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अंतर्राष्ट्रीय विधि के दृष्टिकोण से राज्यों का वर्गीकरण कैसे करते हैं।( explain the classification of state for the purpose of international law)

राज्य की सबसे बडी विशेषता होती है उसको  अपने आंतरिक वाह्य  मामलों में पूर्ण स्वतंत्रता। परंतु प्रत्येक राज्य इस प्रकार की स्वतंत्रता का उपभोग नहीं करता।

           राज्यों का वर्गीकरण इस बात पर निर्भर करता है कि उनको कितनी और किस सीमा तक स्वतंत्रता प्राप्त है। अतः उन्हें अंतर्राष्ट्रीय विधि के उद्देश्य से निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है:

(1) पूर्ण  प्रभुत्व संपन्न और स्वतंत्र राज्य(Independent states)

(2) परतंत्र अंतरराष्ट्रीय राज्य(Dependent States )

(3) संयुक्त अंतरराष्ट्रीय राज्य(composite international states)

(4) वास्तविक संघ(Real Union )

(5) व्यक्तिगत संघ(Personal union )

(6) बहुमंडलीय राज्य(Confederation States )

(7) वंशवर्ती राज्य(vassal States )

(8)संरक्षित राज्य (Protectorate States )

(9)राष्ट्र मण्डल (Common Wealth of Nations)

(10)तटस्थकृत राज्य (Neutralized States )

(1)स्वतंत्र राज्य (Independent States ): अंतर्राष्ट्रीय परिवार का सदस्य वही माना जाता है जो प्रभुसत्ता संपन्न हो अपने आंतरिक तथा बाह्य मामलों में निपटने में पूर्ण सक्षम हो।उदाहरण के लिये अमेरिका और फ्रांस इत्यादि यह सभी देश कानूनी रूप से पूर्व अंतरराष्ट्रीय वैधानिक व्यक्तित्व(Full International Personality) रखते हैं। अपने राजदूत भेजने ,युद्ध करने,संधियां करने और घरेलू मामलों में निपटाने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र होते हैं।

(2)परतन्त्र राज्य (Dependent States ): परतंत्र राज्य पूर्ण स्वतंत्र नहीं होते हैं। इन राज्यों की स्थिति संधियों द्वारा तय होती है। यद्यपि कभी-कभी यह राज्य अपने आंतरिक मामलों में स्वतंत्र होते हैं। उदाहरण के लिए भारत वर्ष सन 1947 से पहले राजनीतिक रूप से स्वतंत्र ना होने पर राज्य संघ का सदस्य था। परतंत्र राज्यों को अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय माना जाए अथवा नहीं इस विषय पर मतभेद है। ओपेनहाइम परतंत्र राज्यों को अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय वस्तु नहीं मानते जबकि वेल्टलोक मानते हैं।


    संयुक्त अंतरराष्ट्रीय राज्य(Composite International States ): राज्य को प्रायः  एक अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व(International Personality) माना जाता है जिसमें एक ही सत्ता और सरकार होती है। कभी-कभी दो या अधिक राज्य एक दूसरे से इस प्रकार संबंद्ध  होते हैं कि वे एक ही राज्य प्रतीत होते हैं। इस प्रकार के राज्य निम्नलिखित  रूपों में होते हैं:

(अ) वास्तविक राज्य(Real Union ): जब दो संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राज्य एक संधि द्वारा किसी एक सत्ताधारी के अधीन होते हैं और अन्य देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यक्ति का रूप धारण कर लेते हैं तो वास्तविक संघ(Real Union ) कहलाता है। ऐसे राज्य अपने घरेलू और आंतरिक मामलों में स्वतंत्र होते हैं। परंतु विदेशी नीति और कार्यों के लिए एक राज्य के समान ही कार्य करते हैं।उदाहरण के लिए हम नार्वे और स्वीडन का उल्लेख कर सकते हैं जिनका सन 1814 से 1905 तक एक ही राजा के नीचे ही एकीकारण हुआ। डेनमार्क और स्वीडन का इसी प्रकार का एकीकरण सन् 1944 तक चला।


