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BNS धारा 109 “Attempt to murder” है, जबकि Regular Bail की प्रक्रिया

ग्रोशियस को क्यों अंतर्राष्ट्रीय विधि का जनक कहा जाता है?

ह्यगो ग्रोशियस(Hugo Grotious):अंतर्राष्ट्रीय विधि के एक विख्यात विधि शास्त्री थे ।इनका जन्म सन 1583 में हालैंड में हुआ था ।15 वर्ष की आयु में उन्हें लीडेन(Leyden) विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ law की डिग्री मिल गई थी ।सन 1609 में उनकी पहली पुस्तक "Mare Liborum" प्रकाशित हुई ।इस पुस्तक में उन्होंने समुद्र की स्वतंत्रता के संबंध में विवेचना की तथा प्रभावशाली तर्क दिये। इसके पश्चात ग्रोशियस पेरिस चले गए तथा 10 वर्षों तक वहां अध्ययन में लगे रहे । सन 1625 में उनकी सबसे विख्यात पुस्तक "युद्ध तथा शांति की विधि"(De jure belli ac Pacis) प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में उन्हें ख्याति प्रदान की। इस पुस्तक का एक विस्तार पूर्वक संस्करण सन 1631 में प्रकाशित हुआ। ओपेनहाइम ने उचित ही लिखा है कि आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि का विज्ञान ग्रोशियस कि इस पुस्तक से प्रारंभ होता है, क्योंकि सर्वप्रथम अंतर्राष्ट्रीय विधि की पूर्ण प्रणाली को विधि के विज्ञान की एक स्वतंत्र शाखा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।


ग्रोशियस के सिद्धांत: ग्रोशियस(Grotious) प्रकृति के नियमों में विशेष आस्था रखते थे। अतः उनका विचार था कि प्रकृति मनुष्य को अपनी बौद्धिक प्रकृति के अनुकूल या प्रतिकूल कार्य करने के लिए नैतिक दृष्टि से किसी कार्य विशेष के अनुकूल या प्रतिकूल होने का संकेत दे देती है। समाज और राष्ट्र का निर्माण समान प्रकृति के व्यक्तियों से मिलकर होता है। अतः वे सामान्य और स्वाभाविक रूप से प्रकृति के नियमों(Laws of nature ) का पालन करते हैं। इस प्राकृतिक आदेशों  या संकेतों को बुद्धि का प्रयोग करके और तर्क के आधार पर जाना जा सकता है। इसके अंतर्गत किसी कार्य विशेष के उचित या अनुचित को मूलभूत नैतिक सिद्धांतों की कसौटी पर रख कर जाना जा सकता है। दूसरा साधन है अनुभव पर आधारित तर्क की कसौटी। इसके अंतर्गत सभी कालों और परिस्थितियों में विभिन्न देशों द्वारा माने जाने वाले नियमों को प्राकृतिक विधि से उत्पन्न हुआ मान लिया जाता है।ग्रोशियस(Grotious) की दृष्टि में अंतर्राष्ट्रीय विधि की उत्पत्ति का आधार विभिन्न देशों द्वारा दी गई वह सहमति या समझौते हैं जो रीति-रिवाजों ,देशाचारों और पारस्परिक संबंधों के पालन करने के लिए किए जाते हैं।

        ग्रोशियस द्वारा अंतर्राष्ट्रीय विधि का व्यवस्था पूर्ण प्रतिपादन की दिशा में किया गया योगदान उल्लेखनीय है। इसी योगदान के कारण उन्हें अंतर्राष्ट्रीय विधि का जनक कहा जाता है। ग्रोशियस का मुख्य योगदान हीटन के शब्दों में यह है कि उन्होंने न्याय के उन नियमों की रचना की जो समाज की दशा में रहने वाले मनुष्यों पर लागू हो।


