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पत्नी ने मायके में आत्महत्या की तो पति पर कौन-सी धारा लगेगी?

अंतर्राष्ट्रीय विधि के प्रमुख स्रोत क्या होते हैं? What is the various sources of international law?

स्टार्क के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोत से हमारा अभिप्राय उस वास्तविक सामग्री से है जो अंतर्राष्ट्रीय विधि शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों के नियम निर्मित करने के लिए प्रयोग करता है ।अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्त्रोतों  से तात्पर्य उन तरीकों तथा प्रक्रियाओं से है जिनके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय विधि का जन्म होता है। विधि के स्रोत उन विशिष्ट नियमों से संबंधित होते हैं जिनसे प्रणाली बनती है तथा उन प्रक्रियाओं से संबंधित होते हैं जिनसे नियमों की पहचान विधि के नियमों के रूप में होती है। अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्त्रोत अंतर्राष्ट्रीय विधि के आधार से भिन्न होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय विधि का आधार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सामान्य सहमति होती है।


अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोतों को हम निम्नलिखित भागों में विभाजित कर सकते हैं:

(1) अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय( international convention)

(2) अंतर्राष्ट्रीय प्रथाएं( international customs)

(3) सभ्य राष्ट्रों द्वारा स्वीकृति विधि के सामान्य नियम( general principle of law organised by civilized Nations)

(4) न्यायाधिकरियों एवं न्यायालयों के निर्णय( decision of judicial or arbitral tribunals)

(5) न्यायाधिकारियो अथवा न्यायशास्त्रियों एवं भाष्यकारों की रचनाएं(justice works )


(6) अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंगो का निर्णय

    अब तक प्रत्येक स्रोत की अलग-अलग विवेचना करेंगे।

(1) अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय( inter national conventions): आधुनिक युग में जबकि अंतर्राष्ट्रीय विधि अपने विकसित रूप में है, अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों( इनमें सभी प्रकार की अंतरराष्ट्रीय संधियां  सम्मिलित हैं) का अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोतों में सर्व प्रथम स्थान है। वियाना अभिसमय के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संधियां वे करार हैं जिनके द्वारा दो या दो से अधिक राज्य अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत आपस में संबंध स्थापित करते हैं। संधियां  अंतर्राष्ट्रीय विधि की सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है।

      राष्ट्रीय संधियां  निम्नलिखित दो प्रकार की हो सकती हैं:

(1) विधि निर्माण करने वाली संधियां( love making treaties)

(2)संविदा संधियां (treaty contract)

(1)विधि निर्मात्री संधियां (law making treaties): विधि निर्माण करने वाली संधि के प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय विधि के प्रत्यक्ष स्रोत है। विधि निर्माण करने वाली संधियों की वृद्धि 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में होने लगी और उनको अंतरराष्ट्रीय विधायन( international legislation) के समान माना जाने लगा। इनका उद्देश्य राज्यों द्वारा किन्ही विषय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए जैसे किसी मामले में नियम निर्धारित करना या किसी प्रचलित कानूनों का भावी स्वरूप निश्चित करना अथवा आचार विचार के लिए कोई नया कानून बनाना होता है। उदाहरण के लिए रेडक्रॉस कार्य( red Cross work) दास प्रथा का दमन( suppressions of slave trade ), आकाश यातायात( aerial navigation) और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों( international water works) इत्यादि विषयों पर जो संधियां  हुई उनसे अनेक  अंतरराष्ट्रीय कानूनों का जन्म हुआ।

विधि निर्माण संधियां  भी निम्नलिखित दो प्रकार की होती है:

(क) वे संधियां  जो सार्वभौमिक अंतर्राष्ट्रीय विधि का निर्माण करती है जैसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर।

(ख) सामान्य सिद्धांतों का निर्माण करने वाली अंतरराष्ट्रीय संधियां । इन संधियों में वेस्टफालिया की संधि(1948),1899 तथा 1907 के हेग अधिसमय ,जेनेवा अभिसमय ,वियना अभिसमय इत्यादि अंतरराष्ट्रीय संधियों ने अंतर्राष्ट्रीय विधि में अपना महत्वपूर्ण स्थान स्थापित कर लिया है। आधुनिक युग में अधिकतर अंतरराष्ट्रीय विधि अंतरराष्ट्रीय संधियों के रूप में है।


