Skip to main content

कानूनी मामलों में चिकित्सा साक्ष्य की क्या भूमिका होती है?What role does medical evidence play in legal cases?

अग्रिम जमानत याचिका का क्या अर्थ होता है ? What is the meaning of anticipatory bail petition?

जब कोई व्यक्ति किसी अपराध में गिरफ्तार होने वाला हो या उसे इस बात का डर हो की उसे किसी ऐसे केस में फसा कर जेल में बंद किया जा सकता है जो कि उसने किया ही नहीं है तो ऐसे में जेल जाने से बचने के लिये वह न्यायालय से गिरफ्तार होने से पहले ही अग्रिम जमानत के लिये आवेदन कर सकता है। जब न्यायालय उस आवेदन को स्वीकृति दे देती है तो न्यायालय के आदेशानुसार पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती है। न्यायालय द्वारा जमानत का ये आदेश अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल] कहलाता है। ये अग्रिम जमानत दो प्रकार से की जा सकती है।

 [1] FIR होने से पहले.

 [2] FIR होने के बाद


 [1] FIR होने से पहले: यदि दो लोगों की आपस में अनबन है और उनमें से एक को ऐसा लगता है कि दूसरा उस पर कोई झूठा केस बनवा कर गिरफ्तार करा सकता है और यदि पहले को कही से ये पता चलता है कि दूसरा ऐसा कुछ करने का प्लान बना रहा है या फिर ऐसे हालत हो गये है कि उसके खिलाफ कभी भी FIR हो सकती है तो पहला व्यक्ति - न्यायालय में अपनी अग्रिम जमानत [ एंटीसिपेटरी बेल] के लिये आवेदन कर सकता है। इसमें न्यायालय पुलिस को यह आदेश देती है कि अगर कोई FIR उस व्यक्ति आवेदनकर्ता के खिलाफ की जाती है तो FIR करने के बाद पुलिस उसको गिरफ्तार करने से सात दिन [ या जितने दिन कोर्ट चाहे ] पहले सूचित करेगी और FIR की काँपी देगी ताकि वह व्यक्ति अपनी बेल  जमानत का इंतजाम कर ले।


 [2] FIR होने के बाद अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR हो गयी है। या फिर पुलिस की किसी केस की जाँच में उस व्यक्ति का नाम भी आरोपियों की लिस्ट में आ रहा है। तो ऐसे हालातों में वह व्यक्ति भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 438 के अंतर्गत अग्रिम जमानत [ एंटीसिपेटरी बेल] का आवेदन कर सकता है, लेकिन इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि वह व्यक्ति गिरफ्तार नहीं होना चाहिये एक बार व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो इस मामले में नियमित रुप से जमानत या अंतरिम जमानत किये के लिये आवेदन करना अनिवार्य है।


     Note- अग्रिम जमानत दाखिल करने पर विपक्षी पार्टी को जमानत के आवेदन के बारे में अधिसूचित किया जाता है और वह विपक्षी न्यायालय में जमानत आवेदन के खिलाफ लड़ सकता है। सार्वजनिक अभियोजक भी ऐसा करने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। 


अग्रिम जमानत के उ‌द्देश्य :- सविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सभी भारतीय नागरिकों को जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता एक महत्वपूर्ण अधिकार है। और इसे एक बहुमूल्य अधिकार माना जाता है इसी बात को ध्यान में रखते हुये भारतीय आपराधिक कानून के तहत, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत का प्रावधान है। 


  सामान्यतः अग्रिम जमानत का सहारा लेकर किसी निर्दोष व्यक्ति को किसी झूटे केस, आर्थिक हानि और बदनामी से बचाने के लिये ही है। लेकिन उसके लिये न्यायालय को यह लगना चाहिये कि यह व्यक्ति निर्दोष हो सकता है या पुलिस कि खोजबीन नियमित ढंग से नहीं हो पा रही है। तो न्यायालय  अपने विवेक से उस व्यक्ति को अग्रिम जमानत दे सकती है। अग्रिम जमानत केवल और केवल सेशन कोर्ट से ही ली जा सकती है। या फिर कुछ विशेष परिस्थितियों में अनुच्छेद 226 में हाई कोर्ट से रिट की मदद से भी ली जा सकती है। 


