निजी जोत मे सीर या खुदकाश्त  भूमि  (3) जमींदार  की बाग भूमि का गैरदखीलकार काश्तकार  (4)बाग भूमि का का शिकमी कास्तकार  (5)काशतकार भोग बंधकी  (6) पृत्येक व्यक्ति इस अधिनियम के उपबंध के अनुसार भूमिधर या सीरदार के द्वारा जोत में शामिल भूमि के ठेकेदार के रूप में ग्रहण किया जाएगा।           वास्तव में राज्य में सबसे कम भूमि आसामी जोतदार के पास है उनकी संख्या भी नगण्य है आसामी या तो वे लोग हैं जिनका दाखिला द्वारा उस भूमि पर किया गया है जिस पर असंक्रम्य अधिकार वाले भूमिधरी अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते हैं अथवा वे लोग हैं जिन्हें अधिनियम के अनुसार भूमिधर ने अपनी जोत गत भूमि लगान पर उठा दिए इस प्रकार कोई व्यक्ति या तो अक्षम भूमिधर का आसामी होता ह...

बलवा और दंगा क्या होता है? दोनों में क्या अंतर है? दोनों में सजा का क्या प्रावधान है?( what is the riot and Affray. What is the difference between boths.)

बल्बा(Riot):- भारतीय दंड संहिता की धारा 146 के अनुसार यह विधि विरुद्ध जमाव द्वारा ऐसे जमाव के समान उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए बल या हिंसा का प्रयोग किया जाता है तो ऐसे जमाव का हर सदस्य बल्बा करने के लिए दोषी होता है।बल्वे के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है:- (1) 5 या अधिक व्यक्तियों का विधि विरुद्ध जमाव निर्मित होना चाहिए  (2) वे किसी सामान्य  उद्देश्य से प्रेरित हो (3) उन्होंने आशयित सामान्य  उद्देश्य की पूर्ति हेतु कार्यवाही प्रारंभ कर दी हो (4) उस अवैध जमाव ने या उसके किसी सदस्य द्वारा बल या हिंसा का प्रयोग किया गया हो; (5) ऐसे बल या हिंसा का प्रयोग सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हो।         अतः बल्वे के लिए आवश्यक है कि जमाव को उद्देश्य विधि विरुद्ध होना चाहिए। यदि जमाव का उद्देश्य विधि विरुद्ध ना हो तो भले ही उसमें बल का प्रयोग किया गया हो वह बलवा नहीं माना जाएगा। किसी विधि विरुद्ध जमाव के सदस्य द्वारा केवल बल का प्रयोग किए जाने मात्र से जमाव के सदस्य अपराधी नहीं माने जाएंगे जब तक यह साबित ना कर दिया जाए कि बल का प्रयोग कि...

पार्षद अंतर नियम से आशय एवं परिभाषा( meaning and definition of article of association)

कंपनी के नियमन के लिए दूसरा आवश्यक दस्तावेज( document) इसके पार्षद अंतर नियम( article of association) होते हैं. कंपनी के आंतरिक प्रबंध के लिए बनाई गई नियमावली को ही अंतर नियम( articles of association) कहा जाता है. यह नियम कंपनी तथा उसके साथियों दोनों के लिए ही बंधन कारी होते हैं. कंपनी की संपूर्ण प्रबंध व्यवस्था उसके अंतर नियम के अनुसार होती है. दूसरे शब्दों में अंतर नियमों में उल्लेख रहता है कि कंपनी कौन-कौन से कार्य किस प्रकार किए जाएंगे तथा उसके विभिन्न पदाधिकारियों या प्रबंधकों के क्या अधिकार होंगे?          कंपनी अधिनियम 2013 की धारा2(5) के अनुसार पार्षद अंतर नियम( article of association) का आशय किसी कंपनी की ऐसी नियमावली से है कि पुरानी कंपनी विधियां मूल रूप से बनाई गई हो अथवा संशोधित की गई हो.              लार्ड केयन्स(Lord Cairns) के अनुसार अंतर नियम पार्षद सीमा नियम के अधीन कार्य करते हैं और वे सीमा नियम को चार्टर के रूप में स्वीकार करते हैं. वे उन नीतियों तथा स्वरूपों को स्पष्ट करते हैं जिनके अनुसार कंपनी...