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कानूनी मामलों में चिकित्सा साक्ष्य की क्या भूमिका होती है?What role does medical evidence play in legal cases?

मेहर क्या होती है? यह कितने प्रकार की होती है. मेहर का भुगतान न किये जाने पर पत्नी को क्या अधिकार प्राप्त है?What is mercy? How many types are there? What are the rights of the wife if dowry is not paid?

मेहर ( Dowry ) - ' मेहर ' वह धनराशि है जो एक मुस्लिम पत्नी अपने पति से विवाह के प्रतिफलस्वरूप पाने की अधिकारिणी है ।


मुस्लिम समाज में मेहर की प्रथा इस्लाम पूर्व से चली आ रही है । इस्लाम पूर्व अरब - समाज में स्त्री - पुरुष के बीच कई प्रकार के यौन सम्बन्ध प्रचलित थे । ‘ बीना ढंग ' के विवाह में पुरुष - स्त्री के घर जाया करता था किन्तु उसे अपने घर नहीं लाता था । वह स्त्री उसको ' सदीक ' अर्थात् सखी ( Girl friend ) कही जाती थी और ऐसी स्त्री को पुरुष द्वारा जो उपहार दिया जाता था वह ' सदका ' कहा जाता था किन्तु ' बाल विवाह ' में यह उपहार पत्नी के माता - पिता को कन्या के वियोग में प्रतिकार के रूप में दिया जाता था तथा इसे ' मेहर ' कहते थे । वास्तव में मुस्लिम विवाह में मेहर वह धनराशि है जो पति - पत्नी को इसलिए देता है कि उसे पत्नी के शरीर के उपभोग का एकाधिकार प्राप्त हो जाये मेहर निःसन्देह पत्नी के शरीर का पति द्वारा अकेले उपभोग का प्रतिकूल स्वरूप समझा जाता है तथापि पत्नी के प्रति सम्मान का प्रतीक मुस्लिम विधि द्वारा आरोपित पति के ऊपर यह एक दायित्व है । वास्तव में मेहर एक ऐसा मुआवजा है । जो पत्नी को बच्चा जनने , स्तनपान कराने और बच्चे के लालन - पालन करने के फलस्वरूप दिया जाता है । पैम्बर साहब ने बाल विवाह में मेहर का उपयोग इस्लाम में महिलाओं की दशा सुधारने के लिए किया था । कुरान का यह कथन कि , " यदि तुम अपनी पत्नियों से अलग होते हो तो उन्हें सौहार्द से विदा करो , जो वस्तुएँ तुमने उन्हें कभी दी हों उन्हें उनसे फिर लेने की अनुमति नहीं है । " इंगित करता है कि अब मुस्लिम पत्नी अपने पति से प्राप्त किये हुए उपहारों की पूर्ण स्वामिनी है और वे उससे छीने नहीं जा सकते । 

Mehr (Dowry) - 'Mehr' is the amount of money that a Muslim wife is entitled to receive from her husband as a result of marriage.



 In the Muslim society, the practice of dowry has been going on since before Islam.  In pre-Islamic Arab society, many types of sexual relations were prevalent between men and women.  In 'Bina Dhan' marriage, the man used to visit the woman's house but did not bring her to his home.  That woman was called 'Sadiq' i.e. Sakhi (girl friend) and the gift given by a man to such a woman was called 'Sadaka' but in 'child marriage' this gift was given to the wife's parents as a sign of separation from the girl child.  It was given in the form of retribution and it was called 'Mehr'.  In fact, Mehr in Muslim marriage is the amount that husband gives to the wife so that he gets the monopoly of the enjoyment of the wife's body.  It is a symbol of an obligation imposed on the husband by Muslim law.  Verily Mehr is such a compensation.  Which is given to the wife as a result of giving birth to a child, breastfeeding and bringing up the child.  Pamber Sahab used dowry in child marriage to improve the condition of women in Islam.  The Qur'anic statement, "If you separate from your wives, see them off amicably, it is not permissible to take back from them what you once gave them." indicates that the Muslim wife now receives from her husband  She has absolute ownership of the gifts made and they cannot be taken away from her.


परिभाषा 


विभिन्न विधि वेत्ताओं ने मेहर को निम्न प्रकार परिभाषित किया है:-

 विलसन के अनुसार , ' मेहर पत्नी द्वारा शरीर के समर्पण का प्रतिकर ( बदला ) है ।

 जस्टिस महमूद ने मेहर की परिभाषा इस प्रकार की है कि मुस्लिम विधि के अन्तर्गत मेहर वह धनराशि या सम्पत्ति देने की प्रतिज्ञा है कि जो पत्नी को निकाह के बदले में भुगतान की जाये और जहाँ मेहर को निकाह के समय व्यक्त रूप से निर्धारित या उल्लिखित न किया जाये , कानून मेहर प्राप्त करने के अधिकार पत्नी को देता है ।