   भारत के विधि आयोग ने 24 सितम्बर 1969 की अपनी 41वीं रिपोर्ट में आपराधिक प्रक्रिया संहिता में एक प्रावधान जोडने के लिये उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय को अग्रिम जमानत देने की आवश्यकता बताई। यह प्रावधान किसी व्यक्ति की गैर-जमानती अपराध करने के आरोप में गिरफ्तारी होने से पहले ही जमानत लेने की अनुमति देता है। इस प्रावधान को सम्मिलित करने का मूल उद्‌देश्य यह था कि किसी भी व्यक्ति को तब तक किसी भी तरह से सीमित नहीं किया जाना चाहिये जब तक कि उसे न्यायालय द्वारा दोषी न ठहराया जाये। 


अग्रिम जमानत लेने की प्रक्रिया:-

अग्रिम जमानत के लिये आवेदन करने के लिये निम्न बिन्दुओं का पालन करना होता है:- 

• गिरफ्तारी का डर होने वाले व्यक्ति को किसी अच्छे वकील की मदद लेनी चाहिये और उसे उन सभी हालतों की जानकारी देनी चाहिये, जिनकी वजह से वह गिरफ्तार होने की उम्मीद कर रहा है।


 * वकील कुछ महत्वपूर्ण दस्तावजों की सहायता से न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करेगा, जिस अपराध के लिये वह गिरफ्तार होने की उम्मीद कर रहा है उसकी प्रकृति के आधार पर सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की याचिका का आवेदन किया जा सकता है। 

अभियुक्त द्वारा वकील द्वारा तैयार की गई अग्रिम जमानत याचिका को भली-भांति पढ़ना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि याचिका के सभी बिन्दु सही है या नहीं और पढ़ने के बाद सभी संबन्धित हलफनामों और वकालतनामा पर हस्ताक्षर करने चाहिये।

 • सुनवाई के पहले दिन यदि न्यायालय अग्रिम जमानत की याचिका से संतुष्ट है तो मामले के दूसरे पक्ष को नोटिस जारी किया जायेगा और अगली सुनवाई के लिये तारीख दी जायेगी। न्यायालय  मामले के जांच अधिकारी से सुनवाई की अगली तारीख से पहले रिपोर्ट जमा करने के लिये भी कहेगा।


 • पहली सुनवाई के कुछ दिनों के अन्दर ही याचिकाकर्ता को न्यायालय में रजिस्ट्री के साथ अग्रिम जमानत की प्रक्रिया शुल्क की उचित राशि जमा करनी होगी । यदि प्रक्रिया शुल्क का भुगतान नही किया जाता है तो दूसरे पक्ष को नोटिस जारी नहीं किया जायेगा और इस मामले को न्यायालय का अनुपालन करने में विफलता के लिये अग्रिम जमानत की याचिका को भी खारिज किया जा सकता है।


     यह भी एक संभावना होती है कि अग्रिम जमानत की पहली सुनवाई पर ही न्यायालय में दूसरे पक्ष के सार्वजनिक अभियोजक द्वारा अग्रिम जमानत के नोटिस स्वीकार किया जा सकता है। 



* सुनवाई की अगली तारीख पर दूसरे पक्ष की तरफ से सार्वजानिक अभियोजक जमानत याचिका के जवाब के साथ अदालत में पेश होगा और इस विषय
में अपनी दलीलें देगा कि याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत क्यों नहीं दी जानी चाहिये। 


• दूसरे पक्ष के सार्वजनिक अभियोजक द्वारा न्यायालय में दलीलें पेश करने के बाद और जांच अधिकारी द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय उन सभी तर्को को ध्यान में रखते हुये जिन पर अग्रिम जमानत की याचिका का आवेदन किया गया है अपने विवेक से निर्णय लेगी कि याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत देनी चाहिये या नहीं।


 अग्रिम जमानत की याचिकाकर्ता के वकील को न्यायालय को विश्राव दिलाना होगा कि याचिकाकर्ता एक सज्जन व्यक्ति है और सोसाइटी में वह एक सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जाना जाता है और उसके खिलाफ न्यायालय में किसी भी तरह का आपराधिक मामला । रिकार्ड लंबित नहीं है। किसी भी तरह की जांच या पूछताछ के लिये न्यायालय जब भी उसे पेश होने के लिये कहेगी तो बिना किसी शर्त के खुद को न्यायालय में पेश करेगा । वह न्यायालय की अवमानना नहीं करेगा और न ही देश से फरार होने की सोचेगा। वकील द्वारा उसकी इस तरह की सभी दलीले पूर्ण होने के बाद न्यायालय अग्रिम जमानत देने के लिये पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है।



