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FIR होने के बाद क्या करें? आरोपी के लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया | BNSS 2023

नारी संपदा से आप क्या समझते हैं? हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 ने इस संबंध में कौन से परिवर्तन किए हैं? What do you understand by women's Estate? What are the changes introduced in this regards by Hindu Succession Act 1956.

नारी संपदा (Woman Estate ): - नारी संपदा को स्थिर संपदा तथा सीमित संपदा के नाम से भी पुकारा जाता है यह वह संपत्ति है जिसे नारी किसी पुरुष या स्त्री से दाय में प्राप्त करती है अथवा विभाजन के समय प्राप्त करती है यह संपत्ति केवल उसे उसके जीवन काल में उपभोग के लिए प्राप्त होती है वह इसका अंतरण केवल कुछ ही निर्धारित परिस्थितियों में कर सकती है उसकी मृत्यु के पश्चात यह संपत्ति उसके अपने दायदो को ना मिलकर संपत्ति के दूसरे पूर्ण स्वामी को चली जाती है।

         नारी संपदा के विषय में मूल पाठकार कात्यायन एवं बृहस्पति थे। बृहस्पति के अनुसार पति की मृत्यु के बाद पारिवारिक पवित्रता की रक्षा करते हुए अर्थात  सदाचार करने वाली विधवा उसके अंश को प्राप्त करे। किंतु दान देने बंधक रखने अथवा विक्रय करने का अधिकार ना हो।

           कात्यायन के अनुसार पुत्रहीन सती अपने श्रेष्ठजनों के साथ निवास करती हुई विधवा अपने जीवन भर पति की  संपत्ति का संयम ढंग से उपयोग करे।उसके पश्चात पति के दायद लेंगे।

        बनारस मिथिला मद्रास बंगाल शाखाओं के अनुसार नारी द्वारा पुरुष या नारी से प्राप्त संपत्ति नारी संपदा होती है.

        बम्बई शाखा के अनुसार नारी उस परिवार में जिसमें वह ब्याह कर आई है पुरुष से जो संपत्ति प्राप्त करती है वह संपत्ति नारी संपदा कहलाती है विभाजन में नारी को प्राप्त संपत्ति भी नारी संपदा होती है.

           इस प्रकार नारी संपदा वह संपदा है जिसे नारी अपने पति या किसी नारी से दाय  में प्राप्त करती है जिसका उस पर सीमित स्वामित्व होता है तथा उसकी मृत्यु के बाद संपत्ति उसके दायदों को न्यायगत न  होकर संपत्ति के अंतिम स्वामी को न्याय गत होती है। प्रीवी काउंसिल ने यह जानकी अम्माल बनाम नारायण स्वामी में कहा है कि उसका संपत्ति संबंधी अधिकार सीमित स्वामी जैसा होता है उसकी हैसियत स्वामी की सी है फिर भी उस स्थिति में उसकी शक्तियां सीमित होती हैं किंतु उसके जीवन काल तक उत्तराधिकार में उसके अतिरिक्त और किसी व्यक्ति का नियत हक नहीं होता है वह निम्न  अवस्थाओं में संपत्ति हस्तांतरित कर सकती थी.

(1)विधिक आवश्यकता होने पर 

(2)सम्पदा प्रलाभ के लिये

(3)वाद के उत्तरभोग्यों की सम्पत्ति से

(4)धार्मिक अथवा दान के प्रयोजन के लिये

कमलादेवी बनाम बच्चूलाल गुप्ता के वाद मे यह मत व्यक्त  किया गया कि मृत पति की संपदा यदि उसकी विधवा के कब्जे में है तो वह धार्मिक कार्यों के लिए अन्य संक्रमण कर सकती है वह संपत्ति का कब्जा लेने के लिए किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध दावा कर सकती है.

परिवर्तन -: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 14 द्वारा समस्त देश में हिंदू स्त्रियों के लिए संपत्ति के संबंध में एक प्रकार के कानून की व्यवस्था कर दी गई है.

            कुछ परिस्थितियों को छोड़कर ऐसी संपत्ति धारण करने वाली स्त्री को पुरुष स्वामिनी बना दिया गया है तथा वह संपत्ति को इच्छा  अनुसार अन्वरित कर सकती है अब सीमित तथा पूर्ण स्वामिनी में कोई अंतर नहीं रह गया है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 14 (1) इस प्रकार है -

   “हिंदू पत्नी ने कब्जे में कोई भी संपत्ति चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या पश्चात अर्जित की गई हो उसके द्वारा पूर्ण स्वामिनी के तौर पर ना कि सीमित स्वामिनी के तौर पर धारित की जाएगी.

    धारा 14 का प्रभाव भूतलसी है अर्थात उसको पूर्ण स्वामिनी बना दिया है चाहे स्त्री ने संपत्ति अधिनियम के पूर्व या पश्चात प्राप्त की हो.

      अब धारा 14 में स्त्री की समस्त संपत्ति के विषय में उत्तराधिकार का एक सामान्य नियम प्रदान किया है। पहले नारी संपदा स्त्री की मृत्यु के पश्चात पति के वारिसों को निगम्य होती थी ना कि स्त्री के वारिसों को अब हिंदू स्त्री के निर्वसीयत मरने पर वह चाहे भाग शाखा की हो या मिताक्षरा शाखा की उसकी संपत्ति न्याय गमन धारा 10 व 16 के अनुसार होगा संपत्ति के न्यागमन का क्रय तथा विक्रय धारा 16 के अंतर्गत होगा

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