 मुल्ला के अनुसार , मेहर वह धनराशि या सम्पत्ति है जो पत्नी अपने पति से निकाह के प्रतिफल के रूप में प्राप्त करने का अधिकार रखती है ।


 डॉ . जंग मेहर की परिभाषा ऐसी सम्पत्ति या उसकी तुल्य वस्तु के रूप में करते हैं , जिसका युवा अर्थात् स्वतः उपभोग के अधिकार के विशिष्ट प्रतिकर स्वरूप या तो विवाह की संविदा करार दिये जाने के कारण या किसी अन्य संविदा के आधार पर , पति द्वारा दिया जाना अनिवार्य है ।

 श्री . के . पी . सक्सैना के अनुसार , मेहर वह धनराशि या सम्पत्ति है जिसमें भुगतान करने देने को निकाह की संविदा के फलस्वरूप पत्नी द्वारा व्यक्तित्व का समर्पण करने के प्रतिफल स्वरूप पति - पत्नी से प्रतीज्ञा ( चाहे वह निहित हो ) करे । परन्तु अब यह विवाह का प्रतिफल ही कहा जाता है । 

   तैयबजी के अनुसार , ' मेहर वह धनराशि है जो विवाह के बाद पति द्वारा पत्नी को पक्षकारों के करार या कानून के अनुसार देय होता है , या तो तात्कालिक होता है या आस्थागित देय होता है । 


Definition



 Various jurists have defined Mehr as follows: -


 According to Wilson, 'Mehr is the compensation (revenge) for the dedication of the body by the wife.


 Justice Mahmood has defined Mehr in such a way that under Muslim law, Mehr is the promise of money or property to be paid to the wife in return for Nikah and where Mehr is not specifically fixed or mentioned at the time of Nikah  Yes, the law gives the wife the right to receive Mehr.


 According to Mulla, mehr is the amount of money or property that a wife is entitled to receive from her husband as a consideration for marriage.



 Doctor .  Jung defines mehr as such property or its equivalent, which is compulsory to be given by the husband either because of the contract of marriage or on the basis of any other contract, as specific compensation for the right of yuva i.e. self-consumption.  Is .


 Mister .  K .  P . saxena  According to Saxena, dowry is the amount of money or property promised (whether implied) by the husband to the wife in return for the surrender of her personality by the wife as a result of the contract of marriage to allow payment.  But now it is said to be the result of marriage.


 According to Tyabji, 'Mahr is the sum of money payable by the husband to the wife after marriage by agreement of the parties or by law, either immediate or deferred.


लाहौर उच्च न्यायालय के मतानुसार मेहर पुरुष द्वारा विवाह की संविदा करने के लिये स्त्री को दिया गया विनिमय ( exchange ) या प्रतिकार नहीं है , बल्कि पति पर संविदा की विषय  वस्तु  स्त्री के प्रति सम्मान के प्रतीक ( Token ) के रूप में विधि द्वारा आरोपित एक परिणाम है।


 अब्दुल कादिर बनाम सलीमा के वाद में न्यायमूर्ति महमूद ने कहा था कि 

       " मेहर मुस्लिम विधि में वह धनराशि या सम्पत्ति होती है जिसे पति विवाह के प्रतिक के रूप में पत्नी को देने का वादा करता है तथा विवाह के समय इसे नियत न किया जाए या इसका जिक्र न किया जाय तो भी कानून पत्नी को मेहर का हक प्रदान करता है । 

मेहर की प्रकृति ( Nature of Dower ) - मेहर की प्रकृति एक ऋण के समान है तथा पत्नी इसे उसी भाँति वसूल कर सकती है जिस प्रकार से कोई अन्य ऋण । मेहर तय विक्रय के संविदाओं के बीच प्रायः सादृश्य दिखाया जाता है । पत्नी की तुलना सम्पत्ति से और मेहर की तुलना मूल्य से की जाती है । यदि तुरन्त देय मेहर की धनराशि पत्नी को न दी जाये तो पत्नि अपने पति से सहवास करने से मना कर सकती है । यदि तलाक के समय पति - पत्नी को  शेष मेहर न दे तो पत्नी पति की सम्पत्ति में से ऋण को वसूल कर सकती है । 

According to the Lahore High Court, dowry is not an exchange or consideration given by a man to a woman for contracting marriage, but a duty imposed by law on the husband as a token of respect to the woman, the subject matter of the contract.  the result is.



 In the case of Abdul Qadir Vs Salima, Justice Mahmood said that


 Mehr in Muslim law is the amount of money or property that the husband promises to give to the wife as a token of marriage and even if it is not fixed or mentioned at the time of marriage, the law entitles the wife to Mehr.  does.


 Nature of Dowry - The nature of dowry is like that of a debt and the wife can recover it in the same way as any other debt.  An analogy is often drawn between contracts of agreed sale.  Wife is compared to wealth and dowry is compared to value.  If the dowry amount due immediately is not given to the wife, then the wife can refuse to cohabit with her husband.  If the husband does not give the remaining dower to the wife at the time of divorce, then the wife can recover the debt from the husband's property.