   यदि मामले में न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत दी जाती है तो न्यायालय परिस्थिति के अनुसार अभियुक्त की कुछ ऐसे नियम और शर्त प्रदान कर सकती है- कुछ धनराशि का जमा करना, पासपोर्ट का आत्मसमर्पण पुलिस की सूचना के बिना राज्य । देश नहीं छोड़ना किसी भी तरह के गवाहों को प्रभावित नहीं करना जांच प्रक्रिया में सहयोग करना और बुलाये जाने पर जांच एजेंसी के समक्ष खुद को उपलब्ध कराना आदि।


 पुलिस अधिकारियों की अग्रिम जमानत देने के न्यायालय के आदेश को दिखाने पर पुलिस उस व्यक्ति की गिरफ्तार नहीं कर सकती है। 


न्यायालय में अग्रिम जमानत प्रस्तुत करने के लिये आवश्यक दस्तावेज : FIR की एक कापी यदि अग्रिम जमानत FIR के बाद की जा रही है] गिरफ्तारी के
वारंट (यदि जारी किये गये दस्तावेज जो व्यक्ति की जमानत दिलाने में फायदेमंद हो सकते हैं और न्यायालय भी उन पर भरोसा कर सकता है जैसे कि, पूर्व चिकित्सा रिपोर्ट, चिकित्सा बिल, परिवार के कुछ दायित्व, माँ की बीमारी, FIR में लिखित आरोपों का खंडन करते हुये कुछ दस्तावेज जैसे कि प्लेन का टिकट, पासपोर्ट की कॉपी आदि। 


   दूसरे शब्दों में कहे तो अग्रिम जमानत या पूर्व गिरफ्तारी यह एक कानूनी प्रावधान है जो आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तार होने से पहले जमानत हेतु आवेदन करने की अनुमति देता है। भारत में पूर्व-गिरफ्तारी जमानत का प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 438 में किया गया है। इसे केवल सत्र न्यायालय (और उच्च न्यायालय द्वारा दिया जाता है।


  Question: अग्रिम जमानत कब मिल सकती है?

 • यदि आप को गैर-जमानती अपराध के लिये गिरफ्तार किये जाने की आशंका है। 

• यदि आपको लगता है कि आप को निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी। 


यदि आप अपनी गिरफ्तारी से पहले सबूत इकट्ठा करना चाहते हैं। 

यदि आप गंभीर बीमारी से पीडित हैं या आपको तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है।

 अदालत आपके आवेदन पर सुनवाई करेगी और निम्नलिखित कारकों पर विचार करेगी:-

 • [a] अपराध की गंभीरता 

[b] सबूतों की प्रबलता

 [C] आप के फरार होने की संभावना 

[d] आप का चरित्र और प्रतिष्ठा

 [e] गवाहों को प्रभावित करने की आप की संभावना


      यदि अदालत आपकी याचिका स्वीकार करती है तो वह आपको जमानत पर रिहा कर देगी। आप को जमानत राशि जमा करनी होगी और अदालत द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा। 

Note :-अग्रिम जमानत का अधिकार स्वतः सिद्ध नहीं है। अदालत आपके आवेदन पर विचार करेगी और सभी प्रासंगिक कारकों के आधार पर निर्णय लेगी।

अग्रिम जमानत के महत्वपूर्ण केस लॉ में कुछ फैसले :- 

[1] गुरदयाल सिंह बनाम पंजाब राज्य [1980]: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिये। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपी के फरार होने की संभावना है, या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना है तो उसे जमानत नहीं दी जानी चाहिये।


 [2] सत्यकेतन बिरला बनाम बिहार राज्य [2002]: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत देने का निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपी ने पहले अपराध किये हैं. या उसके खिलाफ मजबूत सबूत हैं तो उसे जमानत नहीं दी जानी चाहिये।

 [3] चन्द्रशेखर बनाम महाराष्ट्र राज्य [2013]:- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत कानून का एक सामान्य प्रावधान नहीं है और इसका उपयोग केवल असाधारण मामलों में ही किया जाना चाहिये। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपी प्रभावशाली व्यक्ति है या उसका आपराधिक इतिहास है तो उसे जमानत नहीं दी जानी चाहिये।


 [4.] नीरज भालोतिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020] इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत देने का निर्णय करते समय अदालत को आरोपी की उम्र और स्वास्थ्य पर भी विचार करना चाहिये। यदि आरोपी वृद्ध या बीमार है तो उसे जमानत पर विचार किया जा सकता है, भले ही उसके खिलाफ मजबूत सबूत हों।


