मिथ्या साक्ष्य देना(Perjury of giving false evidence): भारतीय दंड संहिता की धारा 191 में मिथ्या साक्ष्य देने के संबंध में यह प्रावधान किया गया है कि जब कोई व्यक्ति शपथ पूर्वक या कानून द्वारा किसी स्पष्ट उपबंध द्वारा सत्य कथन के लिए कानूनी तौर पर होते हुए भी या किसी मामले पर घोषणा करने के लिए कानून द्वारा बाध्य होते हुए भी ऐसा कथन करता है जो झूठा है और जिसके झूठ होने का उनको ज्ञान या विश्वास नहीं है या जिस की सत्यता पर उसे विश्वास नहीं है तो यह कहा जाता है कि उसने झूठ साक्ष्य दिया है।
स्पष्टीकरण(1) कोई कथन चाहे मौखिक हो या अन्यथा किया गया हो इस धारा के अर्थ के अंतर्गत आता है।
स्पष्टीकरण(2) अनुप्रमाणित करने वाले व्यक्ति के अपने विश्वास के बारे में मिथ्या कथन इस धारा के अंतर्गत आता है और कोई व्यक्ति है कहने से की बात को जानता है और विश्वास है जिस बात पर उसे विश्वास नहीं था यह कहने से की वह उस बात को जानता है जिस बात को वह जानता नहीं मिथ्या साक्ष्य देने का दोषी हो सकेगा।
आँग्ल विधि में मिथ्या साक्ष्य देने(giving false evidence ) का अपराध शपथ भंग के नाम से जाना जाता है। शपथ अथवा प्रतिज्ञान पर किया गया कथन तभी शपथ भंग का अपराध माना जाता है जब
(1) वह किसी न्यायिक कार्यवाही में किया गया है
(2) किसी सक्षम न्यायाधिकरण के समक्ष किया गया
(3) प्रश्न से तांत्विक संबंध रखता है
(4) मिथ्या है एवं
(5) कथन करने वाले को यह ज्ञात हो कि वह मिथ्या है
भारतीय दंड संहिता में इसी को मिथ्या साक्ष्य देने का अपराध कहा गया है।
मिथ्या साक्ष्य देने के आवश्यक तत्व
(1) किसी व्यक्ति का शपथ पर या अन्यथा सत्य कथन करने के लिए बाध्य होना: मिथ्या साक्ष्य देने का अपराध कारित होने के लिए किसी व्यक्ति का शपथ पर या विधि के किसी अभिव्यक्त उपबंध द्वारा सत्य कथन करने के लिए या किसी विषय पर घोषणा करने के लिए आबद्ध (bound ) होना आवश्यक है।
(2) मिथ्या कथन करना: इसका दूसरा आवश्यक तत्व मिथ्या कथन करना है । यह आवश्यक नहीं है कि जिस मामले में वह साक्ष्य दिया जाए उस मामले के लिए वह मिथ्या साक्ष्य महत्वपूर्ण हो । इस धारा के शब्द अत्यंत सामान्य है । और उनमें किसी प्रकार की सीमा निर्धारित नहीं की गई है कि दिया हुआ मिथ्या साक्ष्य उस प्रस्तुत मामले में प्रभाव कारी होना चाहिए ।
(3) ऐसे कथन के मिथ्या होने में विश्वास होना या सत्य होने में विश्वास नहीं होना तीसरा और अंतिम आवश्यक तत्व है:मिथ्या साक्ष्य देने वाले व्यक्ति का
(क) यह विश्वास होना चाहिए कि वह कथन मिथ्या है
(ख) इस बात में विश्वास नहीं होता कि वह सत्य है
उदाहरण (1) अ एक न्यायोचित दावे के समर्थन में जोकि क के विरुद्ध "ख" के ₹1000 लेने के लिए है किसी परीक्षण के दौरान शपथ पूर्वक मिथ्या कथन के करता है कि उसने "क" को "ख" के दावे का न्यायोचित होना स्वीकार करते सुना था। "अ" ने मिथ्या कथन किया ।
(2)"अ" एक दुभाषिया (Interpreter) या अनुवादक (Translator) है। वह किसी कथन या दस्तावेज के जिसकी शुद्ध व्याख्या या सही अनुवाद के लिए वह शपथ द्वारा बाध्य है ऐसी व्याख्या या अनुवाद को जो कि शुद्ध व्याख्या या अनुवाद नहीं है और जिसके यथार्थ होने का विश्वास नहीं करता यथार्थ भाषांतर या अनुवाद के रूप में देता है "य" प्रमाणित करता है।"अ" ने मिथ्या साक्ष्य दिया है।
(4) "क" शपथ द्वारा सत्य कथन करने के लिए आबद्ध होते हुए यह कथन करता है कि वह यह जानता है कि एक विशिष्ट दिन एक विशिष्ट स्थान में था जब तक कि वह उस विषय में कुछ भी नहीं जानता । "क" मिथ्या साक्ष्य देता है चाहे बतलाये हुये दिन या उस स्थान पर रहा हो या नहीं ।
उच्चतम न्यायालय ने एक वाद में यह अभिमत व्यक्त किया कि न्यायालय को मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध में अभियोजन की मंजूरी तब देनी चाहिए जब किसी महत्त्व के मामले में जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य दिया गया हो और उस मामले में न्यायालय द्वारा दोष सिद्धि का आदेश दिए जाने की पर्याप्त संभावना हो ।