            संविदा  संधियां दो या दो से अधिक राष्ट्रों के बीच में होती है तथा उनके प्रावधान उन्हीं राज्यों पर लागू होते हैं जो कि उनके पक्षकार होते हैं। इन संधियों के प्रावधान संबंधित पक्षकारों पर बंधन कारी रूप से लागू होते हैं। इस प्रकार की संधि का सबसे उत्तम उदाहरण अपराधियों के प्रत्यारोपण( extradiction of offenders) का मामला है जिसके कारण प्रत्यार्पण के विषय में कई महत्वपूर्ण नियम बने। इस प्रकार की संधियां भी अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत हैं तथा इनके द्वारा प्रथा संबंधी नियमों का विकास होता है।

              यदि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय को किसी विशेष मामले में प्रतिवादी राज्य किसी द्विपक्षीय संधि की मान्यता देते हैं, तो न्यायालय द्वारा इसे लागू किया जाएगा। यह उल्लेखनीय है कि सभी संधियां सामान्य तथा विशिष्ट संविदा कारी पक्षकारों पर बाध्यकारी होती हैं। तथापि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उनकी भूमिका भिन्न-भिन्न है।


(2) अंतर्राष्ट्रीय प्रथाएं( international customs): सदियों से अंतर्राष्ट्रीय प्रथाएं अंतर्राष्ट्रीय विधि का स्रोत मानी जाती नहीं है। केवल आधुनिक युग में ही अंतर्राष्ट्रीय विधि का संधियों द्वारा विकास होने के कारण उसका महत्त्व कम हो गया है। परंतु आज भी अंतर्राष्ट्रीय विधि के महत्वपूर्ण स्रोतों में इसे माना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय  विधि के प्रथा संबंधी नियम वे नियम है जिनका विकास लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया द्वारा हुआ है। वाइनर के अनुसार प्रथाएं एक ऐसा चलन है जिसको विधि शक्ति प्राप्त हो गई हो।"( A custom in the intendment of loss is such a usage as both obtained the force of law)


      According to Savigny के अनुसार रीति-रिवाजों अथवा प्रथाओं  द्वारा ही सबसे पहले विधि का जन्म हुआ। अतः इसको अंतर्राष्ट्रीय विधि का भी प्रमुख स्रोत माना जाना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय रीति रिवाज हो बल्कि जिस रीति रिवाज को अंतरराष्ट्रीय मामलों के संबंध में विभिन्न राज्यों ने स्वीकार किया हो और जिनका प्राचीन स्वरूप हो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय विधि का अंग माना जाएगा। आजकल लोग प्रथाओं को घोषणात्मक(Declaratory ) मानते हैं न ना कि सृजनकारी(Constitutive)। प्रथाओं को  अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोत के रूप में मान्यता मिलने का कारण  अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के परिनियम की धारा 38 है जिसमें अंतरराष्ट्रीय प्रथा और परंपरागत रूप में चिरकाल से चली आने वाली  प्रथा को कानूनी रूप में साक्षी के रूप में स्वीकार किया गया है। उदाहरण के लिए प्रत्यार्पण।


        जब कोई राज्य अपने किसी अधिकार को जताता है तथा अन्य राज्य इस संबंध में मौन सहमति प्रदान करते हैं तो उन राज्यों द्वारा जताए गए अधिकार को प्रथा संबंधी विधि की मान्यता प्राप्त हो जाती है। उक्त अधिकार को जताए जाने के अतिरिक्त किसी मानसिक तत्व की आवश्यकता नहीं होती।

            अंतर्राष्ट्रीय विधि में प्रथा के महत्व का मुख्य कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि एक भी केंद्रीय प्रणाली के अंतर्गत लागू होती है। अंतर्राष्ट्रीय समाज  सुसंगठित नहीं है। इनमें संसद आदि नहीं है जो राज्यों के लिए विधि निर्मित कर सकें। शक्तिशाली विधायनी अंग के अभाव में विधि निर्माण करने का कार्य कुछ अंशों में प्रथाओं  अथवा रीति रिवाज और द्वारा होता है।


(3) सभ्य राष्ट्रों द्वारा स्वीकृति विधि के सामान्य नियम( general principles of law recognised by civilized States): सभ्य राष्ट्रों द्वारा स्वीकृति सामान्य सिद्धांत से हमारा अर्थ  उन सामान्य नियमों से है जिनको करीब-करीब सभी सभ्य राष्ट्रों ने स्वीकृत करके मान्यता प्रदान की है। लॉर्ड मैक नायर(Lord Mc Nair)के अनुसार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय भी संविधान का अनुच्छेद 38(1)(c) विधिक सिद्धांतों का एक ना समाप्त होने वाला स्रोत वर्णित करता है जिससे न्यायालय सहायता ले सकता है।"( article 38, paragraph (1)(c) of the statute of the international Court of Justice place on record one of the main sources of the rules of public international law. It describes the inexhaustible reservior of legal principles from which the tribunals can enrich and develop public international law)"


