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भारतीय संविधान में स्त्रियों के मूल कर्तव्य में क्या प्रावधान किये गये हैं?What provisions have been made regarding the fundamental duties of women in the Indian Constitution?

भारतीय संविधान के  भाग 4A में मौलिक कर्तव्यों को शामिल किया गया है। जो न केवल नागरिकों के अधिकारों को परिभाषित करते हैं, बल्कि समाज के प्रति उनके नैतिक दायित्वों को भी रेखांकित करते हैं। इन कर्तव्यों में से एक है स्त्रियों के प्रति सम्मान और गरिमा का भाव रखना।

      संविधान का अनुच्छेद 51 -क [30] यह व्यवस्था करता है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह भारत के लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण कर जो धर्म भाषण और प्रदेश या वर्ग पर आधारित भेदभाव मिटाती हैं, ऐसी प्रथा का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो।

       मौलिक कर्तव्य 5( e) में कहा गया है कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह स्त्रियों के प्रति अपमानजनक रीति - रिवाजों का त्याग करे। यह कर्तव्य निम्नलिखित बिन्दुओं पर प्रकाश डालता है- 


समानता का सम्मानः स्त्रियों की पुरुषों के समान अधिकार और अवसर प्राप्त होने चाहिये। उन्हें शिक्षा, रोजगार स्वास्थ्य सेवा और 'राजनीतिक भागीदारी में समानता को अधिकार है।

 • गरिमा का सम्मान: स्त्रियों को सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। किसी भी प्रकार की हिंसा उत्पीड़न या भेदभाव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। 

सामाजिक बुराइयों का त्याग : दहेज प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा, और अन्य सामाजिक कुरीतियों को त्यागना नागरिकों का कर्तव्य है। 

सकारात्मक दृष्टिकोण: स्त्रियों को सशक्त बनाने और उन्हें, समाज में समान स्थान दिलाने के लिये सकारात्मक सोच और दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

 • जागरुकता फैलाना : नागरिकों को शिक्षा और जागरुकता अभियानों के माध्यम से स्त्रियों के अधिकारों और उनके प्रति सम्मान के महत्व के बारे में लोगों को शिक्षित करना चाहिये। 

    इस प्रकार संविधान की उपरोक्त व्यवस्था से यह, सुस्पष्ट है कि स्त्रियों के सम्मान की रक्षा करना तथा स्त्रियों के सम्मान में विरुद्ध प्रचलित प्रथाओं को दूर करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। हमारे देश की स्त्रियाँ कई प्रकार की कुरीतियों का शिकार हैं जैसे राजस्थान में प्रचलित सती प्रथा। इस प्रथा के विरुद्ध राजस्थान में निम्न अधिनियम पारित किया गया है।


 राजस्थान सती [ निवारक 7 अधिनियम, 1987


 एक वाद [ओंकार सिंह बनाम स्टेट ऑफ - राजस्थान [1987]2 आर० एल०आर० 957) में इस अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी। न्यायालय के इस अधिनियम की संवैधानिकता पर विचार करते हुए इसे संवैधानिक घोषित किया। 


      ... इसके अलावा निम्न प्रथायें समाज में अपनी गहरी जड़े जमाये हुये हैं। जैसे दहेज प्रथा तथा बाल-विवाह प्रथा । भारतीय संसद ने इन कुरीतियों को दूर करने के लिये अनेक अधिनियम पारित किये हैं। आज भी हमारी सरकार इन कुरीतियों को दूर करने का प्रयास कर रही है।

 यह मौलिक कर्तव्य महत्वपूर्ण है। क्योंकि :- 

• यह स्त्रियों के प्रतिः सम्मान और गरिमा की 
भावना को बढ़ावा देता है। 

• यह लैंगिक समानता और न्याय को बढ़ावा देता है।

यह एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में योगदान देता है। 

• यह स्त्रियों को सशक्त बनाता है और उन्हें अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने में मदद करता है।

       स्त्रियों के प्रति मौलिक कर्तव्य केवल कानूनी बाध्यता नहीं है। बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। यह समाज के सभी सदस्यों का दायित्व है कि वे स्त्रियों के प्रति सम्मान और गरिमा का भाव रखें और उन्हें समान अधिकार और अवसर प्रदान करें। तभी हम एक सच्चा और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण कर सकते हैं। 


यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 

• मौलिक कर्तव्य न्यायसंगत हैं और उनका पालन सभी नागरिकों को करना चाहिये, चाहे उनकी जाति, धर्म, लिंग या सामाजिक स्थितिः कुछ भी हो। 

