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प्रादेशिक प्रभुसत्ता क्या होती है?(what is the Territorial sovereignty ?)

प्रादेशिक प्रभुसत्ता(Territorial Sovereignty ): राज्य की सबसे बड़ी विशेषता उसके पास सर्वोच्च सत्ता का होना है। जिसके आधार पर कोई राज्य व्यवस्था और शांति स्थापित रखने और कानूनों का पालन कराने में समर्थ होते हैं। इसी को प्रादेशिक प्रभुसत्ता कहते हैं। प्रादेशित प्रभुसत्ता के अंतर्गत राज्य को अपने प्रदेश में विद्यमान व्यक्तियों पर तथा संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होता है। किसी बाहरी राज्य के लोगों पर कोई अधिकार नहीं होता।यह विचार दीवानी कानून के वैयक्तिक संपत्ति पर स्वामित्व की कल्पना से ग्रहण किया गया है।

मैक्स ह्यबर(Max Huber) ने Island of palinas Arbitration नामक मामले में प्रादेशिक प्रभुसत्ता के लक्षण का दर्शन करते हुए कहा था कि राज्यों के संबंध में प्रभुसत्ता का अर्थ स्वतंत्रता है। भूमंडल के एक भाग में स्वतंत्रता का आशय यह है कि यहाँ  केवल मात्र राज्य को राज्य संबंधी कार्य करने का अधिकार है ।


      Sovereignty in relation between States signifies independence regard to a position of the globe the right to exercise there in to the exclusion of any other state, the function of a state.

                          (max huber)



       प्रादेशिक प्रभुसत्ता को अविभाज्य कहना सत्य नहीं है। राज्यों में यह सत्ता दो राज्यों में बटी होती है। इसी प्रकार पट्टे(on lease) पर दिए गए देस के संबंध में भी यही स्थिति होती है। उदाहरण के लिए चीन ने रूस, फ्रांस ,जर्मनी ,ग्रेट ब्रिटेन को अपने कई प्रदेश पिछली शताब्दी के अंत में पट्टे पर दिए थे। 1940 में 50 पुराने विध्वंसक पोतों के बदले ग्रेट ब्रिटेन ने संयुक्त राज्य अमेरिका को अनेक सैनिक और असैनिक अड्डे 99 वर्ष के पट्टे पर प्रदान किए थे। ऐसे प्रदेशों को दोनों राज्यों की प्रभुसत्ता प्राप्त होती है। कई बार ऐसी सत्ता अनेक  राष्ट्रों से बने संगठन के पास न्यास या अमानत के रूप में होती है। उदाहरण के लिए के लिए संसार का प्रशासन राष्ट्र संघ के पास था लेकिन फिर भी स्थल रूप से राज्यों की अपने प्रदेशों पर पूर्ण प्रभुसत्ता होती है।

सीमा(Its Extent): राज्य द्वारा प्रभु सत्ता उपयोग एक नियमित और मर्यादित सीमा तक होता है, जो निम्नलिखित होती है

(1) प्राकृतिक सीमाएं(Natural Boundaries ): किसी राज्य की प्राकृतिक सीमा का निर्धारण नदियों, पर्वतों,झीलों , महा स्थलों और समुद्र तट से होता है। जैसे भारत और पाकिस्तान की भौगोलिक सीमा का निर्धारण पंजाब में रांची नदी है। भारत और चीन की सीमा से दूसरा तात्पर्य प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमा से है जहां तक की सुरक्षा की दृष्टि से राज्य अपना विस्तार करना आवश्यक समझता हो। मार्शल कोश का कथन था कि फ्रांस की प्राकृतिक सीमा का अंत राइन नदी है। इसी प्रकार विंसेंट स्मिथ ने हिंदू कुश पर्वत को भारत का उत्तरी भाग का है।

(2) कृत्रिम सीमाएं(Artificial Boundaries ): कृतिम सीमाएं 2 देशों को विकसित करने वाली काल्पनिक रेखाएं होती हैं जिनका निर्धारण दीवारों स्तंभों इत्यादि के माध्यम से किया जाता है। कभी-कभी यह कार्य अक्षांश रेखाओं से किया जाता है। जैसे उत्तरी और दक्षिणी कोरिया की सीमा 38वीं  उत्तरी अक्षांश और संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा की सीमा 19वीं उत्तरी अक्षांश रेखा है।

         कृत्रिम सीमाओं का निर्धारण करना बड़ा कठिन होता है। नदियों पर सीमांकन कैसे किया जाए पहाड़ी पर सीमा विभाजन कैसे हो तथा समुद्री क्षेत्र पर सीमा किस प्रकार निर्धारित हो। यह सब प्रश्न बड़े जटिल होते हैं परंतु इन सब का निर्धारण को सिद्धांत के आधार पर किया जाता है जैसे सन 1914 में हुए शिमला सम्मेलन में भारत तिब्बत सीमा का निर्धारण मैक मोहन रेखा(Mac Mohan Line) के सिद्धांत पर के आधार पर किया गया था।


     प्रकृति(Nature ): प्रदेश राज्य की वह संपत्ति सार्वजनिक होती है जिस पर वह अपनी प्रभुसत्ता का प्रयोग करता है। राज्य भी ऐसी प्रभुसत्ता पर कोई बाहरी राज्य या शक्ति  अंकुश नहीं लगा सकती है। अलबत्ता यही राज्य चाहे तो अपनी प्रभुसत्ता को दूसरे राज्य को सौंप सकता है अपने प्रदेश के किसी भाग पर किसी अनुबंध के कारण और निश्चित शर्तों के आधार पर दूसरे राज्यों को प्रशासन करने और उनकी प्रभुसत्ता का प्रयोग करने की अनुमति दे सकता और ऐसी स्थिति में उस प्रदेश पर मूल राज्य(original state ) की सहमति से बाहरी राज्य प्रशासन कर सकता है। उदाहरण के लिए साइप्रस के द्वीप(Island of cypres) पर मूलराज Turkey सहमति से ब्रिटिश सरकार का सन 1878 और 1944 में शासन रहा। स्वामित्व रखने वाला राज्य अपने प्रदेश को पट्टे पर देने या छोड़ देने या परिवर्तन करने के लिए स्वतंत्र होता है।


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