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Supreme Court Judgments February 2026

IPC की धारा 325 और BNS की धारा 117(2) गंभीर चोट से जुड़े अपराध और सजा का पूरा विवरण

IPC की धारा 325 और BNS की धारा 117(2):→

 नए कानून के तहत गंभीर चोट से जुड़े अपराध और सजा का विस्तृत विवरण→

भारतीय कानून में समय के साथ किए गए बदलावों के अंतर्गत अब भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code या IPC) की धारा 325 को भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita या BNS) में धारा 117(2) के रूप में शामिल कर दिया गया है। IPC की धारा 325 जहां गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित थी, वहीं BNS की धारा 117(2) भी इसी उद्देश्य से बनाई गई है। इस ब्लॉग में हम IPC की धारा 325 और BNS की धारा 117(2) दोनों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे और इसे उदाहरणों के साथ समझेंगे।

 IPC की धारा 325 क्या थी?

IPC की धारा 325 के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर गंभीर चोट पहुँचाने पर सजा का प्रावधान था। गंभीर चोटों में वे चोटें आती हैं जो अस्थायी या स्थायी रूप से व्यक्ति के शरीर को नुकसान पहुँचाती हैं और उसे कार्य करने में अक्षम बना सकती हैं। इस धारा में चोट का कारण चाहे हथियार हो या न हो, अपराधी को सजा दी जा सकती थी। 

IPC की धारा 325 के अंतर्गत सजा का प्रावधान:→

• दोषी व्यक्ति को सात साल तक की जेल की सजा, जुर्माना, या दोनों का प्रावधान था।
•यह धारा गैर-संज्ञेय और जमानती थी, अर्थात पुलिस इस मामले में वारंट के साथ ही गिरफ्तारी कर सकती थी, और जमानत कोर्ट से ली जा सकती थी।

IPC की धारा 325 का BNS की धारा 117(2) में परिवर्तन:→

भारतीय न्याय संहिता (BNS) का उद्देश्य कानून को सरल और प्रभावशाली बनाना है। इसी क्रम में IPC की धारा 325 को BNS की धारा 117(2) के रूप में पुनर्गठित किया गया है। BNS की धारा 117(2) भी गंभीर चोट पहुँचाने के मामलों को ही कवर करती है। हालांकि, नए कानून में प्रक्रियाओं को और स्पष्ट किया गया है ताकि कानून व्यवस्था को मजबूत बनाया जा सके। 

BNS की धारा 117(2) में गंभीर चोट पहुँचाने के मामले में सजा और प्रावधानों को पहले की तरह ही रखा गया है, जिससे अपराधी को सख्त सजा दी जा सके और समाज में न्याय की भावना बनी रहे। 

BNS की धारा 117(2) के तहत सजा:→

•दोषी को सात साल तक की जेल की सजा, जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है।
• यह धारा गैर-संज्ञेय और जमानती है, जिससे पुलिस कार्रवाई के लिए वारंट की आवश्यकता होती है।

 IPC की धारा 325 और BNS की धारा 117(2) के अंतर्गत गंभीर चोट की परिभाषा:→

गंभीर चोटें वे होती हैं जिनसे व्यक्ति को भारी शारीरिक और मानसिक पीड़ा हो सकती है। इसमें हड्डी टूटना, गंभीर रक्तस्त्राव, अंगों का काम करना बंद हो जाना, या ऐसी चोटें शामिल हैं जो लंबे समय तक ठीक नहीं होतीं। 

उदाहरणों से समझें →

1. उदाहरण 1: हड्डी का टूटना→
   मान लीजिए कि विजय और मोहन के बीच लड़ाई हो गई, और इस झगड़े में विजय ने मोहन को इतनी जोर से मारा कि उसकी एक हड्डी टूट गई। यह गंभीर चोट की श्रेणी में आता है, और इस मामले में BNS की धारा 117(2) के तहत विजय पर मामला दर्ज हो सकता है। दोषी पाए जाने पर उसे सात साल तक की सजा हो सकती है।

2. उदाहरण 2: गंभीर चोट से अंग का नुकसान→
   मान लीजिए कि किसी ने दूसरे व्यक्ति के हाथ या पैर को इतना ज़ोर से चोट पहुंचाई कि उसका अंग स्थायी रूप से कमजोर हो गया। इस स्थिति में भी आरोपी पर BNS की धारा 117(2) के तहत मामला दर्ज हो सकता है, और उसे सजा का प्रावधान है।

3. उदाहरण 3: चेहरे पर गंभीर चोट पहुंचाना→
   मान लें कि किसी ने गुस्से में दूसरे व्यक्ति के चेहरे पर मुक्का मारा, जिससे उसे गंभीर चोट आई और चेहरा काफी समय तक सूजा रहा। यदि यह चोट व्यक्ति को कार्य करने में असमर्थ बनाती है, तो इसे भी BNS की धारा 117(2) के अंतर्गत रखा जा सकता है। 

निष्कर्ष→

IPC की धारा 325 और BNS की धारा 117(2) दोनों ही भारतीय कानून के महत्वपूर्ण अंग हैं जो गंभीर चोटों से जुड़े मामलों में पीड़ित को न्याय दिलाने का कार्य करते हैं। IPC की धारा 325 में जहाँ दोषी को सात साल तक की सजा का प्रावधान था, वहीं BNS की धारा 117(2) में भी इसे बनाए रखा गया है। 

इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को सशक्त बनाना और कानून को सरल बनाना है ताकि पीड़ित को त्वरित न्याय मिल सके।


बिल्कुल, आइए कुछ और उदाहरणों के माध्यम से IPC की धारा 325 और BNS की धारा 117(2) को समझते हैं ताकि ये पूरी तरह स्पष्ट हो सके कि किन परिस्थितियों में इस धारा का उपयोग होता है और इसके दायरे में कौन-कौन से अपराध आते हैं।

 उदाहरण 4: स्कूल की लड़ाई में गंभीर चोट लगना→

माना कि दो छात्र राज और सुरेश के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया। इस दौरान गुस्से में आकर राज ने सुरेश को धक्का दिया और सुरेश का सिर ज़मीन पर ज़ोर से टकरा गया, जिससे उसे गंभीर सिर की चोट लगी और कुछ समय तक वह स्कूल जाने में असमर्थ हो गया। इस स्थिति में, राज पर BNS की धारा 117(2) के तहत मामला दर्ज हो सकता है, क्योंकि सुरेश को जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाई गई।

उदाहरण 5: सड़क दुर्घटना में मारपीट और हड्डी का टूटना→

मान लीजिए, एक सड़क दुर्घटना में दो लोग भिड़ जाते हैं। उनमें से एक व्यक्ति दूसरे पर गुस्से में आकर हमला करता है और उसकी टांग पर इतनी ज़ोर से मारता है कि उसकी टांग टूट जाती है। इस स्थिति में, आरोपी पर BNS की धारा 117(2) के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है क्योंकि उसने जानबूझकर दूसरे व्यक्ति को गंभीर चोट पहुंचाई है। दोष सिद्ध होने पर उसे सात साल तक की जेल या जुर्माना हो सकता है।

 उदाहरण 6: घरेलू हिंसा का मामला→

माना कि किसी व्यक्ति ने गुस्से में आकर अपने परिवार के किसी सदस्य (जैसे पत्नी या भाई) पर हमला किया और उसकी एक हड्डी तोड़ दी या उसे ऐसा चोट पहुंचाई कि उसे कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। यह भी BNS की धारा 117(2) के तहत आता है। गंभीर चोट पहुंचाने के कारण यह व्यक्ति दोषी साबित होने पर जेल और जुर्माने की सजा का हकदार होगा।

 उदाहरण 7: पड़ोसी विवाद में गंभीर मारपीट→

माना कि दो पड़ोसियों के बीच किसी ज़मीन को लेकर झगड़ा हो गया। इस झगड़े में एक पड़ोसी ने दूसरे पर डंडे से हमला किया और उसके हाथ की हड्डी तोड़ दी। इस मामले में यह गंभीर चोट की श्रेणी में आएगा, और हमला करने वाले व्यक्ति पर BNS की धारा 117(2) के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर उसे सजा का प्रावधान होगा।

 उदाहरण 8: सार्वजनिक स्थल पर हिंसा में गंभीर चोट पहुँचाना→

माना कि किसी पार्क में दो लोगों के बीच गुस्से में विवाद बढ़ गया, और उनमें से एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को लात मारी, जिससे उसकी पसली की हड्डी टूट गई। इस स्थिति में, यह गंभीर चोट का मामला होगा और आरोपी पर BNS की धारा 117(2) के तहत मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। यह हमला जानबूझकर किया गया था और इसके कारण दूसरे व्यक्ति को गंभीर चोट पहुंची है, इसलिए यह धारा लागू होगी।

उदाहरण 9: दुकान या व्यवसाय में मारपीट→

माना कि एक ग्राहक और दुकानदार के बीच विवाद हो गया और गुस्से में दुकानदार ने ग्राहक के ऊपर कोई भारी वस्तु फेंक दी, जिससे ग्राहक के सिर में गहरी चोट लग गई और उसे कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इस घटना में दुकानदार पर भी BNS की धारा 117(2) के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है, क्योंकि इस घटना में गंभीर चोट पहुँचाई गई है। 

उदाहरण 10: खेलकूद के दौरान जानबूझकर चोट पहुँचाना→

माना कि एक फुटबॉल मैच में दो खिलाड़ी आपस में भिड़ जाते हैं। इनमें से एक खिलाड़ी जानबूझकर दूसरे खिलाड़ी के पैर पर हमला करता है, जिससे उसका पैर टूट जाता है। यह मामला भी गंभीर चोट का है, और इस स्थिति में हमला करने वाले खिलाड़ी पर BNS की धारा 117(2) लागू की जा सकती है।

निष्कर्ष:→

इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि BNS की धारा 117(2) किसी भी ऐसी स्थिति में लागू होती है जहाँ जानबूझकर किसी व्यक्ति को गंभीर चोट पहुँचाई गई हो। चोट गंभीर तब मानी जाती है जब वह व्यक्ति को अस्थायी या स्थायी रूप से शारीरिक रूप से असमर्थ बनाती है, जैसे हड्डी टूटना, गंभीर रक्तस्त्राव, या अंग के काम करने की क्षमता में कमी आना। 

BNS की धारा 117(2) का मुख्य उद्देश्य समाज में ऐसे अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करना है ताकि दोषियों को सजा मिल सके और अन्य लोगों को चेतावनी मिले कि इस प्रकार की हिंसा या हमला दंडनीय है।

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