• मौलिक कर्तव्यों का उल्लंघन करने पर कोई कानूनी दंड नहीं है, लेकिन यह नैतिक रूप से गलत है और समाज द्वारा निंदनीय है। 

• मौलिक कर्तव्य नागरिकों को एक बेहतर समाज बनाने के लिये प्रेरित करते हैं। 


कामकाजी महिलाओं का यौन शोषण:

 कामकाजी महिलाओं के बढ़ते हुये यौन उत्पीडन को उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लघंन माना गया है। उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर इस सन्दर्भ पर दिशा-निर्देश प्रस्तुत किया है। 


[1] सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में यौन उत्पीड़न पर रोक लगाने के लिये समुचित
नियम बनाये जाये और यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्तियों  को दण्डित किया जाये। 


2] निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों पर लागू स्थायी आदेशों में उक्त व्यवस्ता को शामिल किया जागे ।

 [3] कामकाजी महिला के साथ यौन उत्पीडन की शिकायत मिलने पर नियोजक की ओर से समुचित कार्यवाही हेतु त्वरित प्रयास किया जाये। 


[4] यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को स्थानान्तरण का विकल्प दिया जाय और आवश्यक होने पर यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्ति के स्थानान्तरण की भी व्यवस्था की जाये। इन कामकाजी महिलाओं के मनोबल कार्य रखने के लिये तथा इसकी गरिमा बनाये रखने के लिये उच्चतम न्यायालय ने प्रभावी कदम उठायें हैं। 


स्त्रियों के प्रति मौलिक कर्तव्य में सरकार की भूमिका: 

मौलिक कर्तव्य 5(e] में स्त्रियों के प्रति सम्मान और गरिमा का भाव रखने का दायित्व न केवल नागरिकों पर बल्कि सरकार पर ही उतना' ही महत्वपूर्ण है। सरकार इस कर्तव्य की निम्नलिखित तरीकों से पूरा कर सकती है। 

[1] कानूनों और नीतियों का निर्माण : 

• सरकार को लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने के लिये मजबूत कानूनों और नीतियों का निर्माण करना चाहिये। 

• इन कानूनों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, घरेलू हिंसा, बाल विवाह, दहेज प्रथा, और लैंगिक उत्पीड़न जैसी सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिये कडे प्रावधान शामिल होने चाहिये ।


• महिलाओं के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार, और राजनीतिक भागीदारी में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिये नीतियां बनाई जानी चाहिये।

 [2] जागरुकता अभियान:

 • सरकार को महिलाओं के अधिकारों और उनके प्रति सम्मान के महत्व के बारे में लोगों को शिक्षित करने के लिये जागरुकता अभियान चलाने चाहिये।


 • उन अभियानों में विभिन्न माध्यमों जैसे कि टेलीविजन रेडियो, सोशल मीडिया, और स्कूलों और कॉलेजों में कार्यक्रमों का उपयोग किया जा सकता है। 

लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण पर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दिवसों का आयोजन करके भी जागरुकता बढ़ाई जा सकती है। 


[3] बुनियादी ढांचे का विकास : 


• सरकार को महिलाओं के लिये आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास करना चाहिये। जैसे कि महिला पुलिस स्टेशनः, महिला आश्रय स्थल और महिलाओं के लिये कौशल विकास केंन्द्र । 

• यह महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने उन्हें सशक्त बनाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगा ।

 [4] कानूनों का कार्यान्वयन : 

• सरकार को महिलाओं के अधिकारों से संबन्धित कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिये ।

 • इसमें महिलाओं के खिलाफ अपराधों की त्वरित जांच और मुकदमा चलाना और पीडितों को सहायता और पुनर्वास प्रदान करना शामिल है।


. महिलाओं को कानूनी सहायता और न्याय तक पहुच प्रदान करना भी महत्वपूर्ण है। 

[5] महिलाओं की भागीदारी: 

• सरकार को नीति निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिये। 

• महिलाओं को विभिन्न सरकारी निकायों और समितियों में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिये। 

• यह महिलाओं के मुद्दों को बेहतर ढंग से समझने और उनका समाधान करने में मदद करेगा। 


निष्कर्ष : सरकार स्त्रियों के प्रति मौलिक कर्तव्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। मजबूत कानूनों और नीतियों जागरुकता अभियानों, बुनियादी ढांचे के' विकास कानूनों के कार्यान्वयन और महिलाओं की भागीदारी को बढावा देकर, सरकार लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों को बढावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। 


      यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि स्त्रियों के प्रति सम्मान और गरिमा का भाव केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के सभी सदस्यों का दायित्व है।

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