(ब) व्यक्तिगत संघ(Personal Union ): जब दो प्रभुत्व संपन्न और अंतर्राष्ट्रीय विधि के दृष्टिकोण से स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाले राज्य किसी आकस्मिक घटना के कारण एक ही सत्ताधारी के अधीन हो जाते हैं तो वह व्यक्तिगत संघ(Personal union ) कहलाता है। ऐसे राज्य अपने बैदेशिक मामलों में अपना पृथक अस्तित्व रखते हैं। उदाहरण के लिए सन 1814 से 1837 तक ग्रेट ब्रिटेन और हनोवर में इस प्रकार का व्यक्तिगत संघ रहा है। इसी प्रकार बेल्जियम और कांगो की स्टेट से 1885 से 1909 तक रहा है।

(स)बहुराज्य मण्डल (Confederation ): जब कुछ प्रभुत्व  संपन्न राज्य किसी संधि द्वारा किन्हीं विशेष प्रयोजनों के लिए आपस में इस प्रकार से संयुक्त  हो जाते हैं कि उनकी प्रभुसत्ता तो बनी रहे परन्तु उन पर विशेष कार्यों के संपादन के लिए संघ बन जाए तो बहुराज्य मंडल(Confederation ) कहते हैं। उदाहरण के लिए सन 1815 में वियाना कांग्रेस ने 38 प्रभुसत्ता संपन्न राज्यों का जर्मन बहु राज्य मंडल(German Confederation ) बनाया जिसका मुख्य अंग डायट(Deit) नामक सभा की जिसके सभी राज्य अपने प्रतिनिधि भेजते थे।

(द)वंशवर्ती राज्य या सामन्त राज्य (Vassal States ): कोई राज्य जब किसी अधिश्वर(suzerain) के पूर्ण नियंत्रण में हो तो वंशवर्ती या सामंती राज्य कहते हैं। इनकी स्वतंत्रता बहुत मर्यादित और सीमित होती है। अतः अंतर्राष्ट्रीय विधि के दृष्टिकोण से इनका कोई विशेष महत्व नहीं होता। ऐसे राज्य का उदाहरण सन1815 कि भारत और नेपाल की संन्धि थी जिसके अनुसार नेपाल को सामंती स्वरूप प्रदान किया गया था और उसके बाह्य विषय भारत सरकार को सौंप दिये गये। इसी ब्रिटिश काल में हैदराबाद और कश्मीर की रियासतें भी जिनको यद्यपि आंतरिक शासन चलाने की सुविधा प्राप्त थी परंतु वैदेशिक  और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के लिए ब्रिटिश शासन पर ही आधारित थे।

(4) संरक्षित राज्य(Protectorates):- निर्बल राज्यों को कभी-कभी अपनी सुरक्षा के लिए शक्तिशाली राज्यों का आसरा लेना पड़ता है । अतः संधि द्वारा वे अपने संरक्षण का कार्य सबल राज्य को सौंप देते हैं और वे संरक्षित राज्य कहलाते हैं ।  किसी संरक्षित राज्य के लिए आवश्यक है कि उसे उसी रूप में कोई तीसरा राज्य महाशक्ति मान्यता प्रदान करें इस स्थिति में संरक्षण देने वाला राज्य ही अंतरराष्ट्रीय नीति निर्धारण में इसका प्रतिनिधित्व करता है ।इसका उदाहरण 1949 में भारत और भूटान के बीच हुई वह संधि  थी जिसके अनुसार भारत सरकार ने भूटान के संरक्षण का दायित्व अपने ऊपर ले लिया था ।इसी प्रकार सन 1950 की संधि के अनुसार सिक्किम भी संरक्षित राज्य था जो सन 1975 में विलय होकर भारत संघ की एक इकाई बन गया।


