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बलवा (Rioting) और दंगा (Affray) क्या है? BNS की धारा 191 और 194 की पूरी जानकारीi

वस्तुतः संरक्षक (de facto guardian):तदर्थ संरक्षक ( Adhoc Guardian ):

वस्तुतः संरक्षक (de facto guardian): -वस्तुतः  संरक्षक स्वयं द्वारा नियुक्त संरक्षक होता है जब कोई व्यक्ति बिना किसी विधि की आवश्यकता के अवयस्क के शरीर या संपत्ति की देखभाल करता है और यह देखभाल कुछ दिन की अस्थाई देखभाल होकर स्थाई देखभाल है तो हिंदू विधि ऐसे व्यक्ति की स्थिति को स्वीकार करती है इस प्रकार अवयस्क  का वस्तुतः संरक्षक ना कोई विधिक संरक्षक है ना कोई वसीयती  संरक्षक तथा ना किसी न्यायालय द्वारा नियुक्त संरक्षण है  वरन  वह इस प्रकार का व्यक्ति होता है जिसने स्वयं अवयस्क  की संपदा तथा मामलों की देखभाल का प्रबंध अपने हाथों में ले लिया है तथा प्राकृतिक संरक्षक की तरह आचरण करने लगा है.

                   वस्तु का संरक्षक का नाम हिंदू धर्म शास्त्रों में कहीं उल्लेखित नहीं है परंतु उसके अस्तित्व को कहीं भी नकारा नहीं गया है श्री मूलू के वाद में न्यायाधीश ने कहा है कि हिंदू विधि शास्त्र ने दो विपरीत और कठिन परिस्थितियों में समाधान ढूंढने का प्रयास किया है एक जब अवयस्क  को कोई वैध संरक्षक नहीं है तो फिर उसकी संपत्ति का कोई प्रबंध न होने के कारण उसे (अवयस्क ) को अपने भरण-पोषण अन्य व्ययों के लिए कोई धनराशि प्राप्त नहीं हो सकेगी दूसरा बिना विधिक अधिकार के किसी भी व्यक्ति को दूसरे की संपत्ति में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है हिंदू विधि ने कठिन स्थिति का समाधान किया वस्तुतः संरक्षक में विधिक मान्यता देकर.

           इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वस्तुतः  संरक्षक वह व्यक्ति है जिसने स्वयं अवयस्क  की संपदा तथा मामलों की देखरेख का प्रबंध अपने हाथों में ले लिया है.

वस्तुतः संरक्षक की शक्तियां:- सरक्षकता की विधि के संहिताबध्द  होने के पूर्व मान्य नियम यह था कि वस्तुतः  संरक्षक निम्नलिखित 2 अवस्थाओं में अवयस्क की संपत्ति हस्तांतरण कर सकता था.

( 1) वैद्य आवश्यकता

( 2) सम्पत्ति  की असुविधा

          वस्तुतः संरक्षक की अन्य शक्तियों के बारे में श्री मूलू के निर्णय में फेडरल कोर्ट ने कहा है कि विधितः  और वस्तुतः संरक्षको  को अपने ऋण साधारण अनुबंध पराक्रम लिखित पर ऋण  द्वारा अवयस्क  की संपत्ति को दायित्व  के भार  से लादने  का अधिकार है बशर्ते कि (क) ऋण अनुबंध पराक्रम लिखित वैद्य हो सकता यह संपत्ति के परिणाम के लिए लिया गया है एवं संरक्षक एवं ऋण अनुबंध और पराक्रम लिखित वैध  के अंतर्गत अपने को दायित्व से अवर्जित नहीं किया है परंतु यह सुस्थापित मत है कि वस्तुतः  संरक्षक ना तो अवयस्क  की ओर से दायित्व भी अभिस्वीकृत कर सकता है ना ही वह विवाद को पंच फैसले के सुपुर्द कर सकता है और ना ही वह अवयस्क  की संपत्ति का दान कर सकता है.

          वस्तुतः संरक्षक अब इस अधिनियम के लागू होने की तिथि से किसी अवयस्क हिंदू की संपत्ति के संबंध में अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता किंतु कोई कार्य जो वस्तु का संरक्षक ने अधिनियम के पूर्व किया है इसकी वैधता पूर्व विधि के अनुसार निर्मित की जाएगी जब कोई व्यक्ति किसी अवैध की संपत्ति को संरक्षक के रूप में धारण करता है किंतु वह न तो कोई नैसर्गिक संरक्षक अथवा वसीयत संरक्षक अथवा ना किसी न्यायालय द्वारा नियुक्त संरक्षक होता है तो वह वस्तु का संरक्षक माना जाएगा और इस अधिनियम में दी गई धारा के प्रावधान के संबंध में लागू किए जाएंगे.

            एक वस्तुतः का संरक्षक अवयस्क  के लिए उसके अनन्य मित्र के रुप में किसी और से किसी वाद में आ सकता है कोई ऐसा व्यक्ति जो अवयस्क  की संपत्ति की देखभाल करता है किंतु वह ना तो प्राकृतिक संरक्षण या वसीयती  संरक्षक है और ना न्यायालय द्वारा निर्धारित संरक्षक है तो ऐसी स्थिति में व्यवस्थित संरक्षक माना जाएगा किंतु उसके ऊपर भी समस्त नियंत्रण आरोपित किए जाएंगे जो धारा 11 में उल्लेखित है.


( 2) तदर्थ संरक्षक (   Adhoc Guardian   ): - तदर्थ  संरक्षक वह व्यक्ति होता है जो केवल कुछ निश्चित या विशेष उद्देश्य के लिए संरक्षक का रूप धारण करता है इस प्रकार के संरक्षक द्वारा अवयस्क  की संपत्ति का हस्तांतरण शून्य होता है वर्तमान अधिनियम में तदर्थ संरक्षक को कोई स्थान प्रदान नहीं किया गया है श्री अरविंदो सोसायटी पांडिचेरी बनाम रामोदास नायडू के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने यह कहा है कि भले ही कोई तदर्थ संरक्षक जैसा कार्य करें किंतु उसके द्वारा अवयस्क  के लिए किया गया समस्त कार्य अकृत एवं शून्य होगा और वह अवयस्क  को बाधित करेगा भले ही उसके द्वारा किया गया कार्य अवयस्क  के हित में प्रतीत हो तदर्थ संरक्षक न तो विधिक संरक्षक है और ना वस्तुतः का संरक्षक.


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