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पति-पत्नी के बीच समझौता (Mediation) कैसे होता है? अदालत समझौता क्यों कराती है और अगर कोई पक्ष बाद में मुकर जाए तो कानून क्या कहता है? – एक वास्तविक जैसी कहानी
आज आख़िरी मौका है... अगर आज भी बात नहीं बनी, तो मामला फिर अदालत जाएगा।" जिला न्यायालय परिसर। सुबह के 11 बजे थे। राहुल और उसकी पत्नी निशा अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे थे। दोनों के बीच कई महीनों से विवाद चल रहा था। मुकदमा अदालत तक पहुँच चुका था। तभी कोर्ट के कर्मचारी ने आवाज़ लगाई— "राहुल बनाम निशा... दोनों पक्ष मध्यस्थता कक्ष (Mediation Centre) में आएँ।" राहुल ने अपने वकील से पूछा— "सर, क्या अब कोर्ट फैसला नहीं करेगी?" वकील मुस्कुराए— "फैसला होगा, लेकिन उससे पहले अदालत यह देखना चाहती है कि क्या बातचीत से रिश्ता बच सकता है।" मध्यस्थता (Mediation) क्या होती है? राहुल और निशा एक शांत कमरे में पहुँचे। वहाँ एक प्रशिक्षित मध्यस्थ (Mediator) बैठे थे। उन्होंने सबसे पहले कहा— "मैं जज नहीं हूँ। मेरा काम किसी को सही या गलत ठहराना नहीं है। मेरा उद्देश्य केवल यह देखना है कि क्या आप दोनों बातचीत से कोई समाधान निकाल सकते हैं।" कमरे का माहौल अदालत जैसा नहीं था। यहाँ न गवाह थे, न बहस, न कोई फैसला। सिर्फ़ बातचीत। मध्यस्थ सबसे पहले क्या पूछता है? मध्यस्थ ने राहुल ...