 [5] जुबैर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [2023]: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत की याचिका खारिज करने के बाद भी आरोपी उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिये याचिका दायर कर सकता है। 


निष्कर्ष : अग्रिम जमानत एक जटिल कानूनी विषय है और प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

 Note: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उपरोक्त केवल कुछ महत्वपूर्ण मामलों का संक्षिप्त विवरण है। अग्रिम जमानत से संबन्धित कई अन्य मामले भी हैं। आपको हमेशा किसी भी कानूनी सलाह के लिये एक वकील से परामर्श करना चाहिए।



    When a person is about to be arrested for a crime or he fears that he may be implicated in a case and put in jail which he has not committed, then in order to avoid going to jail, he can apply for anticipatory bail before his arrest. When the court approves that application, then as per the court order, the police cannot arrest that person. This order of bail by the court is called anticipatory bail. This anticipatory bail can be done in two ways.

[1] Before FIR.

[2] After FIR.


[1] Before FIR: If two people have a dispute between them and one of them feels that the other may get him arrested by filing a false case against him, and if the first one comes to know from somewhere that the other one is planning to do something like this or the situation has become such that an FIR can be filed against him any time, then the first person can apply for his anticipatory bail in the court. In this, the court orders the police that if an FIR is filed against that person applicant, then after filing the FIR, the police will inform him seven days [or as many days as the court wants] before arresting him and will give a copy of the FIR so that the person can arrange for his bail.


[2] After the FIR In case an FIR has been filed against a person or his/her name appears in the list of accused in a police investigation, the person can apply for anticipatory bail under section 438 of the Code of Criminal Procedure, 1973. However, the important thing to note here is that the person should not be arrested. Once the person is arrested, it is mandatory to apply for regular bail or interim bail in such a case.

   On filing anticipatory bail, the opposite party is notified about the bail application and can fight the bail application in the court. The public prosecutor can also be used to do so.


Objectives of Anticipatory Bail:- Under Article 21 of the Constitution, the right to life and personal liberty is an important right for all Indian citizens. And it is considered a valuable right. Keeping this in mind, under Indian criminal law, there is a provision for anticipatory bail under Section 438 of the Indian Criminal Procedure Code 1973.

   Generally, anticipatory bail is resorted to to save an innocent person from a false case, financial loss and defamation. But for that, the court should feel that this person may be innocent or the police investigation is not being done regularly. Then the court can grant anticipatory bail to that person at its discretion. Anticipatory bail can be taken only and only from the Sessions Court. Or in some special circumstances, it can also be taken with the help of a writ from the High Court under Article 226.

    The Law Commission of India in its 41st report dated 24 September 1969 stated the need for adding a provision in the Criminal Procedure Code to the High Court and the Sessions Court to grant anticipatory bail.  This provision allows a person to obtain bail even before he is arrested for committing a non-bailable offence. The original purpose of including this provision was that no person should be confined in any way until he is convicted by the court.


Process of getting anticipatory bail:-

The following points have to be followed to apply for anticipatory bail:-

• The person who fears arrest should take the help of a good lawyer and inform him about all the circumstances due to which he is expecting to be arrested.

* The lawyer will apply for anticipatory bail in the court with the help of some important documents, depending on the nature of the crime for which he is expecting to be arrested, the application for anticipatory bail can be made in the Sessions Court or High Court.

The accused should read the anticipatory bail petition prepared by the lawyer thoroughly and ensure whether all the points of the petition are correct or not and after reading, sign all the relevant affidavits and Vakalatnama.

• On the first day of hearing, if the court is satisfied with the anticipatory bail petition, then notice will be issued to the other party of the case and a date will be given for the next hearing. The court will also ask the investigating officer of the case to submit a report before the next date of hearing.

 • Within a few days of the first hearing, the petitioner has to deposit the appropriate amount of processing fee for anticipatory bail with the registry of the court. If the processing fee is not paid, no notice will be issued to the other party and the anticipatory bail petition can also be dismissed for failure to comply with the court.

 There is also a possibility that the anticipatory bail notice may be accepted by the public prosecutor of the other party in the court on the first hearing of the anticipatory bail.


* On the next date of hearing, the Public Prosecutor from the other side will appear in the court with the reply to the bail petition and will give his arguments on why the petitioner should not be granted anticipatory bail.

