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मेहर क्या है? मुस्लिम पत्नी का मेहर का अधिकार और पूरा कानून कहानी के माध्यम से

संघात्मक शासन के आवश्यक तत्व: Essential elements of Federal constitution

 

लिखित संविधान


संघात्मक संविधान हमेशा लिखित होता है संघीय शासन पद्धति में इकाइयों के रूप में राज्य संघ शामिल होते हैं एवं उनके मध्य शर्तों का निर्धारण होता है राज्यों को मत संविदा आत्मक संबंध होते हैं ऐसे संबंधों का अक्षर रहना तभी संभव होता है जब लेख रूप में संकलित हो एवं उनके अधिकार तथा कर्तव्य से स्पष्ट हो लिखित संविधान द्वारा ही संभव होता है.



शक्तियों का विभाजन


संघात्मक संविधान का प्रमुख तत्व है केंद्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन हियर के मतानुसार संगीत संविधान के अंतर्गत शक्तियों का विभाजन संघ और इकाइयों में या विभाजन ऐसी नीति से किया जाए ताकि दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में भली-भांति रूप से एक दूसरे से स्वतंत्र हुआ एवं एक साथ ही एक दूसरे के सहयोगी ना एक दूसरे के अधीन यह विभाजन संविधान द्वारा किया जाता है भारत के संविधान में यह तत्व मौजूद है भारत में केंद्रीय सरकार एवं राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है दोनों अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोपरि एवं एक दूसरे के सहयोगी भी राया शक्तियों का विभाजन तीन सूचियों संघ सूची राज्य सूची एवं समवर्ती सूची के अंतर्गत किया गया है.


संविधान की सर्वोच्चता:


संघीय शासन व्यवस्था में संविधान देश की सर्वोच्च विधि माना जाता है संघीय सरकार के लिए संविधान का न केवल लिखित होना आवश्यक है और उसकी सर्वोच्चता भी आवश्यक है सरकार के सभी अंग कार्यपालिका विधान पालिका एवं न्यायपालिका संविधान से ही सृजित होते हैं और उसी से अधिकार पाते हैं इनकी सीमाओं मर्यादाओं का निर्धारण भी संविधान द्वारा किया जाता है सभी संस्थाएं संविधान के अधीन एवं नियंत्रण में कार्य करती हैं संविधान की व्यवस्था के प्रतिकूल बनाए गए सारे कानून अवैध होते हैं.

             भारतीय संविधान भी अपने आप में एक सर्वोपरि विधि है इससे ऊपर ना तो कोई विधि है और ना ही कोई शक्ति है इसकी सर्वोपरि दा को बनाए रखने के लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है.

आप परिवर्तनशील ता


देश की सर्वोच्च विधि होने के नाते संविधान का आ परिवर्तनशील होना आवश्यक है क्योंकि आप परिवर्तनशील संविधान से हमारा अभिप्राय है कि जिसमें से आसानी से से संशोधन नहीं किया जा सकता है अर्थात उसको संशोधन की प्रक्रिया कठिन एवं जटिल होती है लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उसमें कभी भी संशोधन किया ही नहीं जा सकता. इसका आश्रय यह है कि उसमें तभी संशोधन किया जा सकते हैं जब समय और परिस्थितियों के अनुसार ऐसा किया जाना आवश्यक हो.

           भारत का संविधान इस कसौटी पर खरा उतरता है इसकी संविधान की प्रक्रिया इतनी सरल नहीं है कि उसमें जब चाहे तब संशोधन किया कर दिया जाए दूसरी तरफ यह इतनी कठोर भी नहीं है ट्यूशन में संशोधन किया ही ना जा सके इस दिशा में हमारे संविधान निर्माताओं ने बड़ी सूझबूझ और विवेक से काम लिया है और संशोधन की प्रक्रिया के माध्यम से मध्यम मार्ग को अंगीकृत किया है.

स्वतंत्र न्यायपालिका का अस्तित्व:

संघीय शासन व्यवस्था में क्योंकि संविधान सर्वोच्च होता है और केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन होता है अतः उसके ऐसे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निकाय की आवश्यकता रहती है जो संविधान की सर्वोच्चता की रक्षा कर सकें एवं केंद्र तथा राज्यों के बीच विवाद उत्पन्न हो जाने पर उसका निष्पक्षता से निराकरण कर सके यह कार्य केवल स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका ही कर सकती है यही कारण है कि न्यायपालिका को संविधान तथा लोकतंत्र का सजग प्रहरी कहा जाता है.

                    भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निकाय के रूप में न्यायपालिका का गठन किया गया है इसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय है जो संविधान के बंधुओं की अंतिम रूप से व्याख्या करता है.

संविधान के मूल ढांचे को बनाए रखना इसका कर्तव्य है..


इस प्रकार भारतीय संविधान में भी सारे तत्व विद्यमान हैं संविधान के लिए आवश्यक माने जाते हैं लेकिन यह सब कुछ होते हुए भी इसे संघीय संविधान नहीं माना गया है.

