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अभिस्वीकृति का मुस्लिम विधि में क्या आशय है? (what is meant by acknowledgement under Muslim law?)

किसी व्यक्ति द्वारा पितृत्व की अभिस्वीकृति का अर्थ है इसके द्वारा स्वयं को संतान का पिता स्वीकार कर लेना मुस्लिम विधि में इसे इकरार -ए नसब कहते हैं।

        किसी शिशु का गर्भ में आने पर या जन्म लेने के समय उसके माता-पिता का विवाह संशयात्मक(doubtful) होने के कारण यदि उस शिशु का पितृत्व संदिग्ध हो जाए तो पति उस शिशु को अपना पिता घोषित करके उसे अपनी संतान के रूप में स्वीकार कर सकता है.


           पति द्वारा इस प्रकार की अभिस्वीकृति का यह परिणाम होगा कि ना तो उसका विवाह ही संशयात्मक माना जाएगा और ना ही उस शिशु की औररसता। यदि किसी शिशु की औरसता न तो पूर्णता सिद्ध हो पाई है और ना ही असिद्ध हो तो ऐसी स्थिति में अभिस्वीकृति द्वारा शिशु की औरसता और साथ ही उसके माता-पिता का विवाह  भी स्थापित हो जाता है परंतु अवैध संबंध अथवा मुस्लिम विधि के अंतर्गत निषिद्ध  विवाद से उत्पन्न हुए अवैध संतान को अभिस्वीकृति द्वारा संदिग्ध पितृत्व वाले संतान का पितृत्व सुनिश्चित किया जाता है ना कि अवैध संतान को औरसता प्रदान की जाती है.


मोहम्मद अल्लाहहदाद बनाम इस्माइल का मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णीत यह वाद इस विषय पर एक महत्वपूर्ण वाद है जिसे  पृवी काउंसिल ने भी मान्यता  दी है।


         प्रस्तुत वाद में अल्लाहदाद खान का बाप एक सुन्नी मुसलमान था वह दो लड़के और तीन लड़कियों को छोड़कर मरा था अल्लाहदाद खान ने अपने छोटे भाई और तीनों बहनों को पक्षकार बनाते हुए कथन के साथ वाद दायर किया कि क्योंकि वह मृतक का सबसे बड़ा लड़का है अतः संपत्ति के 2\7 हिस्से का हकदार है प्रतिवादी का कथन था कि वादी सोतेला लड़का है और जब पैदा हुआ उस समय माता का विवाह उसके पिता से नहीं हुआ था वह प्रतिवादी का कहना था कि वह अपने का पुत्र होना ना भी साबित कर सके तो चौकी मृतक ने उसके उसे कई बार अपना पुत्र स्वीकार किया है इसलिए वह पुत्र के रूप में उत्तराधिकार का हकदार है उसने ऐसे कई पत्र प्रस्तुत किए जिसमें उसे पुत्र कहकर संबोधित किया गया था.


      इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मोहम्मद अल्लाह अदा खान अवैध संबंध की संतान है।यद्यपि उसके पितृत्व का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है फिर भी क्योंकि उसकी मां मोती बेगम और पिता गुलाम गौस कई वर्षों तक पति-पत्नी के रूप में रहे हैं अतः इनके बीच विवाह की उप धारणा की जा सकती है . अतः न्यायालय ने अभी निर्धारित किया कि अल्लाह दाद गुलाम गौस का अभी स्वीकृत पुत्र है.


       मोहम्मद खान बनाम अली खान के प्रकरण में वह अवलोकन किया गया है कि अभिस्वीकृति का सिद्धांत केवल वही लागू होता है जहां विवाह का तथ्य अथवा विवाह का ठीक समय सिद्ध नहीं हो सकता यह सिद्धांत ऐसे मामले में नहीं लागू होगा जहां कि बच्चे के माता-पिता के बीच वैद्य विवाह संभव नहीं था और जहां बच्चों को वैध बनाने हेतु आवश्यक विवाह न साबित कर दिया गया था.


      विधि मान्य अभिस्वीकृति की शर्तें: -

      पितृत्व की अभिस्वीकृति सारवान मुस्लिम विधि का विषय है. अभिस्वीकृति में निम्न शर्तों का पालन होना अनिवार्य है -

          अभी स्वीकृति केवल ऐसी संतान को प्रदान की जा सकती है जिसके गर्व में आने के समय उसकी मां और अभी स्वीकृति प्रदान करने वाले पुरुष के बीच वैद्य विवाह संभव रहा हो अथवा अभिस्वीकृति करता तथा संतान की मां के बीच ना तो कोई निषेध संबंध रहा हो और ना ही उस संतान की मां किसी अन्य पुरुष की पत्नी रही हो.

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