 अब्दुल कादिर बनाम सलीमा ' के वाद में जस्टिस महमूद ने विवाह और मेहर की तुलना   विक्रय की संविदा और प्रतिकर से करते हुए यह कहा- " विक्रय की संविदा से तुलना करके मेहर को दाम्पत्य - समागम के लिए प्रतिकर समझा जाता है । जब तक मेहर का भुगतान न किया जाय तब तक पति का प्रतिरोध करने पर पत्नी का अधिकार , मूल्य का बिना पूरा किये या आंशिक  भुगतान पाये हुए विक्रेता के कब्जे में पड़े हुए माल पर विक्रेता के धारणाधिकार के सादृश्य और उसका पति को समर्पण करना क्रेता के माल सौंपने के तुल्य है । " 


       मेहर दाम्पत्य समागम के लिए एक प्रतिकर है । यद्यपि मेहर बुजा ( पत्नी के गुप्तांग शरीर ) के उपभोग का प्रतिकर है , परन्तु किसी अन्य संविदा के प्रतिकर के अर्थ में मेहर वास्तव में  विवाह का प्रतिकर नहीं । वह पत्नी के प्रति " सम्मान के प्रतीक " के रूप में विधि द्वारा पति पर आरोपित एक दायित्व है।


          एक अत्याधुनिक निर्णय श्रीमती नाजिमा बेगम बनाम रिजवान अली ' में इलाहाबाद उच्च  न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया है कि " मुअज्जल मेहर को प्राप्त करने का अधिकार समागम   से पूर्वगामी है । इस वाद में यह अवलोकन किया गया है कि निःसन्देह मुस्लिम विधि के अन्तर्गत मेहर का तात्पर्य ऐसी धनराशि अथवा सम्पत्ति से होता है जिसे विवाह के प्रतिफल के रूप में विवाह में पति के मेहर देने के दायित्व का उल्लेख न हो अथवा कोई ऐसा अनुबन्ध हो जिसके अन्तर्गत पत्नी को मेहर प्राप्त करने का अधिकार न दिया गया हो तो पति के इस दायित्व को निर्धारण अदालतों द्वारा होता है और पत्नी को उचित मेहर प्राप्त हो जाता है । 

In the case of Abdul Qadir Vs. Salima, Justice Mahmood, while comparing marriage and dowry with the contract of sale and consideration, said- "The dowry as compared with the contract of sale is considered as the compensation for conjugal intercourse. As long as the dowry  The right of the wife to resist the husband until payment is made, analogous to the seller's lien on goods lying in the possession of the seller without full or part payment of the price, and her surrender to the husband is equivalent to the delivery of the goods by the buyer.  Is . "



 Mehr is a compensation for conjugal intercourse.  Although mehr is compensation for the enjoyment of Buja (the genitals of the wife), mehr is not really a marriage compensation in the sense of compensation in any other contract.  It is an obligation imposed on the husband by law as a "mark of respect" towards the wife.



 The Allahabad High Court in a cutting-edge decision, Smt. Nazima Begum v. Rizwan Ali, has expressed the view that "the right to receive muazzal mehr is prior to intercourse".  Means such amount of money or property which does not mention the obligation of the husband to give dowry in marriage as a consideration of marriage or there is a contract under which the wife is not given the right to receive dowry, then this obligation of the husband  The amount is determined by the courts and the wife gets the appropriate dowry.

मेहर का महत्व ( Importance of Dower ):- मुस्लिम समाज में मेहर ( dower ) का अनन्य स्थान है क्योंकि यह एक ऐसा सशक्त साधन है जिसके माध्यम से मुस्लिम पति की निरंकुश तरीके से बार - बार तलाक देने की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण लगता है । जब तलाक के समय मेहर की पूरी धनराशि भुगतान करना चाहता है तो व्यक्ति को तलाक देने से पहले कई बार सोचना पड़ता है । इस्लाम से पूर्व स्त्रियों को शोचनीय दशा का मुख्य कारण यह था कि मेहर ( Dower ) का भुगतान स्त्री को न देकर उसके माता - पिता को होता था । अतः यह एक प्रकार से उस स्त्री का विक्रय मूल्य ( sale value ) होता था । इस्लाम के बाद मुहम्मद साहब ने यह व्यवस्था की कि स्त्री को किसी प्रकार का उपहार न देकर मेहर ( Dower ) का भुगतान किया  जाये । इससे मुस्लिम स्त्रियों को विवाह - विच्छेद के बाद आर्थिक दृष्टि से पूर्णतया निराश्रय और  असहाय नहीं होना पड़ेगा ।


