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पत्नी पर पेट्रोल डालकर आग लगाने की कोशिश: BNS धारा 109 में जमानत कैसे मिलेगी? पूरी कानूनी प्रक्रिया और Bail Arguments

चूककर्ता से क्या मतलब होता है? मालगुजारी भुगतान के लिए वित किश्तें क्या होती हैं?मालगुजारी एवं लगान में अंतर भी बताइए । ( Define defaulter . Describing the instalments fixed for the ent of land revenue and also give difference between Renandadtev cnuc . )

चूककर्ता की परिभाषा ( Meaning of Defaulter )


 अधिनियम के अनुसार , वह मालगुजारी जो निश्चित की जाती है , उसका भुगतान निश्चित समय या उसके पूर्व अदा भुगतान नहीं की जाती है , ' बकाया मालगुजारी ' कहलाती है और उस ' बकाया मालगुजारी ' को देनदार व्यक्ति चूककर्ता ( Defaulter ) कहलाता है । 


मालगुजारी के भुगतान की नियत किस्तें ( Instalments for Payment of Land Revenue )

    मालगुजारी के भुगतान के लिए अधिनियम की धारा 248 में कहा गया है , राज्य सरकार ऐसे दिनांक या दिनांकों को जिनसे और ऐसी किस्तें जिनमें धारा 245 और 246 में अभिदिष्ट भूमिधरों द्वारा मालगुजारी देय होगी , नियत कर सकती है जो मालगुजारी या उसकी जो किस्त निश्चित तिथि पर या उसके पहले देने से रह जायेगी , मालगुजारी की बकाया हो जायेगी और उसके देनदार ' बाकी दार ' अथवा ' चूककर्ता ' हो जायेगी । 


        वर्तमान समय में वार्षिक भूराजस्व 2 किश्तों खरीफ तथा रबी में विभाजित होता है । खरीफ का भूराजस्व 31 दिसम्बर तक तथा रबी का 30 जून तक देय होता है । अगर भूराजस्व का भुगतान 30 जून तक नहीं किया जाता तो अगले वर्ष के लिए यह धनराशि ' बकाया लगान ' बन जाती है । ऐसी बकाया मालगुजारी की वसूली अलग से निर्धारत प्रक्रिया अपना कर या दूसरी किश्त के साथ वसूली जा सकती है । 


मालगुजारी और लगान में अन्तर में ( Differences between Revenue and Rent )

 मालगुजारी और लगान सिद्धान्ततः एक ही हैं , क्योंकि दोनों की भूमि के कब्जे के एवज में ही देय होते हैं , दोनों एक निश्चित निर्धारित दर पर देय होते हैं किन्तु व्यवहार ( In Practice ) दोनों में निम्नलिखित अन्तर हैं


 1. मालगुजारी सरकार द्वारा लगाया गया कर है जो किसी अधिनियम में बने सिद्धान्त के अनुसार लगाया जाता है परन्तु लगान संविदानुसार होता है ।


 2. भूमिधर सरकार को मालगुजारी देते हैं , जबकि असामी अपने असफल काश्तकार ( क्षेत्रपति ) अथवा गाँव सभा को लगान देता है । 


3. लगान संविदा द्वारा तय की जाती है अत : संविदा के पक्षकारों द्वारा परिवर्तित भी की जा सकती है किन्तु मालगुजारी सरकार द्वारा निश्चित सिद्धान्त पर निर्धारित की जाती है जिसमें कोई परिवर्तन सरकार द्वारा हो सकता है न कि किसी पक्षकार द्वारा । 


       सूखा - बाढ़ या अन्य प्राकृतिक अथवा दैवीय आपदा की स्थिति में सरकार मालगुजारी पूर्णत : या अंशतः ; जैसे- आधी , चौथाई , तिहाई , माफ करने को घोषणा करती है लेकिन लगान माफ करना या करना काश्तकार के विवेक पर निर्भर करती है।





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