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IPC की धारा 353 और BNS की धारा 132 लोक सेवकों की सुरक्षा से जुड़े कानून का पूरा विश्लेषण

भारतीय संविधान की प्रस्तावना ( the Preamble of Indian constitution)

 प्रत्येक अधिनियम प्रारंभ में प्राया प्रस्तावना का उल्लेख मिलता है यह आवश्यक भी है क्योंकि प्रस्तावना उस अधिनियम का दर्पण होती है वह संपूर्ण अधिनियम की भावनाओं को कुछ ही शब्दों में प्रकट कर देती है यही कारण है कि न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने प्रस्तावना को अधिनियम के मुख्य आदर्श आकांक्षाओं का प्रतीक माना है दूसरे शब्दों में प्रस्तावना के अधिनियम के उद्देश्य एवं नीतियों को समझने में सहायता मिलती है ठीक है यही बात संविधान पर भी लागू होती है संविधान की प्रस्तावना संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है.



            प्रस्तावना को संविधान का एक भाग ही माना गया है जहां कहीं संविधान की भाषा स्पष्ट या संदिग्ध लगती है वही प्रस्तावना से उसके अर्थ निर्धारण में सहायता मिलती है.


     एसआर बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के मामले में उच्चतम न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना है प्रस्तावना में संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य जैसे शब्दों का आवाहन किया गया है जो इसके स्वरूप का संकेत देते हैं. दो बातों का संकेत मिलता है यह संकेत प्रस्तावना से मिलता है.


संविधान का स्रोत

संविधान का उद्देश्य


           संविधान के प्रस्तावना से उसके स्रोत का संकेत मिलता है प्रस्तावना का आरंभ हम भारत के लोग से होता है इससे यह स्पष्ट है कि भारत के संविधान का स्रोत भारत की जनता है जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की सभा द्वारा किया गया है.

        भारत का शासन संविधान में वर्णित निर्देशों के अनुसार चलता है तथा भारत के शासन के बारे में यह कहा जाता है कि यह जनता का जनता के लिए तथा जनता द्वारा चलाया जाता है इससे यह भी स्पष्ट है कि अंकिता शासन की संपूर्ण सप्ताह जनता में ही निहित है.


          प्रस्तावना से संविधान के स्वरूप का भी पता चलता है हमारे संविधान का स्वरूप
पूर्ण प्रभुत्व संपन्न
समाजवादी
धर्मनिरपेक्
लोकतंत्रात्मक गणराज्य


        यह हमारे संविधान का आदर्श भी है
इन सब के साथ-साथ संविधान की प्रस्तावना उसके लक्ष्य को भी प्रकट करती हैं हमारे संविधान का लक्ष्य है
सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय उपलब्ध कराना
विचार मत विश्वास तथा धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करना
पद एवं अवसर की समानता देना
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता स्थापित करना


हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय चार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए भोकर दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मा अर्पित करते हैं.


            प्रस्तावना संविधान का आधारभूत ढांचा है


संविधान की प्रस्तावना में जिन अर्थ मुल्क शब्दों का प्रयोग किया गया है वह संविधान का आधारभूत ढांचा है स्टेट ऑफ बिहार बनाम बालमुकुंद शाह के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा विधायिका कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच शक्तियों के विभाजन की अवधारणा तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान का आधारभूत ढांचा माना गया है इसी प्रकार इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा समता के सिद्धांत को संविधान का आधारभूत ढांचा माना गया है अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन सिद्धांत के आधारभूत ढांचे का उल्लंघन है.

            लेकिन संपत्ति का अधिकार संविधान के मूलभूत ढांचे की परिधि में नहीं आता है.



             प्रस्तावना में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ बोध
     
          संविधान के प्रस्तावना में जिन शब्दों को अलंकृत किया गया है वह भारत की अतीत एवं वर्तमान सभ्यता और संस्कृति के दर्पण में भारत का संपूर्ण सामाजिक आर्थिक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दर्शन इन शब्दों में समाहित हुआ प्रतीत होता है.

प्रभुत्व संपन्न:

शब्द प्रभुत्व संपन्न इस बात का बोध कराता है भारत आंतरिक एवं बाहर किसी भी दृष्टि से किसी भी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं है इसकी संप्रभुता भारत की जनता में निहित है भारत अपनी गृह एवं विदेश नीति के मामलों में पूर्णतया स्वतंत्र है वह किसी भी देश से संधि भी कर सकता है और मित्रता भी उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है!

समाजवाद::


शब्द समाजवाद की कोई एक रूप परिभाषा दिया जाना कठिन है भारतीय परिपेक्ष में इसका अर्थ आर्थिक न्याय मिश्रित अर्थव्यवस्था एवं अन्य तरह की गतिविधियों से है इस संबंध में दो महत्वपूर्ण निर्णय हुए हैं डीएस नकारा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में उच्चतम न्यायालय ने शब्द समाजवाद की व्याख्या करते हुए कहा है कि समाजवाद का मूल तत्व कर्म कारों एवं समाज के कमजोर वर्ग के जीवन स्तर को ऊंचा उठाना है या आर्थिक समानता और आय के समान वितरण का पक्षधर है यह गांधीवाद और मार्क्सवाद का अद्भुत मिश्रण है जिसका झुकाव गांधीवाद की औरतें करें अन्य मामलों में समाजवाद का अर्थ स्पष्ट करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि समाजवादी समाज की रचना के अंतर्गत राष्ट्रीयकरण एवं राज्य स्वामित्व की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए लेकिन साथ ही निजी संपत्ति एवं कारखानों की भूलता एवं मान्यता वाले इस देश में निजी स्वामित्व वाले वर्ग हेतु की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती है.

पंथनिरपेक्ष:

शब्द पंथनिरपेक्ष संविधान के 42 वें संशोधन की उपज है यह एक ऐसे राज्य की परिकल्पना है जिसमें धर्मों को समान महत्व प्रदान किया गया है यह किसी धर्म में विश्वास नहीं करता है यह विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता में परिलक्षित होता है.

अखंडता:

देश की एकता अखंडता एवं संप्रभुता संघीय शासन के प्रमुख लक्षण हैं देश के सर्वांगीण विकास के लिए यह प्रमुख घटक अतः इसे अच्छा बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है यही कारण है कि संविधान के 42 में संशोधन द्वारा प्रस्तावना में शब्द अखंडता को समाहित किया गया है लगता है जिसके आधार पर अनुच्छेद 19 में प्रदत्त संविधान को निर्बंधित किया जा सकता है.

गणतंत्र :


शब्द गणतंत्र वंशानुगत राज्य तंत्र के उन्मूलन का को बताता है देश की जनता द्वारा निर्वाचन व्यक्ति होगा जो कि देश सुचारू रूप से चलाएगा भारतीय गणतंत्र की शक्तियां राष्ट्रपति में होती हैं जो संसद एवं विधान मंडलों के सदस्यों द्वारा निर्वाचित व्यक्ति होता है.

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