    According to fascet के अनुसार विधि के सामान्य सिद्धांत वह नियम का स्तर है जिन्हें विधि की विकसित प्रणालियों के व्यवहार में इस कारण बार-बार दोहराया जाता है क्योंकि या तो उनकी एक सामान्य उत्पत्ति है जैसे रोमन विधि या इस कारण कि वह मानव समुदाय की मूल आवश्यकताओं का उत्तर है। पैक्टा संट सर्वेंडा(Pacta sunt servanda) त्रुटि  से हुई क्षति का मुआवजा देने का सिद्धांत ,आत्मरक्षा का सिद्धांत, यह सिद्धांत की कोई व्यक्ति अपने ही मामले में स्वयं न्यायधीश नहीं हो सकता है तथा निर्णय देने वाला व्यक्ति को दोनों ओर से पक्षकारों को सुनना चाहिए इसके उदाहरण हैं।

         सभ्य राष्ट्रों द्वारा स्वीकृति विधि के सामान्य नियमों से संबंधित प्रमुख वाद निम्नलिखित है:

(क)रेग बनाम केन(Rag vs.Keyn): इस वाद में यह मत प्रकट किया है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि न्याय(justice ),साम्य(Equity ), सुविधा(Convenience) तथा संबंधित विषय के तर्क पर आधारित है जो लंबे समय के व्यवहार द्वारा मान लिया गया है।

(ख) संयुक्त राष्ट्र बनाम स्कूनर(United states vs.Schooner): इस वाद में न्यायाधीश स्टोरी ने दास विषय में यह विचार प्रकट किया है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि को व्यक्तियों के अधिकार तथा न्याय के सामान्य सिद्धांतों पर आधारित किया जाना चाहिए
(ग)म्यूज जल के मार्ग में परिवर्तन संबंधी वाद(Meuse Diversion of waters Case): स्थाई अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने म्यूज(meuse) जल के मार्ग में परिवर्तन के संबंध में राष्ट्रों की विधि के प्रचलित नियमों ,प्राड्न्याय(Res judicata)और विबन्धन(Estoppel ) के नियमों का प्रयोग किया है।

(घ) कारजो फैक्ट्री वाद(Chorzow factory Case): इस वाद  में स्थाई अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने प्राड्न्याय के सिद्धांत को लागू किया था  तथा की कहा कि किसी नियम के उल्लंघन होने पर उल्लंघन करने वाला क्षतिपूर्ति देने का उत्तरदाई है।


(4) न्यायाधिकारियों एवं न्यायालयों के निर्णय(Decisions of judicial or Arbitral tribunals): अंतर्राष्ट्रीय विधि के विकास में न्यायिक निर्णयों (judicial decisions )ने भी बड़ा योगदान दिया है जिसके कारण उनको इस विधि के स्रोत के रूप में माना जाता है। इन अंतरराष्ट्रीय न्यायिक अधिकरणों या पंचायती अदालतों में निर्णय इस प्रकार से प्रथा के रूप में नहीं लागू हो सकते जैसे कि इंग्लैंड में पूर्ण निर्णय(Precedent) न्यायालयों द्वारा लागू किए जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के लिए यह अनिवार्य नहीं कि वह अपने पहले कभी दिए गए निर्णयों का अनुसरण करें। वास्तविकता तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय अंतर्राष्ट्रीय विधि को अपने ढंग से विकसित करने के संबंध में अपने आप को स्वतंत्र समझता है जिसके कारण इस न्यायालय को स्थाई रूप से प्रदान होता है पहले एक स्थाई अंतरराष्ट्रीय न्यायालय( permanent Court of international justice) या जिसको अब बदलकर अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत( international Court of Justice) का रूप दिया है।


        विभिन्न देशों में विकसित वैयक्तिक कानूनों के कुछ अंश अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के परिनियम(Statute) की धारा से इनको अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोत के रूप में तीसरा स्थान दिया गया है। यह बात सत्य है कि अंतरराष्ट्रीय विधि के मुकाबले वैयक्तिक कानून कहीं अधिक विकसित है सुनिश्चित  और स्पष्ट है।अतः जहां कहीं स्पष्ट नियम नहीं मिल पाते हैं इन कानूनों के लिए सामान्य सिद्धांतों( general principles) का सहारा लिया जाता है। उदाहरण के लिए कानून के विकास की प्रारंभिक अवस्था में रोमन कानून सिद्धांत के रूप में ग्रहण किए और वह प्रक्रिया अभी जारी है।