फतवा इ - काजी खाँ के अनुसार , " मेहर विवाह का एक ऐसा आवश्यक अंग है कि यदि पत्नी विवाह के समय संविदा में उसका उल्लेख न हो , तो भी स्वतः संविदा के आधार पर उसकी पूर्व शेष धारणा कर लेगी । " आबि दुन्निसा बनाम मोहम्मद फतहउद्दीन ( 41 मद्रास 1026 ) के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि " मेहर विवाह की आवश्यक प्रसंगति और मूलभूत विशिष्टता है , जिसका परिणाम यह होता है कि यदि मेहर न निश्चित किया जाय तो भी पत्नी से पति से कुछ न कुछ मेहर पाने की हकदार होती है । " विवाह की मान्यता के लिए मेहर का उल्लेख आवश्यक है और यदि संविदा करने वाला पक्ष मेहर का उल्लेख न भी करे तो भी  विवाह मान्य है । ( हेदाया 44 ) । 

Importance of Dowry:- Dowry has a special place in the Muslim society because it is such a powerful means through which control is felt on the Muslim husband's autocratic tendency to divorce again and again.  When at the time of divorce wants to pay full amount of dowry then person has to think many times before giving divorce.  The main reason for the deplorable condition of women before Islam was that dowry was not paid to the woman but to her parents.  So it was in a way the sale value of that woman.  After Islam, Muhammad Sahab arranged that dowry should be paid without giving any kind of gift to the woman.  Due to this, Muslim women will not have to become completely destitute and helpless financially after divorce.



 According to Fatwa-i-Qazi Khan, "Dower is such an essential part of marriage that even if it is not mentioned in the contract at the time of marriage, the wife will automatically assume its pre-residue on the basis of the contract." Abi Dunnisa v. Mohd. Fatehuddin  ( 41 Madras 1026 ) it has been held that " dowry is an essential incidental and essential characteristic of marriage , the consequence of which is that even if dowry is not fixed , the wife is entitled to some dowry from the husband .  Mention of dowry is necessary for the recognition of marriage and even if the contracting party does not mention dowry, the marriage is valid.  (Hedaya 44).


 मेहर का उद्देश्य - मेहर के निम्नलिखित दो उद्देश्य हैं 


( 1 ) पत्नी के प्रति सम्मान के प्रतीक के रूप में पति पर एक दायित्व का आरोप करना , और 

( 2 ) पति द्वारा तलाक के मनमाने उपयोग का एक अवरोध रखना । 

मेहर की विषय - वस्तु :  कोई भी निश्चित की गई वस्तु , जिसका कुछ मूल्य हो , जो ' माल ' की परिभाषा में आती हो और अस्तित्व में हो , मेहर की विषय - वस्तु हो सकती है । यदि मेहर की सम्पत्ति में कुछ सम्पत्ति अवैध है तो ऐसी दशा में केवल ऐसी सम्पत्ति जो वैध है , मेहर की विषय - वस्तु मानी जायेगी और अवैध सम्पत्ति मेहर की विषय - वस्तु नहीं मानी जायेगी ।


      मोहम्मद शाहबुद्दीन बनाम उमरतुलसूल ' के वाद में न्यायालय द्वारा यह अभिमत व्यक्ति किया गया है कि- " मेहर की राशि सामान्यतया मौखिक संविदा द्वारा तय की जाती है और यह रीति मान्य है । मेहर की अधिकतम तथा न्यूनतम राशि की कोई सीमा मात्र नहीं है यद्यपि न्यूनतम राशि हनाफी विधि - वेत्ताओं द्वारा 10 दिरहम तथा मालिकी लोगों द्वारा उदिरहम निश्चित की गई थी । ये न्यूनतम राशियाँ अब अव्यवहारिक हो गई है और मेहर की राशि पूर्णतया आधारों पर निर्भर होती है , जैसे पति और पत्नी को परिस्थितियाँ , पति में निहित , तलाक देने । शक्ति के मनमाने प्रयोग को रोकने की आवश्यकता , स्त्री के पिता के खान - दान की स्थिति , की बौद्धिक योग्यता , वैयक्तिक आकर्षण और योग्यताएँ पाने की आर्थिक स्थिति , स्त्री की परवर्ती  सामाजिक अवस्था और पक्षकारों की आत्मप्रशंसा की इच्छा और अहंकार । 
Purpose of Mehr - Mehr has the following two purposes



 (1) the imposition of an obligation on the husband as a mark of respect to the wife, and


 (2) To put a check on the arbitrary use of talaq by the husband.


 Subject matter of Mehr: Any specified thing which has some value, which comes under the definition of 'goods' and is in existence, can be the subject matter of Mehr.  If some property is illegal in the property of dower, then only such property which is legal, will be considered as the subject matter of dower and illegal property will not be considered as the subject matter of dower.



 In the case of Mohd. Shahabuddin vs. Umartulsul, it has been opined by the court that- "The amount of dowry is generally fixed by oral contract and this practice is valid. There is no limit to the maximum and minimum amount of dowry, though the minimum  The amount was fixed at 10 dirham by the Hanafi scholars and Udirham by the Malikis. These minimum amounts have now become impractical and the amount of dowry depends entirely on the grounds, such as the circumstances of the husband and wife, the status of the husband, divorce.  The need to prevent arbitrary use of power, the financial status of the woman's father, the intellectual ability of the woman, the personal attractiveness and the economic status of the woman, the subsequent social status of the woman, and the desire for self-aggrandizement and arrogance of the parties.