(5) राष्ट्रमंडल(Common Wealth Nations) :ब्रिटिश साम्राज्य में से ब्रिटिश प्रजा रखने वाले देशों जैसे कनाडा ,न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया ,दक्षिण अफ्रीका इत्यादि ने स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद स्वतंत्र उपनिवेशों(Domination) का स्थान प्राप्त किया। सन 1948 से उपनिवेश(Dominion) शब्द का प्रयोग बंद होने लगा और भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्रता के बाद उन्होंने संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राज्यों का रूप कर लिया। इन राज्यों ने मिलकर जिस संघ की स्थापना की वह राष्ट्रमंडल कहलाया। राष्ट्रमंडल के सदस्य अपनी बाह्य  और आंतरिक नीतियों और प्रशासन के लिए पूर्ण स्वतंत्र होते हैं। केवल एक निश्चित उद्देश्य और कार्यों के लिए भी एक इकाई है संघ के रूप में कार्य करते हैं।

       राष्ट्रमंडल के विषय में स्टॉक ने कहा है कि राष्ट्रमंडल ना तो कोई अधिराज्य है और ना ही संघ। वह स्वतंत्र और सामान राज्यों का समूह है।

(6) तटस्थीकृत राज्य(Neutralized States  ): स्टार्क ने  इसकी परिभाषा करते हुए लिखा है कि तटस्थीकृत राज्य उसे कहते हैं जिसकी स्वतंत्रता तथा राजनैतिक और प्रादेशिक अखंडता को स्थाई रूप से बनाए रखने की गारंटी पाने वाला देश यह शर्त  स्वीकार करता है कि वह आत्मरक्षा के अतिरिक्त दूसरे राज्य पर आक्रमण नहीं करेगा और ना ही ऐसी मैत्री संधि में सम्मिलित होगा जिससे उसकी निष्पक्षता को आँच आए तथा उसे युद्ध करने के लिए बाध्य होना पड़े।

      तटस्थीकृत इसलिए आवश्यक होता है कि:

(अ) निर्बल राज्यों को कोई शक्तिशाली राज्य दबाये और इस प्रकार किसी अन्य शक्तिशाली राज्य द्वारा हस्तक्षेप की स्थिति ना आ जाए अन्यथा दो शक्तिशाली राज्यों में शक्ति प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो जाएगी।

(ब) शक्तिशाली राज्यों के बीच के स्थित अंतस्थ राज्यों (Buffer states ) के स्वतंत्रता तटस्थकृत विभिन्न राज्यों द्वारा सामूहिक संविदा करके ही स्वामी रह सकता है। उदाहरण के लिए सन 1831 की एक संधि के द्वारा ब्रिटेन फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया बेल्जियम एशिया और रूस ने तटस्थता की नीति(Policy of neutralisation) स्वीकार की थी।

(7) न्यासित प्रदेश(Trust territories): संयुक्त राष्ट्र संघ की न्याय परिषद(trusteeship council) द्वारा उन राज्यों के लिए प्रशासक नियुक्त करके शासन कार्य चलाया जाता है जो कि आधुनिक सभ्यता दूर और अत्यधिक पिछड़े हुए होते हैं। ऐसे राज्यों का उस समय तक कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता जब तक कि उसके निवासियों में दूसरी राजनीतिक चेतना नहीं पैदा हो पाती और वह अथवा शासन स्वयं सम्भालने  योग्य नहीं होते। स्वतंत्रता मिलने के बाद वे आत्मनिर्भर राज्यों की श्रेणी में आ जाते हैं।

        न्यासधारित व्यवस्था के अधीन 11 राज्य क्षेत्र रखे गए थे। राज्य क्षेत्र तथा उन को प्रसारित करने वाली शक्तियां थी:

(1) न्यू गुयाना एण्ड नौरा( ऑस्ट्रेलिया)

(2)खाण्ड उरुण्डी( बेल्जियम)

(3)केमसून्स एण्ड टोगोलैण्ड( फ्रांस)

(4)सोमाली लैण्ड (इटली)

(5) वेस्टर्न समोआ( न्यूजीलैंड)

(6)कैमसन्स

(7) टोगोलैंड तथा तंगनायिका( यूनाइटेड किंगडम)

(8) प्रशांत द्वीप ट्रस्ट टेरिटरी( संयुक्त राज्य)

(9) दक्षिण पश्चिम अफ्रीका का राज्य

(10) मार्शल द्वीप

(11) माइक्रोनेशिया


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