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IPC की धारा 353 और BNS की धारा 132 लोक सेवकों की सुरक्षा से जुड़े कानून का पूरा विश्लेषण

.अल्पवयस्कों के लिये साधारण अपवादों के सम्बंध में क्या छूट दी गयी है ? (what exception has been made in favour of minors with respect to an offence under general exceptions .)

7 वर्ष से कम आयु के शिशु के कार्य:- भारतीय दंड संहिता की धारा 82  में यह कहा गया है कि कोई बाल अपराध नहीं है जो 7 वर्ष से कम आएगी शिशु द्वारा की जाती है।


           प्रस्तुत धारा का यह प्रावधान कि 7 वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा किया गया कोई कार्य अपराध नहीं माना जाएगा , इस मान्यता पर आधारित है कि 7 वर्ष से कम आयु का शिशु आपराधिक दुराशय के अभाव में अपराध करने के लिए अयोग्य (doli incapex) होता है। ब्लैक स्टोन का कहना है कि विवेक का निर्माण ना कर सकने वाली आयु के बालक को किसी भी अपराधिक विधि के अधीन दंडित नहीं किया जाना चाहिए।


         आँग्ल विधि में ऐसी आयु के शिशुओं को अपराध करने में असक्षम माना गया है जो अच्छाई बुराई के बीच अंतर स्थापित करने में असमर्थ हो।


        बाबू सेन बनाम सम्राट के मामले में यह स्पष्ट किया गया है कि धारा 82 के अंतर्गत 7 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपराधिक दायित्व से उन्मुक्त केवल दंड संहिता की धारा 82 के अंतर्गत ही नहीं  अपितु अन्य सभी स्थानीय तथा विशिष्ट विधियों के अंतर्गत भी उपलब्ध है।


      मार्ग बनाम लोडर के वाद में सात वर्ष से कम आयु के बालक ने परिवादी के परिसर से लकडी चुरायी अतः उसे पुलिस अभिरक्षा में रख दिया गया लेकिन उसके दायित्व की आयु(age of responsibility ) को ध्यान में रखते हुए उस बालक के विरुद्ध कोई आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सके।



श्याम बहादुर बनाम राज्य के मामले में 7 वर्ष से कम आयु के बालक को सोने की एक तस्तरी  पड़ी मिली , जिसकी उसने कहीं भी रिपोर्ट नहीं लिखवाई परंतु फिर भी उसके विरूद्ध कोई आयोजन नहीं चलाया जा सका।

7 वर्ष से अधिक किंतु 12 वर्ष से कम आयु के शिशु: कोई बात अपराध नहीं है जो 7 वर्ष से ऊपर और 12 वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा की जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह इस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सके।

                        (धारा 83)


इस प्रकार धारा 83 के अनुसार 12 वर्ष से कम आयु का और 7 वर्ष से अधिक आयु का शिशु जिसने परिपक्व बुद्धि प्राप्त है और जो अपने व्यवहार प्रकृति को समझ सकता है अपने कृत्य के लिए उत्तरदाई होता है।


(1) परमेश्वर बसुमातरी बनाम राज्य, 1989 क्रि. एल. जे.196 (गौहाटी)


(2) राजाराम बनाम राज्य 1977 क्रि.एल. जे.(ए. ओ. सी.)85 इलाहाबाद


(3) भूपेंद्र सिंह ए. चुडासामा बनाम गुजरात राज्य 1998 क्रि. एल. जे. 75 (ए.सी.)


(4) आई .एल .आर. रंगून 400


(5)(1963) 14 सी.बी.एन. एस. 536




धारा 83 के प्रावधान इस मान्यता पर आधारित है कि 7 वर्ष से 12 वर्ष के बीच आयु के सभी बच्चों का मानसिक विकास इतना नहीं हो पाता कि वे अपने कृत्यों के भले बुरे परिणामों के बारे में ठीक  सोच समझ सकें । अतः इनके आपराधिक दायित्व का निर्धारण न्यायाधीश मजिस्ट्रेट के न्यायिक विवेक पर निर्भर करता है जो मामले की परिस्थितियों तथा अपराधी बालक के मानसिक विकास के आधार पर यह निर्धारित करता है कि उसमें अपने कृत्य के परिणामों के बारे में ठीक समझने की क्षमता है अथवा नहीं।


     सरल शब्दों में धारा 83 में यह उल्लेख है कि यदि बालक या बालिका की आयु 7 वर्ष से अधिक लेकिन 12 वर्ष से कम हो और वह अच्छे बुरे का भेद समझने में  असक्षम हो तो उसे आपराधिक दायित्व से उन्मुक्ति दी जा सकेगी।


उदाहरण: एक 10 वर्ष का बालक ₹5 मूल्य का पेन चुराकर ₹2 में उसी आदमी को बेच देता है। इस मामले में बालक को इस बात का ज्ञान था कि पेन की कीमत कितनी है और चोरी होने के कारण उसको इसका कम मूल्य मिला है अर्थात उसने यह कार्य कार्य की प्रकृति और परिणाम को जानकर ही लालचवश  किया है।अतः  वह दंड का भागीदार है।


(1) ए.आई.आर. 1967 , पटना, B12


(2) 1948 क्रि.एल.जे.336


(3)1950 कटक 293

(4) 1917 क्रि एल. जे. 943


अब्दुल सत्तार के मामले में 12 वर्ष से कम आयु के अभियुक्त गणों ने एक दुकान का ताला तोड़कर दालों की चोरी की। उन्हें इस आधार पर दोषी ठहराया गया कि वह अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सकते थे। उल्ला महापात्रा के मामले में अभियुक्त 11 वर्ष से अधिक पर 12 वर्ष से कम आयु का बालक था। वह मृतक की ओर इस हावभाव के साथ दौड़ा की वह उसे टुकड़े-टुकड़े कर देगा और उसने ऐसा ही किया। न्यायालय ने उसे सिद्ध दोष ठहराते हुए 5 वर्ष के लिए सुधारालय में भेज दिया। नगा टैन कैंग के मामले में 12 वर्ष से कम आयु के बालक को बलात्संग के प्रयत्न  के लिए दोषी ठहराया गया।






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