मेहर का भुगतान न किये जाने पर पत्नी को   प्राप्त अधिकार the remedies of a Muslim wife for non payment of he dower .


 मेहर का भुगतान न किये जाने पर पत्नी के अधिकार - मुस्लिम विधि के अनुस यदि पत्नी को मेहर की धनराशि का भुगतान न किया जाये तो ऐसी स्त्री को निम्न उपचार  उपलब्ध होते हैं

 ( 1 ) पति के साथ सम्भोग करने से इन्कार करना - यदि मुअज्जल मेहर का भुगतान  नहीं किया गया है और विवाह पूर्णावस्था को नहीं प्राप्त हुआ है तो पत्नी को समागम से इन्कार कर देने का अधिकार है । यदि पत्नी नाबालिग है अथवा अस्वस्थचित्त है तो उसके संरक्षक को यह अधिकार है कि वह उसे तब तक पति - गृह जाने से मना कर दे जब तक कि मुअज्जल मेहर का भुगतान नहीं कर दिया जाता । यदि विवाह पूर्णावस्था को प्राप्त हो चुका है तो वह समागम  से इन्कार नहीं कर सकती बशर्ते कि पूर्णावस्था प्राप्त होने के समय वह अवयस्क या विक्षिप्त  चित्त न रही हो ।


    रविया खातून बनाम मुख्तार अहमद ' के वाद में यह निर्णीत हुआ है कि यदि स्वयं सहमति से पूर्णावस्था प्राप्त होने के बाद दाम्पत्य अधिकारों के पुनर्स्थापन का वाद दायर किया जाये  तो उचित डिक्री वाद खारिज करने की नहीं बल्कि मुअज्जल मेहर के भुगतान के बाद दामपत्य अधिकारों  की पुनर्स्थापन की डिक्री होती है ।

 ( 2 ) मेहर को ऋण के समान वसूल करना - मेहर एक प्रकार का ऋण है जिसको चुकाने का निकाह के समय पति वायदा करता है । मेहर को पत्नी उसी तरह से वसूल कर सकती जिस प्रकार महाजन लोग ( Creditors ) अपने ऋण को वसूल करते हैं । यदि पति की उस दौरान मृत्यु हो जाये तो वह पति की सम्पत्ति से उसे वसूल कर सकती है ।

The remedies of a Muslim wife for non payment of he dower.



 Rights of the wife in case of non-payment of Mehr - According to Muslim law, if the amount of Mehr is not paid to the wife, the following remedies are available to such a woman.


 (1) Refusal to have sexual intercourse with the husband - If the Muazzal dowry has not been paid and the marriage has not been consummated, the wife has the right to refuse sexual intercourse.  If the wife is a minor or is of unsound mind, her guardian has the right to forbid her from going to the husband's house until the Muazzal dowry is paid.  If the marriage has come of age, she cannot refuse intercourse, provided she was not a minor or of unsound mind at the time of attaining maturity.



 It has been decided in the case of Ravia Khatoon vs. Mukhtar Ahmed that if a suit for restoration of conjugal rights is filed after attaining full status with her own consent, the appropriate decree should not be to dismiss the suit but to restore conjugal rights after payment of Muazzal Mehr.  There is a decree for restitution.


 (2) Recovering dowry like a loan - Dowry is a type of loan which the husband promises to repay at the time of marriage.  The dowry can be recovered by the wife in the same way as moneylenders recover their debts.  If the husband dies during that time, she can recover it from the husband's property.

       हमीदा बीवी बनाम जुवेदा बीबी के वाद में प्रिवी कौंसिल द्वारा यह निर्णय दिया गया है कि ' मेहर ऋण की श्रेणी में आता है और पति की मृत्यु हो जाने पर विधवा अन्य ऋणदाताओं के साथ - साथ पति की सम्पत्ति में भुगतान मागने की अधिकारिणी होती है । परन्तु वह पति सम्पत्ति पर कोई भार आरोपित करने की हकदार नहीं होती , यद्यपि ऐसा भार करार द्वारा आरोपित  किया जा सकता है ।


 सैय्यद साबिर हुसेन बनाम फरजन्द हसन ' के वाद में एक शिया मुसलमान अपने अवयस्क  पुत्र के विवाह की संविदा करते हुए पुत्र वधू के मेहर के भुगतान के लिए जमानतदार बना।
पिता की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति से उक्त मेहर देय ठहराया गया और प्रत्येक उत्तराधिकारी को अपने हिस्से के अनुपात में उक्त मेहर का भुगतान करना पड़ा । 