• After the Public Prosecutor from the other side presents his arguments in the court and on the basis of the report prepared by the investigating officer, the court will decide in its discretion whether the petitioner should be granted anticipatory bail or not, keeping in mind all the arguments on which the petition for anticipatory bail has been applied.

          The lawyer of the petitioner for anticipatory bail will have to convince the court that the petitioner is a gentleman and he is known as a respected and reputed person in the society and there is no criminal case/record pending against him in the court. Whenever the court will ask him to appear for any kind of investigation or inquiry, he will present himself in the court without any condition. He will not commit contempt of court nor will he think of absconding from the country. After all such arguments are completed by the lawyer, the court is completely free to grant anticipatory bail.

    If anticipatory bail is granted by the court in the case, then the court can provide some terms and conditions to the accused according to the circumstances - depositing some amount of money, surrendering the passport, not leaving the state/country without informing the police, not influencing any kind of witnesses, cooperating in the investigation process and making oneself available before the investigating agency when called, etc.

        The police cannot arrest the person on showing the court order granting anticipatory bail to the police officers.


Documents required to be submitted for anticipatory bail in court: A copy of FIR (if anticipatory bail is being sought after FIR) Arrest warrant (if issued) Documents which may be beneficial in getting bail for the person and the court can also rely on them such as, previous medical report, medical bills, some family obligations, mother's illness, some documents refuting the allegations written in the FIR such as plane ticket, copy of passport etc.

     In other words, anticipatory bail or pre-arrest is a legal provision that allows an accused person to apply for bail before being arrested. In India, pre-arrest bail is provided under section 438 of the Code of Criminal Procedure 1973. It is granted only by the Sessions Court (and High Court).

Question: When can anticipatory bail be obtained?

• If you fear being arrested for a non-bailable offence.

• If you feel that you will not get a fair trial.

If you want to collect evidence before your arrest.

 If you are suffering from a serious illness or require immediate medical attention.


The court will hear your application and consider the following factors:-

• [a] The gravity of the offence

[b] The preponderance of the evidence

[c] The likelihood of you absconding

[d] Your character and reputation

[e] Your likelihood of influencing witnesses

              If the court accepts your plea, it will release you on bail. You will have to deposit a bail amount and follow the conditions set by the court.

Note: The right to anticipatory bail is not self-evident. The court will consider your application and take a decision based on all relevant factors.

Some important case law decisions on anticipatory bail:-

[1] Gurdial Singh vs State of Punjab [1980]: In this case, the Supreme Court said that anticipatory bail should be granted only in exceptional circumstances. The court also said that if the accused is likely to abscond, or influence witnesses, then he should not be granted bail.

 [2] Satyaketan Birla v State of Bihar [2002]: In this case, the Supreme Court said that the decision to grant anticipatory bail depends on the facts and circumstances of each case. The court also said that if the accused has committed crimes before or there is strong evidence against him, then he should not be granted bail.

[3] Chandrashekhar v State of Maharashtra [2013]: In this case, the Supreme Court said that anticipatory bail is not a general provision of law and it should be used only in exceptional cases. The court also said that if the accused is an influential person or has a criminal history, then he should not be granted bail.


[4.] Neeraj Bhalotia v State of Uttar Pradesh (2020): In this case, the Supreme Court held that while deciding whether to grant anticipatory bail, the court should also consider the age and health of the accused. If the accused is old or ill, he can be considered for bail even if there is strong evidence against him.

[5] Zubair Ahmed v State of Uttar Pradesh [2023]: In this case, the Supreme Court held that even after the anticipatory bail plea is rejected, the accused can file a bail plea in the High Court or Supreme Court.

Conclusion: Anticipatory bail is a complex legal subject and depends on the facts and circumstances of each case.

Note: It is important to note that the above is only a brief description of some important cases. There are many other cases related to anticipatory bail. You should always consult a lawyer for any legal advice.

Comments

Popular posts from this blog

मेहर क्या होती है? यह कितने प्रकार की होती है. मेहर का भुगतान न किये जाने पर पत्नी को क्या अधिकार प्राप्त है?What is mercy? How many types are there? What are the rights of the wife if dowry is not paid?