      ग्रोशियस ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि राष्ट्रों के बीच संबंधों का संचालन सब मिलाकर विधि द्वारा होता है। उसका एक दूसरा बड़ा योगदान यह था कि उसने प्रकृति के नियम संबंधी सिद्धांत को धर्मनिरपेक्ष बनाया और यह दिखलाया की प्रकृति के नियम का आधार स्वयं मानव स्वभाव के अंदर मौजूद है। उसका मत था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है और मूल रूप से वह नेक, विकासशील तथा नैतिक है और यदि विचार पूर्वक विश्लेषण किया जाए तो मालूम होगा अंततोगत्वा मनुष्य के गुण अन्तर्राष्ट्रीय विधि के आधार है। ग्रोशियस कि यह एक मान्यता थी कि व्यक्तियों और व्यक्तियों से निर्मित राष्ट्रों में तत्वता कोई भेद नहीं है, यह दोनों ही समान हैं। परंतु ग्रोशियस का यह सिद्धांत राष्ट्र के संबंध में प्रचलित सिद्धांत से विपरीत है।

     न्यायोचित और अन्यायोचित प्रकार के युद्धों के बीच भेदों की व्याख्या करने के साथ-साथ ग्रोशियस ने अपने ग्रंथों के सीमित तटस्थता की संकल्पना(qualified neutrality) का विकास क्यों और कैसे होता है। यह भी स्पष्ट किया है उनके मतानुसार यदि कोई राष्ट्र न्यायोचित प्रकार का युद्ध कर रहा हो तो उसकी सहायता होनी चाहिए उस समय पूर्ण रूप से तटस्थता उचित नहीं है।


           ग्रोशियस ने अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राष्ट्रों द्वारा परस्पर किए जाने वाले वादों और मुख्य समझौतों की बाध्य शक्ति  पर जोर दिया है। उनका मत है कि राष्ट्रों के बीच झगड़ों का शांतिपूर्ण निपटारा पारस्परिक वार्तालाप के द्वारा किया जाना चाहिए।

आलोचना: यद्यपि ग्रोशियस का योगदान यथेष्ट रहा है फिर भी उसका ग्रंथ सर्वथा दोष रहित नहीं है। उसकी रचना के दोष मुख्यतः निम्नलिखित हैं:


(1) युद्ध और शांति पर उसके ग्रंथ में जो विवेचना है उसमें जल्दबाजी और छिछलापन है।

(2) अंतर्राष्ट्रीय विधि के सैद्धांतिक आधार के निर्धारित करने में ग्रोशियस का ढंग कुछ विशेष तर्कसंगत नहीं है। उसका ढंग ना तो प्रकृति  वादी है न यथार्थवादी का है।

(3)ग्रोशियस के विरुद्ध जो सबसे बड़ी आलोचना की जा सकती है वह यह है कि प्राकृतिक विधि का उसका सिद्धांत स्थिर स्वार्थ  वाली आधिकारिक सत्ता और  प्रचलित व्यवस्था का जितना विशेष रूप से पोषक सिद्ध हुआ है उतना प्रगतिशील और लचीली प्रणाली का प्रोत्साहन नहीं रहा है।



निष्कर्ष: उपयुक्त दोषों  के होते हुए भी ग्रोशियस ने अंतर्राष्ट्रीय विधि को एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने की दिशा में जो महत्वपूर्ण कार्य किया है उस की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। असाधारण बौद्धिक प्रतिभा तथा विद्वत्ता  से संपन्न इस व्यक्ति ने अंतर्राष्ट्रीय विधि पर एक भारी ग्रंथ की रचना का कार्य किया है। अन्तर्राष्ट्रीय विधि को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में उसका प्रयास सर्वप्रथम था। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विधिहिन जंगल में से उसने एक प्रकार की विधि उत्पन्न करने में सहायता दी। इसलिए कुछ लोगों को उसे अंतर्राष्ट्रीय विधि का पिता की उपाधि देने पर भले ही आपत्ति हो फिर भी हमें यह ध्यान रखना होगा कि वह अंतर्राष्ट्रीय विधि को व्यवस्थित रूप देने का पिता तो था ही।


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