( 3 ) पति की सम्पत्ति पर कब्जा – यदि मेहर का भुगतान किये बिना पति की मृत्यु हो जाये तो उसकी ( अपने मृतक पति की ) सम्पत्ति पर उस समय तक कब्जा रख सकती है जब तक कि उसके मेहर की धनराशि का भुगतान न हो जाये । यदि उसके पति की सम्पत्ति का बँटवारा है तो प्रत्येक उत्तराधिकारी को हिस्से में मिली सम्पत्ति में से अनुपातिक रूप से मेहर की धनराशि का भुगतान करना होगा । कपूर चन्द्र बनाम खदुरुनिसा ' के वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय किया कि मुस्लिम विधवा अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति से अपने मेहर की एवज में अपने मृतक पति की सम्पत्ति पर काबिज हो सकती है , परन्तु इस प्रकार विधवा का अन्य अप्रतिभूत ऋणदाताओं ( unsecured creditors ) की अपेक्षा प्राथमिकता का अधिकार नहीं होता ।


In the case of Hamida Bibi vs Juveda Bibi, it has been decided by the Privy Council that ' dowry comes under the category of debt and on the death of the husband, the widow is entitled to demand payment in the husband's property along with other creditors.  But she is not entitled to impose any charge on the husband's property, although such charge may be imposed by agreement.



 In the case of Sayyid Sabir Hussain vs. Farzand Hasan, a Shia Muslim contracting the marriage of his minor son became surety for the payment of dowry of the bride.

 After the death of the father, the said mehr was made payable from his property and each heir had to pay the said mehr in proportion to his share.


 (3) Possession of husband's property - If the husband dies without paying dowry, she can keep possession of his (her deceased husband's) property until her dowry amount is paid.  If there is a partition of her husband's property, then each of the heirs will have to pay the amount of dowry proportionately from the property received in their share.  In the case of Kapur Chandra v. Khadrunisa, the Supreme Court decided that a Muslim widow can take possession of the property of her deceased husband in lieu of her dowry with the consent of other heirs, but thus the widow will be free from other unsecured creditors.  Expectation does not have the right of priority.

  मेहर के प्रकार  the  kinds of Dower : राशि के आधार पर मेहर दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है 

( i ) निश्चित मेहर ( मेहर - इ - मुसम्मा ) और

 ( ii ) उचित ( रिवाजी ) मेहर ( मेहर - इ - मिस्ल ) । 

भुगतान के समय के आधार पर मेहर को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त किया जा सकता है 

( i ) मुअज्जल ( तात्कालिक ) मेहर और

 ( ii ) मुबज्जल ( आस्थागित ) मेहर 


निश्चित मेहर ( मेहर - इ - मुसम्मा ) यदि विवाह - संविदा के समय मेहर की धनराशि का उल्लेख हो तो ऐसा मेहर निश्चित मेहर होता है । यदि विवाह के वयस्क पक्षकार वयस्क और स्वस्थ चित्त के हैं तो मेहर की धनराशि विवाह के समय स्वयं निर्धारित कर सकते हैं । यदि विवाह के पक्षकार अवयस्क हैं तो मेहर की धनराशि ऐसे अवयस्क वर के पिता द्वारा निर्धारित की जाती है और पिता द्वारा निर्धारित धनराशि ऐसे अवयस्क वर के ऊपर बाध्यकारी होगी । हनाफी विधि के अनुसार निश्चित मेहर की धनराशि किसी भी स्थिति में दस दिरहम से कम तथा मलिकी विधि के अनुसार तीन दिरहम से कम न होगी ।


 ( 2 ) उचित ( रिवाजी ) मेहर ( मेहर - इ - मिरल ) - अधिकांशतया प्रत्येक विवाह संविदा में मेहर निश्चित की जाती है या निश्चित करने का करार और उसका ढंग वर्णित होता है । किन्तु विवाह के समय जब मेहर निश्चित न किया गया हो तो भी पत्नी उचित मेहर पाने की अधिकारिणी हो जाती है । इस उचित मेहर को मुस्लिम विधि में ' मेहर - उल - मिस्ल ' कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है " उसी तरह की मेहर " । उचित मेहर के निर्धारण में उसके ( पत्नी के ) पिता की अन्य स्त्रियों , पिता को बहनों के लिए निश्चित किये गये मेहर को ध्यान में रखा जायेगा । हेदाया में कहा गया है कि उचित मेहर के निर्धारण में पत्नी के निजी सौन्दर्य , धन ,बुद्धि और गुण पर भी विचार किया जाना चाहिए । उसकी सामाजिक हैसियत कुँवारी , विधता या तलाक शुदा - पर विचार किया जाना चाहिए । पति की हैसियत मेहर के निर्धारण में व्यर्थ है ।

The types of Dowry: On the basis of amount, Mehr can be divided into two categories.


 (i) fixed mehr (mehr-i-musamma) and


 (ii) Proper (customary) mehr (mehr-i-misl).


