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मेरे खिलाफ FIR हो गई, अब क्या करूं? | BNSS Section 35, Arrest & Bail की पूरी जानकारी

आत्मरक्षा के अधिकार तथा संपत्ति की रक्षा के अधिकार कौन-कौन किस-किस प्रकार के होते हैं?( the right of private defence and defence of property)

संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार(Right of private defence of property ): भारतीय दंड संहिता की धारा 97 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की चल या अचल संपत्ति को  किसी ऐसे आपराधिक कार्य जो की चोरी डकैती सैतानिया आपराधिक अनाधिकार प्रवेश के अंतर्गत आते हो से या ऐसे कार्यों को करने के प्रयत्न से बचाने के अधिकार है ।


      भारतीय दंड संहिता की धारा 103 में उपबंधित किया गया है कि कब संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित  करने तक का होता है।



       संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार निम्नलिखित परिस्थितियों में मृत्यु कारित  करने तक विस्तृत हो जाता है


(1) लूट

(2) रात में गृह भेदन

(3) अग्नि द्वारा रिष्टि जो किसी ऐसे भवन तंबू या जलयान पर की गई हो जो कि मनुष्यों के आवास के रूप में या संपत्ति के स्थान के रूप में प्रयोग हो रहा हो।


(4) चोरी रिष्टि (mischief)  या गृह  अतिचार(house trespass) जो ऐसी परिस्थितियों में किया गया हो जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका हो कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार का प्रयोग ना किए जाने पर उसका परिणाम मृत्यु या भयंकर चोट होगा।


( धारा 103) पाटिल हरी मेघ जी व अन्य बनाम गुजरात राज्य के मामले में अभियुक्त मृतक को सबक सिखाने के लिए उसके घर पहुंचा उससे 1 माह पूर्व  अपराधी वैसा करने का संकेत दे चुका था जिसकी रिपोर्ट मृतक ने पुलिस में करवाई थी । उस मामले में अपराधी द्वारा किए गए प्रहार के तरीके और उस पर प्रहार के परिणाम से स्पष्ट होता है कि वह उस प्रकार व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार के लिए नहीं किया गया था। खास तौर पर धारा 300(11) में यह भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि आत्मरक्षा के लिए केवल उतनी ही चोट पहुंचाई जा सकती है जितनी की आवश्यक हो परंतु जब निहत्थे व्यक्ति पर बराबर प्रहार किए जाएं जब तक कि उसकी मृत्यु ना हो जाए। मृतक ऐसी असहाय स्थिति में हो कि वह अपना बचाओ भी नहीं कर पा रहा हो ऐसी स्थिति में अभियुक्तों को धारा 103 के अधीन संरक्षण नहीं मिल सकता है और वह मृत्यु दंड का अपराधी है।


       महावीर चौधरी बनाम बिहार राज्य के मामले में अभियुक्त की संपत्ति के विरुद्ध रिष्टि का अपराध कार्य किया गया। उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उसे प्रथम कोटि की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त है। परंतु जहां पर मृत्यु या घोर उप हानि कारित किए जाने की कोई आशंका ना हो वहां पर अभियुक्त ने इस अधिकार का अतिक्रमण किया ऐसा कहना ही उचित है अतः  अभियुक्त धारा 304 के प्रथम भाग के अधीन दोषी है।


अपवाद: जब कोई अपराध जिसके किए जाने या जिसके लिए किए जाने के प्रयत्न  के कारण निजी  प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया जाता है। यदि चोरी रिष्टि या आपराधिक अतिचार है तो उपयुक्त वर्णित  धारा 101 में उल्लेखित कोई अपराध ना हो तो उसके लिए निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार स्वेच्छा से मृत्यु किए जाने के लिए नहीं हो सकता किंतु उसका विस्तार धारा 99 में उल्लेखित प्रतिबंधों के अधीन दोष युक्त व्यक्ति की मृत्यु के अतिरिक्त कोई और हानि पहुंचाए जाने तक होता है।

( धारा 104)



         संपत्ति विषयक रक्षा के अधिकार का प्रयोग तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस बात का उचित निश्चित करने का दायित्व केवल अपराधी का ही होता है कि उसकी संपत्ति नष्ट होने या लूटे जाने इत्यादि की इतनी युक्तियुक्त आशंका थी कि आक्रमणकारी की मृत्यु कारित  करने या गंभीर चोट पहुंचाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। मामलों में इस धारणा की पुष्टि है।



वही सी चेरियन बनाम राज्य के  वाद में तीन मृतक व्यक्तियों ने कुछ अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर एक चर्च की निजी संपत्ति के बीच एक सड़क बनाई थी। उसके विरुद्ध न्यायालय में एक वाद लंबित था। इस रास्ते को रोक के उद्देश्य से चर्च से संबंधित तीन अभियुक्तों ने रूकावटें  खड़ी कर दी। जब तीनों मृतकों  ने इन रुकावटों  को हटाना प्रारंभ कर दिया तो तीनों अभियुक्तों के भेदन से उनकी मृत्यु हो कर दी गई। केरल उच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि चर्च ने लोगों को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त था पर इस सीमा तक नहीं की उन निहत्थे व्यक्तियों की जिनके द्वारा किया गया कार्य संहिता की धारा 103 के अंतर्गत नहीं पड़ता मृत्यु कारित  कर दे।


       उल्लेखनीय है कि धारा 104 के अंतर्गत संपत्ति के संरक्षण के लिए व्यक्ति को अतिचारी के खिलाफ निजी प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त है परंतु इस अधिकार का प्रयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब लोक पदाधिकारियों से सहायता प्राप्त करने के लिए समय उपलब्ध ना हो।



ईश्वर बेहरा बनाम राज्य के मामले में ग्राम वासियों ने अभियुक्त की भूमि में मकान निर्माण के लिए अतिचार किया था। इस पर आक्रमणकारियों को बलपूर्वक हटाने की नियत से अभियुक्त बिना लोक प्राधिकारियों  से सहायता लिए अपने साथियों को लेकर आया और अतिचारियों को चोटें पहुचायीं। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्त का निजी प्रतिरक्षा में किया गया कोई कार्य न्यायोचित था।


कंवर सेन बनाम  वीरसेन के मामले में जहां पीड़ित एक ऐसे पैदल चलने के रास्ते से होकर जा रहा था जो एक निजी खेत से होकर जाता था जब उसे उस खेत के सशस्त्र स्वामी और अन्य ने चुनौती दी तो उसने क्षमा याचना की और उन्हें यह विश्वास दिलाया कि भविष्य में वह ऐसा कभी नहीं करेगा। परंतु इसके बावजूद उन लोगों ने उसे बुरी तरह पीटा जिससे उसका एक हाथ टूट गया तो यह अभी निर्धारित किया गया कि धारा 104 लागू नहीं होती और अभियुक्त गण दोषी थे।


(1)(1988) क्रि. ला .ज .826

(2) ए.आई.आर. 1996सु. को. 1998


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