मेहर ( Dowry ) - ' मेहर ' वह धनराशि है जो एक मुस्लिम पत्नी अपने पति से विवाह के प्रतिफलस्वरूप पाने की अधिकारिणी है । मुस्लिम समाज में मेहर की प्रथा इस्लाम पूर्व से चली आ रही है । इस्लाम पूर्व अरब - समाज में स्त्री - पुरुष के बीच कई प्रकार के यौन सम्बन्ध प्रचलित थे । ‘ बीना ढंग ' के विवाह में पुरुष - स्त्री के घर जाया करता था किन्तु उसे अपने घर नहीं लाता था । वह स्त्री उसको ' सदीक ' अर्थात् सखी ( Girl friend ) कही जाती थी और ऐसी स्त्री को पुरुष द्वारा जो उपहार दिया जाता था वह ' सदका ' कहा जाता था किन्तु ' बाल विवाह ' में यह उपहार पत्नी के माता - पिता को कन्या के वियोग में प्रतिकार के रूप में दिया जाता था तथा इसे ' मेहर ' कहते थे । वास्तव में मुस्लिम विवाह में मेहर वह धनराशि है जो पति - पत्नी को इसलिए देता है कि उसे पत्नी के शरीर के उपभोग का एकाधिकार प्राप्त हो जाये मेहर निःसन्देह पत्नी के शरीर का पति द्वारा अकेले उपभोग का प्रतिकूल स्वरूप समझा जाता है तथापि पत्नी के प्रति सम्मान का प्रतीक मुस्लिम विधि द्वारा आरोपित पति के ऊपर यह एक दायित्व है

वाद -पत्र क्या होता है ? वाद पत्र कितने प्रकार के होते हैं ।(what do you understand by a plaint? Defines its essential elements .)

वाद -पत्र किसी दावे का बयान होता है जो वादी द्वारा लिखित रूप से संबंधित न्यायालय में पेश किया जाता है जिसमें वह अपने वाद कारण और समस्त आवश्यक बातों का विवरण देता है ।  यह वादी के दावे का ऐसा कथन होता है जिसके आधार पर वह न्यायालय से अनुतोष(Relief ) की माँग करता है ।   प्रत्येक वाद का प्रारम्भ वाद - पत्र के न्यायालय में दाखिल करने से होता है तथा यह वाद सर्वप्रथम अभिवचन ( Pleading ) होता है । वाद - पत्र के निम्नलिखित तीन मुख्य भाग होते हैं ,  भाग 1 -    वाद- पत्र का शीर्षक और पक्षों के नाम ( Heading and Names of th parties ) ;  भाग 2-      वाद - पत्र का शरीर ( Body of Plaint ) ;  भाग 3 –    दावा किया गया अनुतोष ( Relief Claimed ) ।  भाग 1 -  वाद - पत्र का शीर्षक और नाम ( Heading and Names of the Plaint ) वाद - पत्र का सबसे मुख्य भाग उसका शीर्षक होता है जिसके अन्तर्गत उस न्यायालय का नाम दिया जाता है जिसमें वह वाद दायर किया जाता है ; जैसे- " न्यायालय सिविल जज , (जिला) । " यह पहली लाइन में ही लिखा जाता है । वाद - पत्र में न्यायालय के पीठासीन अधिकारी का नाम लिखना आवश्यक

अंतर्राष्ट्रीय विधि तथा राष्ट्रीय विधि क्या होती है? विवेचना कीजिए.( what is the relation between National and international law?)

अंतर्राष्ट्रीय विधि को उचित प्रकार से समझने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विधि तथा राष्ट्रीय विधि के संबंध को जानना अति आवश्यक है ।बहुधा यह कहा जाता है कि राज्य विधि राज्य के भीतर व्यक्तियों के आचरण को नियंत्रित करती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय विधि राष्ट्र के संबंध को नियंत्रित करती है। आधुनिक युग में अंतरराष्ट्रीय विधि का यथेष्ट विकास हो जाने के कारण अब यह कहना उचित नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि केवल राज्यों के परस्पर संबंधों को नियंत्रित करती है। वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय विधि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सदस्यों के संबंधों को नियंत्रित करती है। यह न केवल राज्य वरन्  अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, व्यक्तियों तथा कुछ अन्य राज्य इकाइयों पर भी लागू होती है। राष्ट्रीय विधि तथा अंतर्राष्ट्रीय विधि के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। दोनों प्रणालियों के संबंध का प्रश्न आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि व्यक्तियों के मामले जो राष्ट्रीय न्यायालयों के सम्मुख आते हैं वे भी अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय हो गए हैं तथा इनका वृहत्तर  भाग प्रत्यक्षतः व्यक्तियों के क्रियाकलापों से भी संबंधित हो गया है।