 Mehr can be divided into the following two parts on the basis of time of payment


 (i) Mu'azzal (temporary) Mehr and


 (ii) Mubazzal (Deferred) Mehr



 Fixed Dowry (Mehr-e-Musamma) If the amount of dowry is mentioned at the time of marriage contract, then such dowry is fixed dowry.  If the adult parties to the marriage are adults and of sound mind, then the amount of dowry can be decided by themselves at the time of marriage.  If the parties to the marriage are minors, the amount of dowry is determined by the father of such minor groom and the amount determined by the father shall be binding on such minor bridegroom.  According to the Hanafi method, the amount of fixed dowry shall not be less than ten dirhams in any case and according to the Maliki method, it shall not be less than three dirhams.



 (2) Proper (customary) dowry (mehr-e-miral) - Mostly in every marriage contract dowry is fixed or the agreement to fix and its method is described.  But even when dowry is not fixed at the time of marriage, the wife becomes entitled to get proper dowry.  This proper dowry is called 'mehr-ul-misl' in Muslim law, which literally means "like dowry".  In determining the appropriate dowry, the dowries fixed for other women of her (wife's) father, sisters of the father shall be taken into account.  It is said in the Hedaya that the personal beauty, wealth, intelligence and virtues of the wife should also be considered in determining the appropriate dowry.  Her social status – virgin, widow or divorcee – should be considered.  The status of the husband is of no use in determining the dowry.

         जब विवाह के समय या पश्चात् कोई मेहर निर्धारित नहीं किया गया हो , या जब मेहर निर्धारित मूल्य से कम हो या मेहर की विषय - वस्तु ऐसी वस्तु हो जो मुसलमान के लिए हराम हो तो न्यायालय द्वारा उपर्युक्त सिद्धान्तों के आधार पर मेहर निर्धारित किया जायेगा । शिया विधि के अनुसार मेहर की धनराशि पाँच सौ दिरहम से अधिक नहीं हो सकती है । 


   ( 3 ) मुअम्जल मेहर ( Prompt Dower ) - मुअज्जल मेहर को तुरन्त देय मेहर भी कहते हैं । " तुरन्त देय " मेहर माँग पर देय होती है । इसकी मांग पत्नी किसी भी समय कर सकती है और इसे सम्भोग के पूर्व भी वसूला जा सकता है । यदि तुरन्त देय ' मेहर का भुगतान न किया गया तो पत्नी पति के साथ रहने से इन्कार कर सकती है और पति को मेहर कार्य से भी विरत कर सकती है । विवाह सम्भोग के पूर्व पति यदि पत्नी के विरुद्ध ' दाम्पत्याधिकारों के पुनर्स्थापन ' का वाद दायर करे तो बचाव में पत्नी " तुरन्त देय " मेहर की अदायगी न किये जाने की दलील कर सकती है और ऐसी दशा में वाद खारिज जो जायेगा ।


 राविया खातून बनाम मुख्तार अहमद ( आ . इ.रि. 1966 इलाहाबाद 548 ) के वाद में न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि यदि पति द्वारा दाम्पत्याधिकारों के पुनर्स्थापन का वाद विवाह सम्भोग के बाद चलाया जाता है तो उचित यह होगा कि तुरन्त देय मेहर के भुगतान की शर्त के साथ डिक्री पारित की जाय । 

When no dowry is fixed at the time of marriage or after it, or when the dowry is less than the prescribed value or the subject matter of the dowry is such thing which is haraam for a Muslim, the dowry shall be determined by the court on the basis of the above principles.  According to Shia law, the amount of dowry cannot exceed five hundred dirhams.



 (3) Muajjal Mehr (Prompt Dowry) - Muajjal Mehr is also called immediately payable Mehr.  "Immediately payable" mercy is payable on demand.  It can be demanded by the wife at any time and it can be recovered even before sexual intercourse.  If the 'mehr' due immediately is not paid, the wife can refuse to live with the husband and can also dissuade the husband from doing mehr.  If the husband files a suit for 'restoration of conjugal rights' against the wife before marriage, then in defense the wife can plead non-payment of dowry "due immediately" and in such a case the suit will be dismissed.



 In the case of Ravia Khatoon vs. Mukhtar Ahmed (A.I.R. 1966 Allahabad 548), it has been determined by the court that if the suit for restoration of conjugal rights by the husband is initiated after the marriage intercourse, it would be appropriate that the mehr payable immediately  decree be passed with a condition of payment of Rs.