       सर रार्बट फिलीमोर (Sir Robert Philimore) ने Revs ,Keyn के मामले में निर्णय देते हुए लिखा था कि राष्ट्र का कानून न्याय, निष्पक्षता, सुविधा और बुद्धि पर आधारित है। जर्मनी और पुर्तगाल के विवाद में Mazina और Naulia के मामले में विशेष पंचायती न्यायालय ने कानून के सामान्य सिद्धांतों को लागू किया था।


(5) न्यायविदों के ग्रन्थ (Works of justice ): अंतरराष्ट्रीय विधि के मर्मज्ञों की रचनाएं और समीक्षाएं भी इसके विकास का स्रोत बनी हैं। ग्रोशियस(,Grotious) ,वैटल(Vetiel), सोरेज इत्यादि के ग्रंथों ने अंतर्राष्ट्रीय विधि के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय भी विवादों को निपटाने के लिए विभिन्न देशों के विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विधिशास्त्रियों के विचारों और सिद्धांतों को महत्वपूर्ण स्थान देता है।



           इस संबंध में न्यायधीश ग्रे(Justice Gray)ने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं जहां कोई संधि ना हो और ना ही व्यवस्थापिका कार्यों तथा न्यायिक निर्णयों पर नियंत्रण के लिए कोई कार्यपालिका हो वहां सभ्य  देशों की प्रथाओं और रीति-रिवाजों को उन विधिवेक्ताओं और समीक्षकों के कार्यों को जिनमें उन्होंने वर्षों के अनुसंधान और अनुभवों  के आधार परविशेष रूप से जानकारी प्राप्त की हो साक्ष्य  के रूप में माना जाना चाहिए ।


           जहां तक न्यायिक ग्रंथों का संबंध है वे  अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत ना होकर उसके नियमों पर प्रकाश डालने वाले और उसके निर्णय में सरलता पैदा करने वाले साधन मात्र हैं अर्थात वे साक्षी प्रस्तुत करने के साधन है।


(6) अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंगों के निर्णय( decisions of determinations of the organs of international institutions):
आधुनिक युग में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंगों के निर्णय भी अंतर्राष्ट्रीय विधि के विकास में सहायता पहुंचाते हैं। अतः वे अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत हैं। स्टार्क के मत में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंग निम्नलिखित तरीके से अंतर्राष्ट्रीय विधि का विकास कर सकते हैं:

(क) अपने संवैधानिक मामलों में इस प्रकार के निर्णय प्रथा  संबंधी नियमों(Customary Rules ) के विकास में माध्यमिक या अंतिम कदम होते हैं। उदाहरण के लिए संयुक्त राष्ट्र के अंग सुरक्षा परिषद का यह निर्णय है कि यदि कोई सदस्य सुरक्षा परिषद की बैठक में अनुपस्थित रहता है तो उसे विशेषाधिकार नहीं समझा जाएगा।

(ख) अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंगों के प्रस्ताव आंतरिक कार्यों के लिए जो सिद्धांत या नियम प्रतिपादित करते हैं वह संबंधित संस्थाओं के सदस्यों पर बंधनकारी प्रभाव रखते हैं।

(ग) अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंग स्वयं इस बात का निर्णय करते हैं कि उनके समर्थक या छमता की क्या सीमा है।

(घ) कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंग अपने संविधान संबंधी संलेख के विभिन्न प्रावधानों का निर्वचन(Interpretation ) कर सकते हैं जिनकी प्राकृति बंधनकारी होती है। यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विधि का एक भाग हो जाता है।

(ड) कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंगों को अधिकार प्राप्त है कि वह सामान्य रूप से अर्द्ध विधायनी या अर्ध निर्णय दे। इस प्रकार के उदाहरणों में यूरोपीय आर्थिक समुदाय के निर्णय उल्लेखनीय है।

(च) कुछ विशेष मामलों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अंग संबंधित मामलों पर विधि जानने के लिए ऐसे मामलों को विधिशास्त्रियों की समिति को सौंप देते हैं जिनके मत का काफी मूल्य होता है तथा इस प्रकार के मत अंतरराष्ट्रीय प्रथा संबंधी नियमों के विकास में सहायक होते हैं।





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