(B) मिथ्या साक्ष्य निर्मित करना (Fabricating false evidence ): भारतीय दंड संहिता की धारा 192 के अनुसार जब कोई व्यक्ति इस आशय से किसी परिस्थिति को अस्तित्व में लाता है या किसी पुस्तक या अभिलेख में झूठी प्रविष्टि (false entry) करता है या मिथ्या कथन प्रकट करने वाले अभिलेख तैयार करता है जो कि ऐसी परिस्थिति में साक्ष्य रूप में रखी जाए तो मिथ्या प्रविष्टि या मिथ्या कथन को न्यायिक कार्यवाही में जो लोग सेवक के समक्ष उसकी वैसी स्थिति में या मध्यस्थ के समक्ष की गई है और इस प्रकार साक्ष्य में रखे जाने पर ऐसी परिस्थिति मिथ्या प्रविष्टि या मिथ्या कथन के कारण कोई व्यक्ति जिसे की ऐसी कार्यवाही में साक्ष्य के आधार पर राय कायम करनी हो तो उस कार्यवाही के परिणाम के लिए किसी बात के संबंध में भ्रम पूर्ण राय कायम करें तो यह कहा जाता है कि उसने मिथ्या साक्ष्य गढा है।
(धारा 192)
मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के तत्व(ingredient of the offense of fabricating false evidence ):
(1) किसी परिस्थिति को उत्पन्न करना जिसके अंतर्गत
(क) किसी पुस्तक या अभिलेख में मिथ्या प्रविष्ट करना
(ब) मिथ्या कानून युक्त अभिलेख बनाना
(2) वह कार्य इस आशय से करना कि वह
(क) किसी न्यायिक कार्यवाही में या
(ब) लोकसेवक या मध्यस्थ के समक्ष विधि द्वारा कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाए
(3) साक्ष्य इस आशय से दिया जाए कि भ्रमपूर्ण मत उत्पन्न करे।
(4) ऐसी कार्यवाही परिणाम के लिए किसी सारभूत विषय में भ्रम पूर्ण तथ्य बने।
उदाहरण(1) "अ" "ख" बॉक्स में अपने आभूषण इस आशय से रखता है कि बाद में वह "ख" को चोरी के अपराध में पकड़वा देगा । अ ने मिथ्या साक्ष्य निर्मित किया है।
(2)"अ" अपनी दुकान की बही में एक गलत प्रविष्टि इससे से रखता है कि बाद में वह 'ख' को चोरी के अपराध में पकड़वा देगा। 'अ' ने मिथ्या साक्ष्य निर्मित किया है।
(3) 'अ' 'ब' को एक आपराधिक षड्यंत्र के लिए दोष सिद्ध ठहराए जाने के आशय से एक पत्र 'ख' के हस्ताक्षर को अनुकृत करके लिखता है जिससे वह तात्पर्यित है कि "ब" ने उसे ऐसे आपराधिक षड्यंत्र के सह अपराधी के रूप में संबोधित किया है वह उस पत्र को ऐसे स्थान पर रख देता है जिस के संबंध में यह जानता है कि वह पुलिस अधिकारी संभाव्यता उस स्थान की तलाशी लेगें। "अ" ने मिथ्या साक्ष्य गढा।
(5)अहीलाल मण्डल के मामले में अभियुक्त ने एक महिला को विवाह में प्राप्त करने का असफल प्रयास किया तथा बाद में उस के पक्ष में एक भूखंड दहेज के रूप में उसे देने की बात का उल्लेख करते हुए एक मिथ्या रजिस्ट्री कृत दस्तावेज तैयार किया इस आशय से कि उसे आगे न्यायिक कार्रवाई में प्रस्तुत किया जा सके। यह धारण किया गया कि अभियुक्त धारा 192 के अंतर्गत अपराध का दोषी था।
मिथ्या साक्ष्य के लिए दंड: धारा 193 के अनुसार जो कोई किसी न्याय कार्यवाही के किसी प्रक्रम से साक्ष्य मिथ्या साक्ष्य देगा या किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उपयोग में लाए जाने के प्रयोजन से साक्ष्य मिथ्या साक्ष्य गढेगा वह 3 वर्ष तक के सादा या कठिन कारावास से दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
मिथ्या साक्ष्य देना तथा मिथ्या साक्ष्य गढने में अंतर:
(1) मिथ्या साक्ष्य देने का अपराध उस व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो शपथ द्वारा या विधि के किसी अभिव्यक्त उपबंध द्वारा सत्य कथन करने या किसी विषय के संबंध में घोषणा के लिए आबद्ध हो जबकि मिथ्या साक्ष्य गढने के लिए यह आवश्यक नहीं है।
(2)मिथ्या साक्ष्य देने के संबंध में यह आवश्यक नहीं है कि मिथ्या कथन किसी महत्वपूर्ण विषय के बारे में ही किया गया हो जबकि मिथ्या साक्ष्य गढने के मामले में मिथ्या गढा हुआ साक्ष्य किसी महत्वपूर्ण विषय के बारे में होना चाहिए।
(3) मिथ्या साक्ष्य देने के मामले में जिस प्राधिकारी के समक्ष मिथ्या साक्ष्य दिया जाये उस पर उसके प्रभाव का कुछ भी महत्व नहीं है ।जबकि मिथ्या साक्ष्य गढने के मामले में यह एक महत्त्वपूर्ण बात है।
(4) मिथ्या साक्ष्य दिये जाने के समय किसी कार्यवाही का होना आवश्यक है चाहे वह न्यायिक हो या न्यायिकेत्तर जबकि मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के समय यह आवश्यक नहीं है।
(5) मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए अभियुक्त का केवल सामान्य आशय होना पर्याप्त है जबकि मिथ्या साक्ष्य गढने के लिए अपराध में विशिष्ट आशय विद्यमान होना आवश्यक है।
(1) यस पी कोहली बनाम पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय एआईआर 1978 एस सी1753
(2) मीर इकरार अली का मामला (1880)6 कलकत्ता 482
(3) (1921) 48 कलकत्ता 911
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