( 4 ) मुबम्जल मेहर ( Defferred Dower ) - इसे स्थगित मेहर भी कहते हैं । यह मृत्यु या विवाह - विच्छेद द्वारा विवाह के समाप्त हो जाने पर अथवा करार द्वारा निर्धारित किसी निश्चित  घटना के घटित होने पर देय होता है । अमीर अली का मत है कि मुअज्जल मेहर की राशि  विवाह सम्बन्ध को पूर्ण रूप से पालन कराने के लिए अन्य मेहर की राशि से सामान्यतया अधिक होती है । चूंकि मुवज्जल मेहर मृत्यु या विवाह - विच्छेद द्वारा विवाह के विघटन पर देय होता से है । इसलिए पत्नी इस मेहर की माँग विवाह के विघटन के पूर्व सामान्यतया नहीं कर सकती न है । परन्तु यदि विवाह के विघटन के पहले उसके भुगतान किये जाने का कोई करार होता है या तो ऐसा करार मान्य और बन्धनकारी होता है । मुबज्जल मेहर में हित निहित ( Vested ) होता सकते हैं ।  किसी घटना के होने से वह विस्थापित नहीं किया जा सकता और उसकी मृत्यु से यह टल नहीं सकता और ऐसी स्थिति में उसके मर जाने पर भी उसके उत्तराधिकारी उसका दावा कर सकतें हैं।


  खर्चा - ए - पानदान    Kharcha - a - pandan  खर्चा - ए - पानदान ( Kharcha - a - pandan ) - मुस्लिम रीति - रिवाजों के अनुसार निकाह के बाद पत्नी को पति द्वारा एक धनराशि दी जाती है जिसका खर्च वह अपनी इच्छा से कर सकती है । उसे खर्च - ए - पानदान ( Kharch - i - Pandan ) कहा जाता है । इस प्रकार की प्रथा का प्रचलन उत्तरी भारत और विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश में पाया जाता है । इस प्रकार के पानदान खर्च के बारे में निकाह से पहले ही निर्धारण कर लिया जाता है कि यदि पति किसी माह ऐसा खर्च न दे पागे तो दूसरे माह उसे इकट्ठा पिछला धन देना पडता है। यदि इस संबंध में विवाद उत्पन्न हो जाए तो न्यायालय पति और पत्नी के परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का अवलोकन करके पानदान खर्च की धनराशि का निर्धारण कर देता है।


        वास्तव में खर्च पानदान संपन्न मुस्लिम परिवारों में पत्नी को दिए जाने वाला पान बीडे का खर्च है। इन्हें देने का करार पति-पत्नी का यदि आवश्यक हो तो उनके संरक्षक द्वारा विवाह के समय या बाद में किया जा सकता है तथा इसका भुगतान  पत्नी के दावे पर न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय होता है।


(4) Mubmjal Mehr (Defferred Dower) - It is also called deferred Mehr.  It is payable on the dissolution of the marriage by death or divorce or on the happening of a certain event stipulated by the agreement.  Amir Ali is of the opinion that the amount of Muazzal dowry is generally higher than the amount of other dowries to ensure complete observance of the marriage relationship.  Since Muwajjal Mehr is payable on dissolution of marriage by death or divorce.  That's why the wife cannot normally demand this dowry before the dissolution of the marriage.  Provided that if, before the dissolution of the marriage, there is an agreement as to its payment, either such agreement is valid and binding.  There can be vested interest in Mubjjal Mehr.  It cannot be displaced by the happening of some event and it cannot be set aside by his death and in such a situation even after his death his heirs can claim it.



 Kharcha-a-Pandan Kharcha-a-Pandan Kharcha-a-Pandan Kharcha-a-Pandan - According to Muslim customs, after Nikah, the wife is given a sum of money by the husband which she can spend as per her wish.  .  It is called Kharch-i-Pandan.  The prevalence of this type of practice is found in northern India and especially in Uttar Pradesh.  It is decided before the marriage that if the husband is not able to pay such expenses in a month, then he has to pay the accumulated previous money in the second month.  If a dispute arises in this regard, then the court determines the amount of Pandaan expenses after observing the social and economic condition of the families of husband and wife.



 In fact, the cost of betel leaves given to the wife in rich Muslim families is the cost of paan beeda.  The agreement to pay these can be made by the guardian of the husband and wife, if necessary, at the time of marriage or later and its payment is enforceable by the court on the claim of the wife.

 ( 1950 ) एस . सी . आर . 74


 [ 1 ]  ए . आई . आर . 1966 इलाहाबाद 548 

( 1916 ) 38 इलाहाबाद 581

 ( 1937 ) 65 आई . ए 119 




  1 ए . आई . आर 1937 लाहौर 345 

( 1886 ) 8 इला 149 

ए . आई . आर . 1980 इला 119 

मुस्मात फातमा बीबी बनाम जलालुद्दीन ( 1937 ) लाहौर 345

  ( 1960 ) पटना 511

अब्दुल कादिर बनाम मलीमा ( 1886 ) 8 इला 149 , 157

1950) S.  C .  R .  74



 [1] A.  I .  R .  1966 Allahabad 548


 (1916) 38 Allahabad 581


 (1937) 65 I.  A 119





 1 a.  I .  R 1937 Lahore 345


 (1886) 8 Ila 149


 A .  I .  R .  1980 Ela 119


 Musmat Fatma Bibi v. Jalaluddin (1937) Lahore 345


 (1960) Patna 511


 Abdul Qadir v. Maleema (1886) 8 Illa 149, 157

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