भारतीय संविधान में एकात्मक संविधान के तत्व


भारत का संविधान यद्यपि संघात्मक है लेकिन इसमें कतिपय ऐसे प्रावधान किए गए हैं जो उसे एकात्मक संविधान का रूप देते हैं इन्हीं प्रावधानों के कारण इसे अर्ध संघीय संविधान कहा जाता है भारतीय संविधान में विद्यमान यह एकात्मक तत्व मुख्य रूप से निम्न लिखित है.

एकल नागरिकता


भारतीय संविधान में एकल नागरिकता की व्यवस्था की गई है यहां के सभी नागरिक भारतीय नागरिक क्योंकि राज्यों की अलग नागरिकता को यहां मान्यता नहीं दी गई है इस प्रकार भारत के समस्त नागरिक एवं निवासी मूल रूप से केंद्र के प्रति समर्पित हैं. संविधान का अनुच्छेद 5 इस संबंध में आवश्यक व्यवस्था करता है..

राज्यपाल की नियुक्ति:

प्रत्येक राज्य में उसके संवैधानिक प्रमुख के रूप में एक राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदाई होता है राज्य विधानमंडल के प्रति उत्तरदाई नहीं होता है राज्य विधान मंडल द्वारा पारित कोई भी विधेयक तब तक विधि का रूप नहीं ले सकता है जब तक उसे राज्यपाल की अनुमति नहीं मिल जाती है इस प्रकार संविधान की यह व्यवस्था राज्य की स्वच्छता पर आघात करने वाली है.

राज्य सूची के विषय पर विधि बनाने की संसद की शक्ति:


भारत में केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है इसके लिए विधि निर्माण संबंधी विषयों को तीन सूचियों में वर्गीकृत किया गया है.

संघ सूची राज्य सूची और समवर्ती सूची


संघ सूची वाले विषयों पर विधि बनाने की अनन्य शक्ति संसद को प्रदान प्रदान की गई है जबकि राज्य सूची के विषय पर विधि बनाने का अधिकार राज्य विधान मंडलों को सौंपा गया है लेकिन अनुच्छेद 209 के अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रहित के किसी विषय पर राज्यसभा द्वारा दो बटे तीन बहुमत से वोटिंग किए जाने पर संसद द्वारा राज्य सूची कैसे विषय पर विधि बना सकती है इसके साथ-साथ यह भी उल्लेख है कि किसी एक ही विषय पर केंद्र तथा राज्य द्वारा निर्मित विधियों में विरोधाभास होने पर केंद्र द्वारा निर्मित विधि पोता रखी जाएगी इस प्रकार की व्यवस्था भी केंद्र को अधिक सशक्त बनाने वाली है.

आपातकालीन व्यवस्था::


भारत के संविधान के संघात्मक स्वरूप मुख्य रूप से प्रहार उसकी आपातकालीन व्यवस्था के कारण किया जाता है संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को देश में आपात स्थिति की घोषणा करने की महत्वपूर्ण शक्ति प्रदान की गई है वह ऐसा निम्नांकित परिस्थितियों में कर सकता है.


इस पर बाहरी आक्रमण या आंतरिक सुरक्षा की आशंका हो.

जब राज्य की सरकार संविधान के उप बंधुओं के अनुसार नहीं चलाई जा सकती हो.

जब राज्य की सरकार संविधान के या कोई वित्तीय देश में संकट हो

जब देश या उसका कोई भाग वित्तीय संकट से ग्रस्त हो गया हो

इन परिस्थितियों में संपूर्ण देश का प्रशासन और विधाई कार्य संसद के हाथों में आ जाता है उनको केंद्र के निर्देशानुसार प्रशासन चलाना होता है संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है इस प्रकार आपातकाल में देश का संविधान एकात्मक रूप से धारण कर लेता है.
नए राज्यों के निर्माण की शक्ति
संविधान के अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को निम्नांकित के संबंध में महत्वपूर्ण शक्तियां प्रदान की गई हैं


नए राज्यों का सृजन किसी राज्य की सीमा में वृद्धि या कमी किसी राज्य की सीमा में परिवर्तन किसी राज्य के नाम में परिवर्तन आदि

अखिल भारतीय सेवाएं:


भारतीय संविधान को अखिल भारतीय सेवाओं में के कारण भी एकात्मक स्वरूप का मानते हैं राज्यों में शीर्षस्थ स्थान पर अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य कार्य थे इनकी नियुक्ति एवं इनके चयन लोक सेवा आयोग द्वारा किया जाता है कलेक्टर पुलिस अधीक्षक आदि आईएएस आईपीएस आदि अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य होते हैं जिनकी नियुक्ति राज्य की अपेक्षा केंद्र के प्रति अधिक होती है.

                अतः हमारा संविधान संघात्मक एवं एकात्मक तत्व का एक अनोखा मिश्रित संविधान है इसमें राज्यों के साथ-साथ राष्ट्रहित को भी ध्यान में रखा गया है सच तो यह है कि इसमें राष्ट्रहित को सर्वोपरि ता प्रदान की गई है और यही कारण है कि इसे एकात्मक संविधान युक्त संघात्मक संविधान माना जाता है.

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